धीरज और नब्बो को ट्रक ने हैदराबाद में कृष्णा सागर के सामने सड़क पर उतार दिया था।
सड़क के दूसरी ओर शादी का सैट लगा था। भीड़ जमा थी। कोई अफरा तफरी जैसी मची थी। कुछ था वहां जो गड़बड़ हो गया था।
“वो दोनों एक्टर तो लंदन भाग गए मुसाफिर।” मुकुल खबर लेकर आया था। “किसी और फिल्म की शूटिंग है वहां।” उसने बताया था।
“एडवांस ले कर भाग गए साले?” मुसाफिर ने आश्चर्य जाहिर किया था।
“मारे जाएंगे यार।” प्रोड्यूसर पहलवान पागल होने को था। “ये करोड़ों तो कूड़े में जाएंगे।” वह पैसे के लिए रोया था। “ये सारा महल तुमने खड़ा किया है …” उसने लगे सेट को कोसा था।
“देख-देख।” अचानक मुसाफिर बोल पड़ा था। “उन दोनों को देख।” उसने उस पार खड़े धीरज और नब्बो की ओर इशारा किया था। “पकड़। जा पकड़ उन्हें।” मुसाफिर ने पहलवान को आदेश दिया था। “ले आ … ले आ जा कर।” मुसाफिर कहता ही रहा था। “खुदा के भेजे बंदे हैं।” उसने आश्चर्य जाहिर किया था।
पहलवान को बात समझते देर न लगी थी। वह लपका था और सड़क पर यूं ही खड़े धीरज और नब्बो को दबोच सा लिया था।
“ओ भाई। ओ बहन जी।” पहलवान बोला था। “जरा उधर … उधर आइए।” उसने सामने लगे शादी के सेट की ओर इशारा किया था।
“क्यों?” धीरज सख्त आवाज में बोला था।
अब तक और भी चार छह आदमी आ कर आस पास खड़े हो गए थे।
“आओ तुम्हारी शादी कराते हैं।” पहलवान ने बताया था।
“क्यों …?” नब्बो उछल पड़ी थी।
“अरे, वो … वो असल शादी नहीं। नकली शादी। फिल्म के लिए।” पहलवान ने उन्हें पटाने की कोशिश की थी।
नब्बो ने धीरज को देखा था। धीरज कुछ समझ न पा रहा था।
“इनके हीरो हीरोइन भाग गए हैं भाई।” जमा लोगों में से एक ने कारण बताया था। “एक्टिंग ही तो करनी है, बस।” वह तनिक हंसा था। “मौका है यार।” और किसी ने राय दी थी।
“पैसे मिलेंगे – मेरे यार।” पहलवान ने धीरज की बांह पकड़ कर कहा था। “चल, आ। जो मांगेगा दूंगा।”
पहलवान धीरज और नब्बो को पटा कर ले आया था।
मुसाफिर दोनों को देख खुशी से कूद पड़ा था। वाह री किस्मत – उसने उन दोनों को देख कर जुमला कहा था। देती है तो छप्पर फाड़ कर पकड़ा देती है।” वह बहुत देर हंसता रहा था।
“चाय पानी पी लो भाई फिर चलते हैं।” मुसाफिर ने वक्त जाया न किया था।
पांच सितारा होटल को देख नब्बो और धीरज हैरान थे।
पहाड़ों की दुनिया छोड़ वो दोनों हैदराबाद आए थे और अब हैदराबाद में भी ये होटल … क्या था – जन्नत ही थी। ये ख्वाब था या कोई हकीकत थी – नब्बो और धीरज अभी भी समझ न पा रहे थे।
“चलो बहन जी।” एक लड़की ने आ कर नब्बो को बांह से पकड़ा था। “तुम्हें बनाते हैं दुलहन।” वह हंसी थी।
“आओ दोस्त।” एक आदमी ने धीरज को पकड़ा था। “बनाते हैं तुम्हें दूल्हा।” वह भी हंस रहा था।
धीरज और नब्बो के चेहरों पर धरे आश्चर्य को राधू रंगीला ने बड़ी चतुराई से कैमरों में कैद किया था। एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आ कर झांकना उसे समझना और उसको ग्रहण करना कितना कठिन होता है – राधू रंगीला ने फिल्म के परदे पर स्पष्ट कर दिया था।
शाम ढल रही थी। अब न वहां शादी हो रही थी, न कोई शोर शराबा था।
प्रतिष्ठा और मानस दिन भर की थकान मिटाने स्वीमिंग पूल में नहाने चले गए थे।
धीरज और नब्बो फाइव स्टार होटल को देख-देख खुश हो रहे थे। मोटा पैसा मिला था। अब वो दोनों कोई अगली जुगत लगाने की सोच रहे थे।
“यहीं कहीं इसी शहर के किसी कोने में एक झोंपड़ी डाल लेते हैं।” नब्बो की राय थी। “चुपचाप पड़े रहते हैं। शादी तो हो ही गई, अब तो …?” नब्बो शरमा गई थी।
“और किसी भी दिन चुपचाप पुलिस ने आ कर हम दोनों को दबोच लेना है।” धीरज ने नब्बो को चेताया था। “घर वाले चुप न बैठेंगे नब्बो। तुम नहीं जानती कि लोग कितने जाहिल हैं?”
“तो फिर …?” नब्बो का चेहरा उतर गया था। पुलिस के नाम से ही वो डर गई थी।
तभी कमरे की घंटी बजी थी। धीरज और नब्बो ने एक दूसरे को देखा था। पुलिस आने का डर दोनों पर तारी हो गया था। धीरज ने डरते-डरते दरवाजा खोला था।
“नमस्कार सर।” एक सजा-वजा आदमी सामने खड़ा था। “मैं मैनेजर हूँ।” उसने अपना परिचय दिया था। “आप की सेवा …?”
“नहीं भाई।” धीरज ने घबराते हुए कहा था। “हम तो … हम तो …” वह कुछ कहना चाहता था पर समझ न पा रहा था।
“हम तो चले जाएंगे।” नब्बो ने धीरज को सहारा दिया था।
“मेरे पास ऑफर आ गया है सर।” मैनेजर ने बताया था। “मौका है। मोटा प्रोड्यूसर है, आप कहें तो …?”
धीरज और नब्बो ने एक दूसरे को देखा था।
“तुम्हारा नाम क्या है?” नब्बो ने हिम्मत जुटा कर पूछा था।
“मैनेजर।” उस आदमी ने उत्तर दिया था।
“दिमाग खराब है तेरा?” धीरज को क्रोध चढ़ आया था। “लूटने आया है?” धीरज को समझ आया था कि उनके पास जो मोटा पैसा आ गया था, ये आदमी उसे लूटने आया था।
“मैं फिल्म स्टारों का मैनेजर हूँ श्रीमान।” वह बड़े ही विनम्र भाव से बोला था। “आप दोनों का पेयर बुलंदियां छू रहा है, अगली फिल्म का ऑफर है आप के लिए। कहें तो आपकी एवज में बात चीत चलाऊं? मोटा प्रोड्यूसर है। पहले का दोगुना तो देगा ही देगा।”
अब धीरज और नब्बो एक दूसरे को नई निगाहों से देख रहे थे। दोनों चकित थे। दोनों भ्रमित थे। ये कौन सा मुकाम था – वो समझ ही न पा रहे थे। और ये जो मैनेजर था, वो क्या कह रहा था, ये भी समझ न आ रहा था।
तभी मैनेजर के फोन की घंटी बजी थी।
“हां सर। मैं मिल लिया हूँ। मना रहा हूँ। हां-हां। बन जाएगी बात।” कह कर उसने फोन काट दिया था। “आप की इजाजत हो तो पार्टी को बुलाऊं?” मैनेजर ने मुसकुराते हुए उन दोनों से पूछा था।
“लेकिन … भाई … मैनेजर?” धीरज घबराया हुआ था।
“आप को कुछ नहीं करना।” मैनेजर ने जोर देकर कहा था। “मैं ही बोलूंगा। आप सिर्फ बात बनी तो …”
और अगली फिल्म डाकू के लिए उन दोनों ने एडवांस लेने की हामी भर ली थी।
“हमें तो कुछ आता जाता नहीं है मैनेजर भाई।” नब्बो ने पार्टी के जाने के बाद चिंता व्यक्त की थी।
“आता जाता किसी को कुछ नहीं है मैडम।” मैनेजर ने मुसकुराते हुए कहा था। “डायरेक्टर सब कुछ बता देगा। सब समझा देगा।” वह हंसा था। “हम सब तो कठपुतलियां हैं। डोर तो कोई और ही खींचता है मैडम।” वह खिलखिला कर हंस पड़ा था। “आप के सितारे बुलंद हैं।” मैनेजर ने भविष्यवाणी की थी।
राधू रंगीला ने यूनिट को पैकअप के ऑडर दे दिए थे। अगली शूटिंग सिकंदराबाद में होनी थी।
“मैं तो डाकुओं के नाम से ही थर-थर कांपने लगती हूँ राधू जी।” प्रतिष्ठा ने शिकायत की थी।
“और अब आप देखेंगी कि आप के नाम से लोग थर-थर कांपेंगे।” राधू रंगीला खुश मूड में था। “ऐसी डकैत होंगी आप … आई मीन मॉडर्न डकैत कि …?”
“दर्शकों का मन जीत लेगी।” मानस ने वाक्य पूरा किया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड