बागीचा

बागीचा

फूलों के सुन्दर बागीचे में हर भोर तुम्हें ढूंढ़ता है मन वो तुम्हारे हाथ हिलाते हुए मुस्कुराकर टहलने को देखने के लिये तरसता है मन तुम्हारे बगैर यह सुन्दर बागीचा सुनसान लग रहा है माँ! अपने भोर के टहलने से एकबार फ़िर इस फूलों भरे बागीचे को गुलज़ार कर दो माँ..!! स्वर्गलोक...
बागीचा

वहम

आकर कहाँ चली जाती हो तुम क्यों दिखकर छुप जाती हो तुम हो ही नहीं अब तुम सच तो यह है! केवल मन का वहम बन दिख जाती हो तुम अब तुम बिन जीना सीख लिया है.. मैंने! पर फ़िर भी मेरा वहम बन दिख जाती हो तुम...
कानू और मैरेज

कानू और मैरेज

शादी-ब्याह का भी अपना एक अलग ही मज़ा है! और सर्दियों में हो रही शादी की तो बात ही कुछ और होती है.. असली खाने-पीने और जायके का मज़ा तो सर्दियों में ही आता है। शरद ऋतु में शुरू होकर शादियां अब तक यानी के जून के महीने तक तो चलती ही हैं। शादी-ब्याह में आना-जाना हो ही जाता...
परिवार तंत्र

परिवार तंत्र

ना जाने क्या मजबूरी हैलोग राष्ट्र को नहींपार्टी को देते हैं महत्व ज्यादाबात लोकतंत्र की होती हैपर नेता नहीं बदले जातेपार्टी मे जिनकी परिवार तंत्रवो लोकतंत्र समझाते हैंइस्तीफ़े आते हैं प्यादों के जो हैं हार के जिम्मेदारवो साफ साफ हैंबच जाते!ना जाने क्या मजबूरी हैक्यों...
मीठापन

मीठापन

माँ-बापू का मीठापन सदा रहेगा मेरे साथ तुम्हारा और बापू का साथ में रहना सदा रहेगा मेरे साथ पर अचानक तुम्हारा जीवन संगी का यूँ हाथ छोड़ना वो भी रहेगा मेरे साथ पर अब बापू संग साये की तरह से रहतीं हो तुम यह भी सदा रहेगा मेरे साथ अपने होने का अहसास सदा बापू संग रखना...
बागीचा

तेज़ गति

ऐसा लग रहा था लंबी सुनसान सड़क पर तुम तेज़ी से चलती चलीं जा रहीं थीं मैं तुम्हारे पीछे ही तो थी पर तुमसे बहुत दूर होकर भी पहचान लिया था मैंने तुमको माँ हाँ! वो तुम ही तो थीं जो मुझे अब धुंदली सी दिखाई देने लगीं थीं मैं भी बहुत तेज़ चल रही थी पर पहुँच न पाई थी तुम तक।...