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दिल्ली के जूते के नीचे नहीं रहेंगे,भाई जी !!

चलो दिल्ली

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा .

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास -अंश :-

यह २९ अक्टूवर २०१० शुक्रवार का दिन था !

सच में तो मैं किसी भी देवी-देवता -या किसी भी टोना -टोटका का कायल नहीं हूँ ! पर ,हाँ ! परम ब्रम्ह परमात्मा में मेरा अटूट विश्वास है ! वह मेरे साथ हर दम बना ही रहता है . मैं यह जानता हूँ ….और मैं यह भी मानता हूँ …उस ने जो करना है …वह तो करना है !!

पर आज …इस दिन ………इस शुक्रवार के दिन ….उसे न जाने क्या करना था ….? मैं मात्र यह सोच-सोच कर ही रोमांचित हो रहा था !

“चित्त भी …….और पट भी ….! कुछ भी हो सकता है …?” मुझे साल्वे ने बता दिया था . “हाँ…! हमारी तैयारियां मुकम्मल हैं ! हमारे तर्क अचूक हैं ! हमारे पास सबूत है . हम यह सिद्ध कर देंगे कि …अमित शाह का सुहराबुद्दीन …या किसी अन्य की हत्या से …कुछ लेना-देना नहीं है ! और हम ये भी सिद्ध कर देंगे कि …ये सी बी आई का मन गढ़ंत मुकद्दमा है ! ये अमित शाह को फंसाने की साज़िश है ! और इस में ऊंची हस्तीयों का भी हाथ है ! हमारे पास एविडेंस है …लिखित रूप में …यह बताने के लिए कि …अमित शाह का चरित्र हनन किया जा रहा है ! और यह कि …यह एक राजनैतिक शरारत है …जिस में अमित शाह ही नहीं …नरेन्द्र मोदी भी निशाने पर हैं !!”

“बेस्ट आफ लक …..!!” मैंने कांपते हुए होठों से कहा था !

“मुझ पर भरोसा रखिए ….आप ?” साल्वे ने जाते-जाते कहा था . “न्यायालय में न्याय अवश्य मिलता है !” उस का कहना था .

मेरी बिगड़ी हालत तनिक सुधर गई थी !

और उस दिन हाई कोर्ट में जौहर हुए थे !!

देश-प्रदेश की ही नहीं ….विश्व की ताकतें उस दिन तुल कर खड़ीं थीं ! अपने-अपने पक्ष संभाले …उस दिन हर तर्क हाई कोर्ट में आ पहुंचा था ! और दुनियां की हर पहुँच अब जज के सामने आ खड़ी हुई थी ! अचानक अमित शाह एक अपराधी से उठा कर ….आराध्य बन गया था !

“निरी साज़िश का शिकार हुए हैं ,अमित शाह – मई लार्ड !” आवाजें आने लगीं थीं . “इन्हें तो मात्र इस लिए फंसाया जा रहा है कि ये …….”

“हत्यारे हैं ….!! इन्होने …निर्दोष लोगों की जानें ली हैं ! ये …इतने शातिर हैं ….माई लार्ड …कि …अपने मातहत पुलिस कर्मियों से … इन्होने कुकृत्य कराए ….उन्हें प्रमोशन …और पद-प्रतिष्ठा का लालच दिया ….और गलत सूचनाएं थमा कर …बे-गुनाहों के गले चाक करा दिए ! और ये सब के सब …कोल्ड ब्लडीड …मर्डर …हैं , योर ओनर …! इन के इशारों पर ….पुलिस वालों ने जो नर-संहार किए हैं …शर्मनाक हैं !! जो साम्प्रदायिकता के बीज इन्होने बोये हैं …उन की नफ़रत की फसल …हमारी न जाने कितनी पीढ़ियों को काटनी होगी …? हिन्दू-मुसलमान के भाईचारे के …ये हत्यारे हैं ! आज देश जिस कगार पर आ खड़ा हुआ है ….उस के लिए यही जिम्मेदार हैं …..”

“कैसे ….? सबूत ….?” जज ने मांग की थी .

“ये देखिए ….मीडिया की रिपोट …! अखबार ….और ये देखिए …..”

“सब का सब मन गढ़ंत है , योर ओनर …..! सी बी आई के ये सब …तोते हैं …..”

छोटी सी एक हंसी कोर्ट के परिसर के आर-पार तक निकल गई थी !

“आप का कोई तोता नहीं है ….?”

“है, योर ओनर ….!” फिर से वही हंसी लौटी थी . “मेरे पास सबूत है ! ये देखिए ….और ये लीजिए ….और ये भी पढ़िए ….! पुलिस वालों को जेल में जा-जा कर …खरीदा जा रहा है , मई लार्ड !!”

घमासान युद्ध चल रहा था ! तर्क के तराजू पर न्याय तुल रहा था … ! कभी डंडी …इधर …तो कभी डंडी उधर …! जज सहाब भी विभ्रम में थे ! दोनों पक्षों की दलीलें कारगर थीं . दोनों पक्षों के पास सबूत भी थे . और दोनों पक्षों का न्याय पाने का हक़ भी बराबर का था …?

” लगता है कि ….अमित शाह को बेल मिलनी चाहिए ….!” हाई कोर्ट की बेंच कह रही थी . “लेट अस ..हैव …ए ..फैअर गेम …? लेट द …ट्रायल प्रूव द केस ….!!” जज उठ गए थे .

अमित शाह को बेल मिल गई थी …..!!

शुकवार का ये २९ अक्टूवर का दिन बहुत ही लंबा हो गया था !

आज रात हो कर ही न दे रही थी ? आज कोई सोना ही न चाह रहा था ! आज हर कोई टी वी और मीडिया को सुनने में व्यस्त था ! आज सब समझ लेना चाहते थे कि …सच् क्या था …और झूठ क्या था …? अमित शाह क्या वास्तव में ही एक हत्यारा था – आम प्रश्न पैदा हो गया था …!

“नहीं,नहीं ! हाई कोर्ट का फैसला गलत है ! सब बिकाऊ हैं ! नरेन्द्र मोदी ने सौदा किया है !” नौबत यहाँ तक पहुँच गई थी .

“जस्टिस आफ्ताव आलम ……!!” किसी ने इस नाम को एक नारे की तरह बुलंद किया था . “चलते हैं ..! न्याय माँगते हैं …!! उन को बताते हैं …कि उन की ही नाक के नीचे …हाई कोर्ट क्या-क्या गेम खेल रहा है …? किस कदर नरेन्द्र मोदी का जादू …न्याय की आँखों पर पट्टी बाँध कर …अपराधी अमित शाह को ….”

“कल शनिवार है ! फिर इतवार है …!!” कानून विद बोले थे . “कुछ नहीं हो सकता ! कोर्ट बंद है !!”

“होगा …? ज़रूर होगा ….???” एक व्यक्ति अखाड़े में कूदा था . “जस्टिस आफ्ताव आलम को आप लोग जानते नहीं ….? इतने जीवट वाला इंसान मैंने आज तक देखा नहीं ? चलो ! अर्जी …लिखो !!”

“लेकिन ….कोर्ट ….?”

“उन का घर तो है ….? वो …तो हैं …?” उस आदमी की दलील थी . “काम होगा …! ये ..बेल केनसिल ….कराएंगे …! हाथों …हाथ ….और हम ….”

“नहीं होगी …..?”

“होगी ….!!! और अगर न होगी तो ….पूरा देश जलेगा …..! फिर से ‘गोधरा’ होगा ….? फिर से …..”

हवा में गर्मी थी . रात जाग रही थी ….!!

“मैं भी सो न पा रहा था ….!!” जस्टिस आफ्ताव आलम कह रहे थे . “कैसे ….कैसे …हुई बेल ….? इस अपराधी को तो देश निकाला मिलेगा …! ही …इज …टू बी ….हैंग्ड ….!!” उन का कहना था . “मैं देखता हूँ ! लाओ ! अर्जी …दो …!! देखता हूँ ….कि ….”

और देखते ही देखते …..जस्टिस आफ्ताव आलम ने …अपने घर पर ही कोर्ट की कारवाही आरम्भ कर दी थी !

“अमित शाह को …गुजरात से बाहर उस समय तक रखा जाए …जब तक कि उस की बेल कनफर्म ..न हो जाए …! सी बी आई हाई कोर्ट के फैसले से सन्तुष्ट नहीं है ! अत ह ..इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी …! इस हालत में अमित शाह …..”

क्या-क्या बालाएं न थीं ….? मैं तो हैरान था …..?

गले मिलते मुझे और अमित शाह को ….पुलिस ने आ कर अलग कर दिया था ….!!

“आप को प्रदेश छोड़ कर जाना होगा ……?” अमित से उन का कहना था . “जस्टिस आफ्ताव आलम के …..आदेश …..”

अमित गुजरात में नहीं रहेगा – अजीब-सी बात थी !

लेकिन अमित जहाँ भी रहेगा ….गुजरात का ही हो कर रहेगा – यह भी मैं जानता था !

“आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं …!” अमित की आवाज़ में ख़ुशी की एक खनक थी . “मैं और सेजल दिल्ली रहेंगे …!” वो बता रहा था . “पहले आप ने दिल्ली में …गुप्तवास काटा …. अब हम रहेंगे ….?” वह मज़ाक कर रहा था . “आई नीड ….सम …रेस्ट …!!” वह बता रहा था . “सेजल साथ रहेगी तो …कुछ राहत मिलेगी …..” वह फिल्ल-फिल्ल कर हंस पड़ा था .

“पाजी ….!!” मैंने उसे कन्धों पर पीटा था . “नौटी …ब्बोय ….!!” मैंने प्रसन्नता से कहा था . “लेकिन ……”

“आप का काम …..पहले …!” अमित ने वायदा किया था . “मैं भूलता कब हूँ, भाई जी ….? मुझे भी चिंता है ! मेरे पास योजना है !! फिक्र न करें ….आप ….” वह मुस्करा रहा था . “ये …महाशय …आफ्ताव आलम …खुद भी नहीं जानते कि …ये क्या कर बैठे ….?” उस ने चुटकी ली थी . “होतव्य के हाथ …बहुत लम्बे होते हैं, भाई जी ! हमारा शुभ हो रहा है ! एक के बाद दूसरे दुश्मन के ताश खुलते जा रहे हैं ….” वह बताता रहा था .

“लिस्ट तो लिख रहे हो , ना …..?” मैने पूछा था .

अमित हंस कर चला गया था ….!!

लेकिन मैं अपने सोच को मुट्ठियों में भरे चुपचाप खड़ा ही रहा था …!

संघर्ष अभी समाप्त कब हुआ था ? अभी तो वह आने को था …! आरम्भ होने के लिए इजाज़त मांग रहा था ! हंस रहा था …और मेरी सामर्थ मुझे बता रहा था …! मैंने आँख उठा कर देखा था …तो …मुझे चुनौतियाँ खड़ी दिखाई दी थीं …! चुनौतियाँ -ही-चुनौतियाँ ….जो मेरे लिए अब नई तो न थीं ….पर थीं – भ्रामक ? जनता ….और जन-मत …एक हवा थे …? कब …किधर मुड जाएं – इन का कोई भरोसा नहीं ….?

“अब हम …ज्यादा दिन …दिल्ली के जूते के नीचे नहीं रहेंगे , भाई जी ….?” और एक अमित था कि घोषणा किए जा रहा था . “अब हमें …..” वह रुका था . उस ने मेरे चहरे को पढ़ा था . “अब हमें …दिल्ली चलने की मुहीम …..?” वह खड़ा-खड़ा मुझ से उत्तर मांग रहा था !!

……………………………………………

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!

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कानू और सेल्फ़ी

selfi with dog

पाउट बनाओ!.. क्लिक करो!.. ये!!!.. कितना अच्छा सेल्फी आया है.. इसको अपने फेसबुक एकाउंट पर अपलोड करेंगें। और सब खुश हो जाते हैं। आजकल के ज़माने में इतनी बिजी ज़िन्दगी होते हुए.. अपने आप को खुश करने का अच्छा तरीका है। आजकल तो सारी दुनिया मीडिया पर ही सिमट कर रह गई है। अपनी और अपने परिवार के साथ तस्वीरें हम लोग अपने दोस्तों के साथ आराम से सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं.. और अपनी खुशी में सबको पल भर में शामिल भी कर डालते हैं। अच्छा तरीका है.. समाज के साथ घुल-मिल कर रहने का। हमारे ज़माने में ये मोबाइल वगरैह तो थे.. नहीं.. घर में कैमरे हुआ करते थे.. जब भी कहीं घूमने गए.. तो फोटो वगरैह खींच कर एल्बम में लगा लिया करते थे.. जब कभी मन हुआ एल्बम खोला और खुश हो लिये। आजकल सभी के हाथों में छोटे से लेकर बड़े तक मोबाइल फ़ोन रहता है.. जब मन चाहे कभी भी पिक्चर क्लिक किया.. और अपनी प्यारी सी फ़ोटो देख कर खुश हो लिये।

हमारे यहाँ भी बच्चे अपने-अपने मोबाइल फ़ोन से फ़ोटो खींचने में व्यस्त रहते हैं।जब मन चाहे जब ही अपना सेल्फ़ी खींच कर अपने फेसबुक अकॉउंट पर अपलोड कर दोस्तों के अच्छे-अच्छे कमेंट्स के खूब मज़े लेते हैं। घर बैठे अपनों के साथ खुशी बाँटने का तरीका बहुत अच्छा है।

एक बात तो नोट करने की है.. और वो ये.. कि हमारी प्यारी सी कानू भी यही चीज़ देखती रहती है.. और सोच में डूब जाती है.. कानू की छोटी सी और प्यारी सी गुलाब जामुन जैसी नाक पर चिन्ता दिखाई देने लग जाती है। कानू अक़्सर यही सोचती रहती है,” ये दीदी भइया.. जब देखो ये बड़ा सा शीशा अपने मुहँ के आगे लेकर खड़े हो जाते हैं.. अजीब सी शक्ल बना कर ख़ुद ही खुश भी हो लेते हैं।

हमनें भी अक्सर यही बात नोट की है.. जब भी हमारे बच्चे सेल्फ़ी ले रहे होते हैं.. तो हमारी छोटी सी बिटिया कानू भी इधर-उधर से प्यारा सा छोटा सा मुहँ बनाकर दीदी और भइया को देखती रहती है.. और अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए… अक़्सर उनके पास चली जाया करती है.. थोड़ी सी अपनी गर्दन टेढ़ी कर प्यारी कानू समझने की कोशिश करती है.. कि हो क्या रहा है। कभी-कभी अपनी गर्दन थोड़ा सा ऊपर करके भी देखने की कोशिश करती है.. कानू!

हम दूर बैठे अपनी नन्ही सी गुड़िया को परेशान होता कई दिनों से देख रहे थे.. अब हमसे अपनी छोटी सी बिटिया की परेशानी देखी न गई.. तो हमनें एक दिन कानू को झट्ट से अपनी गोद में बिठा कर एक प्यारी सी सेल्फ़ी ले डाली। कानू के साथ गाल से गाल लगाकर हमारी और कानू की बहुत प्यारी सेल्फ़ी आई थी। कानू को सेल्फ़ी का तो पता न चला था.. पर हमारे गाल से गाल लगाकर प्यारी कानू बहुत खुश हुई थी। हम समझ गए थे.. कि अभी कानू का डाउट क्लियर नहीं हुआ है। इसलिये हमनें बच्चों को भी कानू संग सेल्फ़ी लेने को कहा था.. ठीक उसी तरह जिस तरह से वो अपनी सेल्फ़ी क्लिक करते हैं। बच्चों ने हमारे कहे मुताबिक ही अपनी छोटी बहन कानू संग बहुत सारी सेल्फ़ी क्लिक करीं थीं।

अब कानू तो बचपन से ही इंटेलीजेंट है.. सेल्फ़ी क्लिक करने के तरीके से ही समझ गई थी.. कि दीदी भइया वही कर रहें हैं.. जो कानू उन्हें करते हुए देखती थी। यानी अब कानू-मानू के सारे डाउट क्लियर हो चले थे.. और कानू सेल्फ़ी खिंचवाते हुए.. खुश हो गई थी।

जैसे ही कानू दीदी-भइया के हाथ में मोबाइल फ़ोन देखती.. झट्ट से अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए.. सेल्फ़ी खिंचवाने पहुँच जाती।

हम और हमारी प्यारी कानू सेल्फ़ी खिंचवाते हुए.. खुश थे.. हमनें कानू संग ढ़ेर सारी सेल्फ़ी खींचकर उनका बड़ा सा कोलाज बना डाला था.. यूँहीं अपनी प्यारी कानू की यादों को सेल्फ़ी में बटोरते और कानू का प्यार अपने संग अमर करते एक बार फ़िर हम सब चल पड़े थे.. कानू के साथ।

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खानदान 58

indian wedding

दर्शनाजी की पहले वाली दस-लाख की प्रोपर्टी बिक्कर पैसा तो सारा ठिकाने लग गया था। इस पैसे के पीछे कोइ दिन जाता होगा.. अदालत तो रोज़ ही चलती थी। जो रमेश के हाथ में बचा था.. वो तो रमेश फ़टाफ़ट निपटा ही रहा था।

“ ओ पैसे!.. कित गए!”।

दर्शनाजी ने रमेश से सवाल किया था।

“ तेरे ताईं दे दिये.. और तेरे रिश्तेदार मेरे धोरे माँग की खा गए!”।

रमेश ने अपनी माँ को सफ़ाई देते हुए बताया था, कि.. दस-लाख में से उनके बैंक में डलवा दिये.. और काफ़ी उनके ही रिश्तेदारों में बंट गए। कहने का मतलब यह था.. पैसा ठिकाने लग गया। अभी दर्शनाजी की ज़मीन का मामला यहीँ खत्म नहीं हुआ था.. अभी तो उनके पिता की ज़मीन कई जगह और बिकनी बाकी थी। रमेश ने एक बार फ़िर से शिवजी नाम के पटवारी से माँ से पूछे बग़ैर ही बयाना ले लिया था। “ यह पटवारी आपको ऐसे-कैसे अम्माजी से पूछे बग़ैर एडवांस दे देता है”। सुनीता ने रमेश से पूछा था।

“ मुझे पता है.. क्या करना है!.. ये औरत तो बेवकूफ़ है.. इसको गियर में लेना मुझे अच्छी तरह से आता है.. इसकी सारी ज़मीन मैं ही लूँगा!

रमेश ने सुनीता को दर्शनाजी की एक तरह से पूरी ज़मीन हड़पने का प्लान बताया था.. पर सुनीता रमेश की बात सुनकर थोड़ी हैरान थी.. और उसको रमेश की बातें अच्छी भी नहीं लग रहीं थीं। “ अगर ये अपनी माँ की पूरी ज़मीन खा लेगा.. तो आगे चलकर इस घर के लीगल हिस्सेदारी में से अपना नाम उड़वा देगा। इसकी माँ शातिर दिमाग़ औरत है.. जानती है.. उड़ा खाएगा.. और जो कमी रह जाएगी.. वो तो सासू-माँ खुद ही पूरा करने में एक्सपर्ट हैं। ये औरत जान-बूझ कर इसके हाथ खून से रंगकर फ़िर इसको लात मारेगी”।

सुनीता दर्शनाजी और रमेश को लेकर मन ही मन सोच रही थी। वैसे अंदाज़ा तो सही लगा रही थी.. सुनीता!.. और सोचने वाली बात तो यह थी.. कि जब दर्शनाजी भली-भाँति जानती थीं.. कि रमेश पैसों का सही इस्तेमाल नहीं करेगा, तो फ़िर हर बार ज़मीन बेचने के लिये रमेश का ही चयन क्यों किया.. विनीत और रामलालजी भी तो थे। इसी को तो कहते हैं.. मास्टर-माइंड। वाकई! थी.. तो बन्दी मास्टर माइंड ही.. दिमाग़ के मामले में तो अच्छे-अच्छे को पीछे छोड़ रही थी।

अब खैर! जो भी ही!.. दो बच्चे साथ में थे.. परिवार नाटकबाज था.. रामलालजी के हाथ से फैक्ट्री वालों के हिसाब के पैसे छूटते नहीं थे.. सारा तमाशा मध्य-नज़र रखते हुए.. पैसे तो आ ही रहे थे.. और शाही ठाठ चल रहे थे। इस शाही ठाठ को लेकर एक बार मुकेशजी ने सुनीता से कहा भी था,” जैसा पैसा घर मे आता है.. वैसी ही मानसिकता भी लाता है!”।

बात तो पिताजी सही कह रहे थे.. पर सुनीता के आगे माँ-बापू की पगड़ी और रमेश के संग घर बसाने का वादा भी था। अब ज़्यादा सोचने का फ़ायदा कोई न था.. अब जैसा भी था.. रमेश वाला रास्ता ही सही था। फ़िर भी सुनीता ने एक दिन बातों-बातों में रमेश से पूछ ही लिया था,” अम्माजी ने इतनी बड़ी रकम आपके बैंक में ट्रांसफ़र कर कैसे दी!”।

“ अरे! मैने इसे बेवकूफ़ बनाया था.. इसने तो कहा था.. मेरे बैंक में ट्रांसफर कर दे.. मैंने ही बोल दिया था.. चार हज़ार रुपये का ड्राफ्ट बनेगा.. चार हज़ार सुनते ही.. इसके होश उड़ गए.. और इसने मेरे बैंक में ट्रान्सफर करवा दिये”।

रमेश ने सुनीता को बताया था।

“ लगती तो नहीं है.. ये बेवकूफ़!.. पर चलो!.. बन गई होगी!”। सुनीता ने दर्शनाजी के लिये मन ही मन सोचा था।

दूसरी बार की ज़मीन भी रमेश ने आठ-लाख में बेची थी.. और उस बार दर्शनाजी को शायद कुछ भी नहीं दिया था। पर हाँ! अपनी माँ के मायके में रमेश ने नोटों के लड्डू खूब बाँटे थे। पूरे आठ-लाख रुपये आये थे.. रमेश के बैंक में। नोटों का बैंक भरा देख रमेश फूला ही नहीं समाता था। आठ-लाख रुपये एकदम आदमी के बैंक में भर जाएँ तो पैर तो ज़मीन से ऊपर हो ही जाते हैं। दिल्ली में हर बार कितने की ज़मीन बिक रही है.. इस बात की सबको खबर होती थी.. रमेश मुकेशजी और परिवार में ख़ुद ही सारी जानकारी देकर आता था।

इधर सुनीलजी ने वज़न कम करने का नया बिसनेस शुरू किया था.. जिसमें उन्होंने रमेश को भी शामिल होने के लिये आमंत्रित किया था.. हालाँकि सुनीता जानती थी.. कि यह निर्णय ग़लत है.. और रमेश काम करने वालों में से नहीं है.. वो सिर्फ शो-शा करेगा.. और अपना पैसा देखायेगा.. पर यह अंदर की बात थी.. और सुनीता किसी से कह न पाई थी.. रमेश ने सुनील जी के साथ काम शुरू किया था।

हर इतवार रमेश दिल्ली meetings अटेंड करने आने लगा था। इंदौर में भी पता था.. कि रमेश दिल्ली में अपने साले के साथ काम कर रहा है.. पर किसी ने भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं उठाया था.. सोचने वाली बात तो यह थी.. कि घर में फैक्ट्री खड़ी है.. और यह कोई अनजान ही काम शुरू कर रहा है.. बाप-भाई कुछ बोल ही नहीं रहे!.. दाल में रमेश को लेकर कुछ काला था.. सुनीता की सोच सही जा रही थी.. रमेश आगे चलकर किसी फैक्ट्री का हिस्सेदार साबित नहीं होता.. जिसमें रमेश के परिवार का ही हाथ था।

खैर! जो भी हो.. काम के सिलसिले में रमेश का हैदराबाद जाना तय हो गया था..  जिसका ढिंढ़ोरा रमेश ने पूरे घर में पीट दिया था। हैदराबाद जाने से पहले एक शाम दर्शनाजी ने घर में जमकर गाली- गलौच और झगड़ा करवाया था।

अगले  दिन रात को किसी जानकार ने फोन किया था,” रमेश को रोड पर कोई हौंडा-सीटी वाला मार गया है.. शायद पैर टूट गया है.. एम्बुलेंस बुलाई है.. जल्दी आ जाओ!”।

विनीत और रामलालजी समय पर घटना स्थल पर पहुँचकर रमेश को अस्पताल ले गए थे।

“ मुझे दो लाख रुपयों की ज़रूरत है!”।