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दिल्ली के जूते के नीचे नहीं रहेंगे,भाई जी !!

चलो दिल्ली

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा .

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास -अंश :-

यह २९ अक्टूवर २०१० शुक्रवार का दिन था !

सच में तो मैं किसी भी देवी-देवता -या किसी भी टोना -टोटका का कायल नहीं हूँ ! पर ,हाँ ! परम ब्रम्ह परमात्मा में मेरा अटूट विश्वास है ! वह मेरे साथ हर दम बना ही रहता है . मैं यह जानता हूँ ….और मैं यह भी मानता हूँ …उस ने जो करना है …वह तो करना है !!

पर आज …इस दिन ………इस शुक्रवार के दिन ….उसे न जाने क्या करना था ….? मैं मात्र यह सोच-सोच कर ही रोमांचित हो रहा था !

“चित्त भी …….और पट भी ….! कुछ भी हो सकता है …?” मुझे साल्वे ने बता दिया था . “हाँ…! हमारी तैयारियां मुकम्मल हैं ! हमारे तर्क अचूक हैं ! हमारे पास सबूत है . हम यह सिद्ध कर देंगे कि …अमित शाह का सुहराबुद्दीन …या किसी अन्य की हत्या से …कुछ लेना-देना नहीं है ! और हम ये भी सिद्ध कर देंगे कि …ये सी बी आई का मन गढ़ंत मुकद्दमा है ! ये अमित शाह को फंसाने की साज़िश है ! और इस में ऊंची हस्तीयों का भी हाथ है ! हमारे पास एविडेंस है …लिखित रूप में …यह बताने के लिए कि …अमित शाह का चरित्र हनन किया जा रहा है ! और यह कि …यह एक राजनैतिक शरारत है …जिस में अमित शाह ही नहीं …नरेन्द्र मोदी भी निशाने पर हैं !!”

“बेस्ट आफ लक …..!!” मैंने कांपते हुए होठों से कहा था !

“मुझ पर भरोसा रखिए ….आप ?” साल्वे ने जाते-जाते कहा था . “न्यायालय में न्याय अवश्य मिलता है !” उस का कहना था .

मेरी बिगड़ी हालत तनिक सुधर गई थी !

और उस दिन हाई कोर्ट में जौहर हुए थे !!

देश-प्रदेश की ही नहीं ….विश्व की ताकतें उस दिन तुल कर खड़ीं थीं ! अपने-अपने पक्ष संभाले …उस दिन हर तर्क हाई कोर्ट में आ पहुंचा था ! और दुनियां की हर पहुँच अब जज के सामने आ खड़ी हुई थी ! अचानक अमित शाह एक अपराधी से उठा कर ….आराध्य बन गया था !

“निरी साज़िश का शिकार हुए हैं ,अमित शाह – मई लार्ड !” आवाजें आने लगीं थीं . “इन्हें तो मात्र इस लिए फंसाया जा रहा है कि ये …….”

“हत्यारे हैं ….!! इन्होने …निर्दोष लोगों की जानें ली हैं ! ये …इतने शातिर हैं ….माई लार्ड …कि …अपने मातहत पुलिस कर्मियों से … इन्होने कुकृत्य कराए ….उन्हें प्रमोशन …और पद-प्रतिष्ठा का लालच दिया ….और गलत सूचनाएं थमा कर …बे-गुनाहों के गले चाक करा दिए ! और ये सब के सब …कोल्ड ब्लडीड …मर्डर …हैं , योर ओनर …! इन के इशारों पर ….पुलिस वालों ने जो नर-संहार किए हैं …शर्मनाक हैं !! जो साम्प्रदायिकता के बीज इन्होने बोये हैं …उन की नफ़रत की फसल …हमारी न जाने कितनी पीढ़ियों को काटनी होगी …? हिन्दू-मुसलमान के भाईचारे के …ये हत्यारे हैं ! आज देश जिस कगार पर आ खड़ा हुआ है ….उस के लिए यही जिम्मेदार हैं …..”

“कैसे ….? सबूत ….?” जज ने मांग की थी .

“ये देखिए ….मीडिया की रिपोट …! अखबार ….और ये देखिए …..”

“सब का सब मन गढ़ंत है , योर ओनर …..! सी बी आई के ये सब …तोते हैं …..”

छोटी सी एक हंसी कोर्ट के परिसर के आर-पार तक निकल गई थी !

“आप का कोई तोता नहीं है ….?”

“है, योर ओनर ….!” फिर से वही हंसी लौटी थी . “मेरे पास सबूत है ! ये देखिए ….और ये लीजिए ….और ये भी पढ़िए ….! पुलिस वालों को जेल में जा-जा कर …खरीदा जा रहा है , मई लार्ड !!”

घमासान युद्ध चल रहा था ! तर्क के तराजू पर न्याय तुल रहा था … ! कभी डंडी …इधर …तो कभी डंडी उधर …! जज सहाब भी विभ्रम में थे ! दोनों पक्षों की दलीलें कारगर थीं . दोनों पक्षों के पास सबूत भी थे . और दोनों पक्षों का न्याय पाने का हक़ भी बराबर का था …?

” लगता है कि ….अमित शाह को बेल मिलनी चाहिए ….!” हाई कोर्ट की बेंच कह रही थी . “लेट अस ..हैव …ए ..फैअर गेम …? लेट द …ट्रायल प्रूव द केस ….!!” जज उठ गए थे .

अमित शाह को बेल मिल गई थी …..!!

शुकवार का ये २९ अक्टूवर का दिन बहुत ही लंबा हो गया था !

आज रात हो कर ही न दे रही थी ? आज कोई सोना ही न चाह रहा था ! आज हर कोई टी वी और मीडिया को सुनने में व्यस्त था ! आज सब समझ लेना चाहते थे कि …सच् क्या था …और झूठ क्या था …? अमित शाह क्या वास्तव में ही एक हत्यारा था – आम प्रश्न पैदा हो गया था …!

“नहीं,नहीं ! हाई कोर्ट का फैसला गलत है ! सब बिकाऊ हैं ! नरेन्द्र मोदी ने सौदा किया है !” नौबत यहाँ तक पहुँच गई थी .

“जस्टिस आफ्ताव आलम ……!!” किसी ने इस नाम को एक नारे की तरह बुलंद किया था . “चलते हैं ..! न्याय माँगते हैं …!! उन को बताते हैं …कि उन की ही नाक के नीचे …हाई कोर्ट क्या-क्या गेम खेल रहा है …? किस कदर नरेन्द्र मोदी का जादू …न्याय की आँखों पर पट्टी बाँध कर …अपराधी अमित शाह को ….”

“कल शनिवार है ! फिर इतवार है …!!” कानून विद बोले थे . “कुछ नहीं हो सकता ! कोर्ट बंद है !!”

“होगा …? ज़रूर होगा ….???” एक व्यक्ति अखाड़े में कूदा था . “जस्टिस आफ्ताव आलम को आप लोग जानते नहीं ….? इतने जीवट वाला इंसान मैंने आज तक देखा नहीं ? चलो ! अर्जी …लिखो !!”

“लेकिन ….कोर्ट ….?”

“उन का घर तो है ….? वो …तो हैं …?” उस आदमी की दलील थी . “काम होगा …! ये ..बेल केनसिल ….कराएंगे …! हाथों …हाथ ….और हम ….”

“नहीं होगी …..?”

“होगी ….!!! और अगर न होगी तो ….पूरा देश जलेगा …..! फिर से ‘गोधरा’ होगा ….? फिर से …..”

हवा में गर्मी थी . रात जाग रही थी ….!!

“मैं भी सो न पा रहा था ….!!” जस्टिस आफ्ताव आलम कह रहे थे . “कैसे ….कैसे …हुई बेल ….? इस अपराधी को तो देश निकाला मिलेगा …! ही …इज …टू बी ….हैंग्ड ….!!” उन का कहना था . “मैं देखता हूँ ! लाओ ! अर्जी …दो …!! देखता हूँ ….कि ….”

और देखते ही देखते …..जस्टिस आफ्ताव आलम ने …अपने घर पर ही कोर्ट की कारवाही आरम्भ कर दी थी !

“अमित शाह को …गुजरात से बाहर उस समय तक रखा जाए …जब तक कि उस की बेल कनफर्म ..न हो जाए …! सी बी आई हाई कोर्ट के फैसले से सन्तुष्ट नहीं है ! अत ह ..इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी …! इस हालत में अमित शाह …..”

क्या-क्या बालाएं न थीं ….? मैं तो हैरान था …..?

गले मिलते मुझे और अमित शाह को ….पुलिस ने आ कर अलग कर दिया था ….!!

“आप को प्रदेश छोड़ कर जाना होगा ……?” अमित से उन का कहना था . “जस्टिस आफ्ताव आलम के …..आदेश …..”

अमित गुजरात में नहीं रहेगा – अजीब-सी बात थी !

लेकिन अमित जहाँ भी रहेगा ….गुजरात का ही हो कर रहेगा – यह भी मैं जानता था !

“आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं …!” अमित की आवाज़ में ख़ुशी की एक खनक थी . “मैं और सेजल दिल्ली रहेंगे …!” वो बता रहा था . “पहले आप ने दिल्ली में …गुप्तवास काटा …. अब हम रहेंगे ….?” वह मज़ाक कर रहा था . “आई नीड ….सम …रेस्ट …!!” वह बता रहा था . “सेजल साथ रहेगी तो …कुछ राहत मिलेगी …..” वह फिल्ल-फिल्ल कर हंस पड़ा था .

“पाजी ….!!” मैंने उसे कन्धों पर पीटा था . “नौटी …ब्बोय ….!!” मैंने प्रसन्नता से कहा था . “लेकिन ……”

“आप का काम …..पहले …!” अमित ने वायदा किया था . “मैं भूलता कब हूँ, भाई जी ….? मुझे भी चिंता है ! मेरे पास योजना है !! फिक्र न करें ….आप ….” वह मुस्करा रहा था . “ये …महाशय …आफ्ताव आलम …खुद भी नहीं जानते कि …ये क्या कर बैठे ….?” उस ने चुटकी ली थी . “होतव्य के हाथ …बहुत लम्बे होते हैं, भाई जी ! हमारा शुभ हो रहा है ! एक के बाद दूसरे दुश्मन के ताश खुलते जा रहे हैं ….” वह बताता रहा था .

“लिस्ट तो लिख रहे हो , ना …..?” मैने पूछा था .

अमित हंस कर चला गया था ….!!

लेकिन मैं अपने सोच को मुट्ठियों में भरे चुपचाप खड़ा ही रहा था …!

संघर्ष अभी समाप्त कब हुआ था ? अभी तो वह आने को था …! आरम्भ होने के लिए इजाज़त मांग रहा था ! हंस रहा था …और मेरी सामर्थ मुझे बता रहा था …! मैंने आँख उठा कर देखा था …तो …मुझे चुनौतियाँ खड़ी दिखाई दी थीं …! चुनौतियाँ -ही-चुनौतियाँ ….जो मेरे लिए अब नई तो न थीं ….पर थीं – भ्रामक ? जनता ….और जन-मत …एक हवा थे …? कब …किधर मुड जाएं – इन का कोई भरोसा नहीं ….?

“अब हम …ज्यादा दिन …दिल्ली के जूते के नीचे नहीं रहेंगे , भाई जी ….?” और एक अमित था कि घोषणा किए जा रहा था . “अब हमें …..” वह रुका था . उस ने मेरे चहरे को पढ़ा था . “अब हमें …दिल्ली चलने की मुहीम …..?” वह खड़ा-खड़ा मुझ से उत्तर मांग रहा था !!

……………………………………………

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!

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मैं नहीं मरूंगा, पगले !!

नमो

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास अंश :-

चुनाव लड़ने की कला को आत्मसात करने के बाद ही वह भाई जी का दाहिना हाथ बन गया था ! वो भी जांन गए थे कि अमित अब अचूक निशाने मारने लगा था ! अब तक के लडे अट्ठाईस चुनावों में से वह एक भी चुनाव न हारा था ….?

“इस सब का श्रेय भाई जी को जाता है !” अमित ने स्वीकारा था . “और अगर अमला की अभिलाषा कभी पूरी हुई …तो वो भी भाई जी के हाथों ही होगी ! कांग्रेस का बस्ता भी भाई जी ही बाधेंगे !” वह प्रसन्न था . “बघेला …और केशू भाई भी तो दो दिग्गज ही थे …? दोनों उच्च कोटि के नेता थे …!! लेकिन भाई जी के साथ भिड़ते ही ….जौंक की तरह …पानी हो गए थे …? उन के व्यक्तिगत स्वार्थ उन्हें खा गए …!” अमित ने असली बीमारी पर उंगली धरी थी . “भाई जी …जो भी करते हैं – निस्वार्थ करते हैं ! सब के हित में और सब के लिए करते हैं !” उस ने निचोड़ निकाला था . “मैं भी बाहर निकल कर …फिर से ..बढ़-चढ़ कर वही करूंगा … जो भाई जी चाहते हैं ! हिन्दू राष्ट्र के विचार को अब हम छोटा न होने देंगे !” उस ने स्वयं से कहा था .

अमित की आँख अचानक ही दिल्ली की ओर मुड गई थी !

अमित की बेल को ले कर एक भीषण बबाल खड़ा हो गया था !

“केंद्र के तेवर तीखे हैं !” मुझे मेरे नियुक्त अधिवक्ता बता रहे थे . “केंद्र नहीं चाहता कि …अमित को बेल मिले ….?”

“क्यों ….?”

“इस लिए कि …अमित को एक …घोर साम्प्रदायिक तत्व के रूप में देखा जा रहा है !” मुझे बताया जा रहा था . “देश के गण-मान्य लोग , विचारक …विधिवेत्ता …और राज-नेता ये मानने लगे हैं कि …ये आदमी – सो कॉल्ड ‘अमित शाह’ ..पूरे देश को साम्प्रदायिकता की आग में …अकेले हाथों झोंक देगा ! अगर इसे जेल से रिहा कर दिया तो …..”

मेरा दिमाग घूमने लगा था ! घोर निराशा ने आ कर मुझे अँधा बना दिया था ! क्रोध था ….जी हाँ ! क्रोध था -जो मुझे सब कुछ जला कर राख करने की सलाह दे रहा था ! अमित के प्रति मेरा लगाव और प्यार मुझे बहुत तंग कर रहा था …! और जो मेरी राजनीतिक मज़बूरियाँ थीं …वो तो मुझ से भी बडी थीं ? मैं मात्र एक राज्य का मुख्य मंत्री ही तो था ….?

“लेकिन मुझे हर कीमत पर अमित की बेल चाहिए ….!” मैंने अपना मंसूबा कह सुनाया था .

चुप्पी छा गई थी ! सब उपस्थित लोगों को सांप सूंघ गया था ! मेरे मुख्य सलाहकार साल्वे का चेहरा पीला पड़ गया था !

“आप …समझ नहीं रहे हैं ….सर …कि …” साल्वे ने मुझे समझाना चाहा था . “आज पूरा देश दो गुटों में बंटा खड़ा है ! हिन्दू-मुसलमान की विभाजन रेखा …को अमित शाह ने रेखांकित कर दिया है ! साम्प्रदायिक सोच …नफ़रत …वैमनष्य और विग्रह …उस मोड़ पर आ कर खड़े हैं ….जहाँ देश खंड-खंड हो कर बिखर सकता है ….? और …..”

“नोंनसेन्स ….!!” मैं गरजा था . “ये सब मन-गढ़ंत कहानियां हैं , वकील साहब ! अमित शाह वैसा कोई ऐरा-गैरा , नत्थू खैरा …नहीं है ! वह मिनिस्टर है , मेरा ? वह एक जिम्मेदार नागरिक है …इस देश का …? इन आती …उड़ती …अफवाहों …के चक्कर में न आएं आप ….! पत्रकार ….मीडिया …और पार्टियाँ …सब मिले हुए हैं ! सब को ….”

“लेकिन ….क्यों ….?” साल्वे ने जोर दे कर पूछा था . उन्हें मुझ पर भी शक था .

“इसलिए कि ….चोरों को …मोदी नहीं चाहिए …!” मैंने भी दो टूक उत्तर दिया था . “आज जो साजिश चल रही है ….आप उसे समझ नहीं पा रहे हैं ….? लेकिन मैं साफ़-साफ़ देख रहा हूँ …कि …देश ….”

“जन-मत ….?”

“जुटाऊंगा ….जन-मत भी …..!!” मैंने टीस कर कहा था . “फिलहाल तो मुझे अमित की बेल चाहिए ….! एट ….एनी …कौस्ट …आई …वांट हिम …आऊट ….!!” अब मैंने आदेश दिए थे .

मैं अकेला था . निपट अकेला था – मैं ! लेकिन अनंत की आवाजें मुझे कभी भी इस तरह …निराश-उदास देख कर …चली आतीं थीं ! और तब मैं अकेला न रह जाता था !

“हिन्दू -मुसलमान का मसला बड़े-बड़े पेच खा गया है !” मैं अपने गुरु जी श्री अवधूत जी महाराज की आवाजें अचानक ही सुनने लगा था . बड़ी ही मनहूस घडी थी वो ….जब ये इस्लाम भारत आया था ….और हमने इस का आगत-स्वागत किया था ….?” उन की आवाज़ में दर्द था . “हमारी संस्कृति ….संस्कार ….और सभ्यता …गंगा जल से पवित्र हैं ! ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का मंत्र …हमारे दिमाग की ही उपज है ! संकारों से ही हम बड़े हैं ….विस्तृत हैं ….विशाल हैं ! और ये बाहर के लोग ….?” वो रुके थे .

“लालची हैं …!” मैंने एक शब्द सुझाया था .

“हाँ …….! या कि कहें – भूखे-नंगे हैं ! हमारा जैसा वैभव इन हे पास नहीं है ! अतः जो भी यहाँ आता है …उस की आँख में हमारा ये वैभव समा जाता है ! फिर वह …हमें मार कर …परस्त कर के ….छल से –बल से …घात-प्रतिघात से … हमारा सर्वस्व छीन लेना चाहता है …? वह तो हमें जीने तक का अवसर प्रदान नहीं करना चाहता ,नरेन्द्र …?”

गुरु जी की आवाज़ में एक अटूट वेदना थी !!

“घोर अमानवीय ये लोग ….मानवता को भूल …दानव बन कर हम पर …कहर ढाते हैं ! और हम ……?”

“लड़ते ही नहीं …..?” मैंने उपहास करना चाहा था .

“लड़ते हैं !” उन्होंने कहा था . “हम लड़ाके हैं ….बांके वीर हैं …. सच्चे-अच्छे सैनिक हैं !” गुरु जी हँसे थे . “लेकिन अयाश …और अहंकारी नहीं हैं ! मुसलमानों के आगमन के बाद से ही हमारी अपनी परम्पराओं का पतन हुआ ,नरेन्द्र !” वो बताते ही रहे थे .

मुसलमान -शब्द अनायास फिर आ कर मेरे गले में फांस की तरह अटक गया था !

कुछ था …कुछ ऐसा जाल था …जो मुझ पर फेंका जा रहा था -मुझे बदनाम कर – मुसलमानों का घोर बैरी सिद्ध किया जा रहा था ! मुझे हर कीमत पर मिटाने का …षड़यंत्र अपने चरम पर था !

“अब हमें मुसलमानों से क्या उम्मीदें रखनी चाहिए …?” मैंने एक अटपटा प्रश्न गुरु जी से पूछा था . “देश …अब तो आज़ाद है ……”

“कहाँ,नरेन्द्र ?” वो फिर से टीस आए थे . “कट्टर हैं , ये इस्लामी ….! इन्हें सुधारना तो दूर …..इन से तो दूर रहना तक दूभर हो जाएगा ….?” उन की द्रष्टि उठी थी . वह तनिक संभाल गए थे . “मुसलमान और ईसाई आज भी हिन्दुओं को अपनी रयाया के रूप में देखते हैं ! मौके की तलाश में हैं , ये लोग !”

“तो हम क्या करें ….?” मैंने पूछा था .

“अब हमें -अपने शाशक का रूप-स्वरुप बनाना है ! ऐसा रूप-स्वरुप जहाँ वो आम न हो कर ख़ास हो ! ऐसा स्वरुप जो एक नैतिक डर को जन्म दे ! ख़ास कर विधर्मियों के लिए हमें अब कड़े नियम-क़ानून बनाने होंगे ! सहज में उन्हें बराबरी सौंप कर फिर गुलाम हो जाना बुद्धिमानी नहीं है ,नरेन्द्र !”

गुरु जी चुप थे . मैं भी सोच में डूबा हुआ था . बात तो सच थी . लेकिन उस का सच होना संभव न लग रहा था ! देश जहाँ आ कर पहुँच गया था – वहा से लौट कर….अब सतयुग में आना …मुझे भी असंभव लगा था !

“मालिक हो ….शाशक हो …. नेता हो ….या कोई भी अगुआ हो ….उस का चरित्र अलग होता है ! और अलग होना भी चाहिए !” गुरु जी बताने लगे थे . “संकट जब गहराता है तो ….एक चरित्र ही है ….जो आदमी का साथ देता है …अपना उस का चरित्र !!” उन का कहना था .

और आज वही बात सच थी !!

मैं अफ़सोस के साथ सोच रहा था कि …जस्टिस आफ्ताव आलम जैसे उच्च कोटि के लोगों का सोच भी कितना घटिया , टुच्चा और …साम्प्रदायिक था …? उन की बेटी – शाहरुख़ ….किस कदर होनी-अनहोनी के साथ खेल रही थी …? ये लोग आज भी अपने आप को शाशक मानते थे ? आज भी उन का इरादा था कि ….

“अगर अमित शाह …जेल से बाहर आ गया तो …गुजरात में आग लग जाएगी !” मैं एक शोर सुन रहा था . “गुजरात का ही नहीं ….पूरे देश का मुसलमान …भयभीत है ….नाराज़ है ! विदेशों में भारत की छवि बिगड़ी है ! हमारे व्यापार पर भी प्रभाव पड़ा है ! लोग हमें नीची निगाहों से देखने लगे हैं ! हिन्दू साम्प्रदायिकता का ये विषैला सांप …हमारी सारी सद्भावनाओं को सटक रहा है ! सोनियां गाँधी ने कहा है …..राहुल जी भी बोले हैं ……! ममता ….और माया …का मत है ….कि ….”

“नहीं मिलेगी , बेल …..?” मैंने साल्वे को पूछा था . मेरे पसीने छूट रहे थे .

“उम्मीद …अभी बची है !” उन का उत्तर था . “प्रेस ने कहर ढा रखा है ! आप के नाम के नगाड़े बजा-बजा कर …मुसलमान नांहक में पेट पीट रहे हैं !”

“लेकिन …वो मुसलमान ….जो मेरे साथ हैं ….जो मेरे भक्त हैं ….जो मेरे लिए …..”

“वही एक आशा -किरण है …. जिसे ले कर मैं लड़ रहा हूँ !” साल्वे हँसे थे . “आप बुरे नहीं हैं ….आप को तो बुरा कहा जा रहा है !!” वह जोरों से हंस पड़े थे .

“शाशक का चरित्र,नरेन्द्र …..?” गुरु जी की आवाजें थीं .

“जी,गुरु जी ! मैं सही मईनों में …एक शाशक का चरित्र गढ़ूंगा ….! मैं आप को कभी निराश नहीं करूंगा ….मैं लडूंगा …और आप के आशीर्वाद से …जीतूंगा भी ज़रूर …..”

“अमित तुम्हारा …अभिन्न है ….?”

“मैं जानता हूँ, गुरु जी !!” मैंने स्वीकारा था .

और ….आज अमित बेल पर छूट रहा था ….!!

एक अच्छी-खासी जंग हो कर चुकी थी ! एक तूफ़ान आ कर गया था ! बेल के ऊपर पावंदियाँ थीं ….शर्तें थीं …और हिदायतें थीं …कि ….अमित गुजरात में न रहेगा !अमित – एक अजूबे की तरह …कोई सांप …या बिच्छू-सा कुछ बन कर ही …जेल से बाहर आया था ! और अमित एक अचम्भे की तरह फिजा पर छा गया था …!!

अमित से लोग मिलने आ रहे थे . अमित को मीडिया ने घेर लिया था ! अमित से प्रश्न पूछे जा रहे थे . अमित के बारे में कयास लगाए जा रहे थे !!

“मुझे अपनी नहीं , आप की चिंता खाए जा रही थी, भाई जी !” अमित मुझे बता रहा था . “अब मैं प्रसन्न हूँ ! मैं तो जहन्नुम में …रह कर भी …जिन्दा …रहूँगा !” हंस रहा था , वह. “लेकिन ….आप …..???”

“मैं नहीं मरूंगा,पगले ….!!” मैंने अमित को हिए से लगा कर कहा था .

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!

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बोलता -डोलता अमित सच् का प्रतीक है !

amit shah

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा .

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश :-

भुज में आए भूकंप की कहानी सुन कर अटल जी का चेहरा तमतमा गया था ! उन का मुख-मंडल ठीक एक ब्रह्माण्ड -सा तन कर वक्त के सामने खड़ा था . त्रिकाल उन की द्रष्टि में समाया था …और भूत,भविष्य तथा वर्तमान …अपने-अपने हक़ के लिए लड़ रहे थे ! राजनीती का पूरा का पूरा परिद्रश्य उन के सामने आ कर ठहर गया था !

“संक्रमण काल है, नरेन्द्र !” एक लम्बी उच्छवास छोड़ कर वह बहुत देर के बाद बोले थे . “एक मुख्य मंत्री को अपने प्रदेश की चिंता नहीं …? उसे अपने ही स्वार्थ सही लगते हैं – लोग नहीं ! सारा -का-सारा माहौल की विषाक्त हो गया है ! क्या करें ….? किसे लें ….किसे छोड़ें ….? अबा -का-अबा ही …?’ घोर निराशा में उन की त्योरियां तन आईं थीं . “वो …है …कहाँ …?” उन का अगला प्रश्न था .

“बीमार है !!” मैंने शांत स्वर में बताया था .

“बहाना है – ये बीमारी …..! रोग है …..” वो ठहर गए थे . “कहते भी तो लज्जा आती है ….?” उन का स्वीकार था .

“शंकर सिंह …….” मैं यों ही बोला था .

“शंकर सिंह हों …..भयंकर सिंह हों …..और लोई …सिंह हों …..?’ उन का उल्हाना था . “महता हो ….दलीप हो …..और कोई महीप हो …..?” उन्होंने मेरी आँखों में देखा था . “सब -के- सब अकर्मण्य हैं , नरेन्द्र !” उन की आवाज़ में अनंत का रोष था . “न जाने …क्या होगा इस देश का ….?” उन की चिंता थी . “प्रदेश के लोग मर रहे हैं ….बर्बाद हो रहे हैं ….मलवे में दबे हैं …और मुख्य मंत्री ….?”

“स्थिति …नियंत्रण में है ,अटल जी ! आप निश्चिन्त रहें …..” मैंने उन्हें सांत्वना दी थी .

“तुम से मुझे आशाएं …हैं !” वो धीमे से बोले थे . मैं तुम्हारा काम देखता आ रहा हूँ ! तुम्हारी निष्ठां की मैं क़द्र करता हूँ . पार्टी को तुम जैसे होनहार युवक ही तो चाहिए ….? न ….कि ….” उन के मुंह का स्वाद खट्टा चूक था ! “खैर ! मैंने तो अपना निर्णय ले लिया है ! ज्यादा सतरंज खेलना बेकार है !” वो एक गंभीर स्थिति से उभर आए थे . “तुम जा कर गुजरात को संभालो …!” अचानक ही आया था – उन का आदेश ! “नरेन्द्र ….!” अब वो मुझे निहार रहे थे . “मेरे …अपने ….!! नहीं,नहीं ….! तुम ही तो मेरे सपने हो, नरेन्द्र !” वो अपने कवि के चोले में लौट आए थे . “मुझे तुम से वो उम्मीदें हैं ….जो एक गुरु को अपने शिष्य से होती हैं ! और लो ! मैं तुम्हें वो उत्तराधिकार सौंप रहा हूँ ….जो एक बाप अपने लायक बेटे को सौंपता है !” वो अब चुप थे .

मैं भी चुप था ! मेरे दिमाग में एक बर्फीला तूफ़ान आ कर फिट हो गया था !

मैं न जाने कौन से सन्नपात के नीचे था …? मैं न तो कुछ सोच ही पा रहा था …और न ही कुछ समझ ही पा रहा था ! अटल जी जो कह रहे थे – मैं उसे सुन तो रहा था …पर उस पर कोई प्रतिक्रिया न हो रही थी …? शायद मैं जो सुन रहा था – उस के लिए मैं तैयार न था …या कि …आशावान न था ! जो घटने जा रहा था …वो तो अघटनीय था ….अनोखा था …विचित्र था …और शायद ..पवित्र भी था ….?

कहीं,…हाँ,हाँ कहीं …मुझे इस दिन का इंतज़ार तो था ….? क्योंकि …मैं अब सत्ता पा कर …अपने ज़ोर आज़माने का सपना देखने लगा था !!

“देखना ,नरेन्द्र कि …कहीं …हमारी कौम को बट्टा न लग जाए ….?” अटल जी ने मुझे सचेत किया था . “विचित्र खेल है , ये ! बिलकुल …चूहा-बिल्ली का मुकाबला है ! दिमाग से काम लोगे …तो कामयाब हो जाओगे …!” उन्होंने मुझे फिर से निहारा था . “और हाँ ! अपने निजी स्वार्थों को समेट कर रखना …! हक़ है – वही लेना ! लेकिन देते समय उदार बने रहना …!” अब उन्होंने मुझे प्रेम-वत्सल निगाहों से घूरा था . “तुम ,मेरे मन के हो ! मैं चाहता रहा था कि …तुम्हें …बड़ी जिम्बेदारियां दूं . आज वक्त आ गया है,नरेन्द्र !” उन्होंने मेरे सर पर हाथ धरा था . “भगवान् तुम्हें दीर्घायु दे …क्यों कि मैं तुम्हें अकूत जिम्मेदारियां दे रहा हूँ ! प्रदेश के बाद ….देश …और देश के बाद ….?” हँसे थे, अटल जी . “यात्रा है, पगले ! और हमारा धर्म चलते रहना है ….!” उन्होंने मुझे वक्त से चेता दिया था !

अचानक मैं आज प्रचारक से शाशक बन गया था !!

मैंने प्रथम सूचना अमित को ही दी थी . अमित उछल पड़ा था . अमित उल्लासित था . अमित ….भावुक था ! और अब अमित न जाने क्या-क्या कहने लगा था …..?

“अभी से बाबले हो गए …..?” मैंने अमित से चटक आवाज़ में पूछा था . “अच्छा , बताओ ! लोगों का क्या हाल-चाल है ….?”

“सब प्रसन्न हैं ….प्रभावित हैं ….! आप के आगमन की देर है ….कि ….”

“ज्यादा कुछ नहीं,अमित !” मैंने संकेत दिया था . “कीप इट ए …. लो …प्रोफाइल …..इवेंट …!” मैंने आदेश दिया था . “समझ गए ….,न ….?” मैंने प्रश्न दुहराया था .

“समझ गया ….!” अमित हंस रहा था . “आप आईए …….” उस ने स्वागत-शब्द कहे थे .

और ….मैं ….? मेरा स्वयं में बुरा हाल था ! अमित को तो मैंने डपट दिया था ….पर …मुझे स्वयम को रोक पाना कठिन हो रहा था ? भय ….भावनाएं …विचार ….और आशाएं …आ-आ कर मुझ से चिपक जातीं . कहतीं – वक्त आ गया है , नरेन्द्र ! इस पाजी को मिटा ही देना ….और उसे भी मत छोड़ना …! और हाँ ! वो तो तुम्हारा अपना है ? जागीरें उसे देना ! धन का बंटबारा भी स्वयं करना …? सत्ता का सदुपयोग करना …! देखो , नरेन्द्र ! तनिक-सी भी उक-चूक ले बैठती है ! केशो को …ही देख लो ….?

और अटल जी ने जो कहा था – मैं उस पर ही मनन कर रहा था ! उसे पाठ की तरह याद कर रहा था -मैं ! उगलियों पर गिन-गिन कर कंठस्त कर रहा था ….कि अब मुझे प्रदेश का मुख्य मंत्री बन कर क्या-क्या करना होगा …?

“कुछ हट कर करूगा !” मेरा उल्लसित हुआ मन मुझे साधे था . “प्रदेश का रूप-स्वरुप … कुछ इस तरह गढ़ूंगा …कि …पूरे देश के लिए एक आदर्श बन जाए ! दुःख-दर्द और इस गरीबी का तो …अंत लाने का हर प्रयत्न …करूंगा ! हर हाथ को काम ….और …हर परिवार को खुशहाली दूंगा ….! मैं वो दूंगा ….जो ….”

“देश-काल की चाल तो ….समझ लो , जादूगर …?” मुझे किसी ने टोका था . “दोस्तों में खेलने लगे …? दुश्मनों को कौन गिनेगा ….? मत भूलो कि मुख्य मंत्री बनते ही …. तुम्हारे आस-पास सांप-छछूंदर आ बैठेंगे ….? सत्ता संभालना बच्चों का खेल नहीं है, नरेन्द्र …?”

“भाग जाऊं ….. ?” मैंने गुर्रा कर पूछा था .

“नहीं ! ” उत्तर आया था . “उलटी गिनती आरंभ करो ….! ये देखो कि …पहला वार कौन करेगा ….? ये भी समझो कि तुम्हारे मुख्य मंत्री बनने से …कौन सब से ज्यादा संकट में आएगा ….? पहला वार बचा गए …तो समझो कि ….बच गए ….!!”

“हाँ ,,,! ” मैं अब एक सोच के सागर में तैर रहा था . “पहला ….वार ….? हाँ,हाँ ! वही करेगा ….और अवश्य करेगा ….!!” एक साथ ही मैं संभाल गया था . “अमित को बताना होगा ….कि ….” एक साथ ही सारी होनी- अनहौनी को मैंने आत्मसात कर लिया था .

राजनीति बहुत टिकाऊ नहीं है – मैं सोच रहा था ! तीर है …तर्कश है …तर्क भी है …पर जिन्दगी और मौत इन में से किसी की भी कायल नहीं है ! वह जब तक है – है ! और जब नहीं है – तो नहीं है !! हमें बस चंद लम्हों के बीच से …जीना है ! आँखें खुली हों …या बंद हों ….क्या फर्क पड़ता है ….?

अब मेरा विवेक भी मुझे समझा रहा था – शाशक को चोर नहीं होना चाहिए ! उसे लालचों से असम्प्रक्त रहने की कला में दक्ष होना चाहिए ! सामाजिक शोषण से लोगों को त्रान दिलाना शाशक का पहला धर्म है ! व्यवस्था का अर्थ …समाज के समग्र सुख में है ! जो हो …वो – सब का हो …! और सब के लिए हो …! परम्पराएं पड़े ….तो उन के निशान …लोगों के दिल-दिमाग पर अंकित हों ! संम्पन्न समाज …की संरचना एक संभावना है -सपना नहीं ! सब का साथ …सहयोग …मनोयोग …अगर मिलता है …तो ही …बात बनती है ! अपने-तेरे का चाकू अगर चलता है …तो मन फट जाते हैं !!

“लोग तो लड़ेंगे ….?” एक उल्हाना आया था . “धर्म के नाम पर …कर्म के नाम पर …जाती और जीत-हार को ले कर …..वो लड़ेंगे तो ज़रूर …..!!”

“और मैं भी लडूंगा, ज़रूर !” मैं बाहर आ कर अखाड़े में आ खड़ा हुआ था . “देखता हूँ, कौन जीतता है ….?” मैंने अंखिया कर पूरे गुजरात प्रदेश को देखा था .

अमित आज तन्हाई में अकेला बैठा था ! अमला नहीं आया था . वह नाराज़ था . उसे भारतीय जनता पार्टी से शिकायत थी . कांग्रेस पार्टी का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा था – अमला का उल्हाना था ! ‘तुम्हारा मोदी बेकार आदमी है !’ कह कर वह चला गया था .

लेकिन अमित का सोच लौट-लौट कर …मोदी की मन-पसंद बातों में उलझा था !

१९८२ में …पहली बार जब अमित की मुलाक़ात मोदी से हुई थी तो उसे लगा था – वह किसी आदमी से नहीं , अपने अभीष्ट से मिल रहा था ! मोदी की आंखों में आशाओं के तैरते समुन्दरों को देख कर अनायास ही जीवंत हो उठा था -वह ! हार -जैसा उन आँखों में कुछ भी न था ! एक नया पन था – जीतने का नया मंत्र …लड़ने की उमंग …कुछ कर दिखाने का दुसाहस …और बैरियों पर हावी हो जाने की बेजोड़ कला -उस में थी !

और फिर सन २००२ में उसे मोदी के संरक्षण में ही सरखेज से चुनाव लड़ने का मौका मिला था ! चुनाव लड़ने की कला ,कौशल …और चतुराई ….चालाकी उस ने मोदी से ही ली ! चीते की चाल चलता मोदी …अपनी सतर्क आँखों से लोगों के मनों में उतर जाता ! उन से …उन की बराबरी पर आ कर …उन की ही भाषा में बात करता ! उन से उन के हित-साधन की बातें करते-करते …अपने हित की बात उन के गले उतार देता ! अपनापन …और एक ऐसा सच्चा सौहार्द वह सभा -सम्मेलनों में पैदा करता …जहाँ लगता कि ….उन को उन का ही कोई सुह्रद मिल गया है …! लगता – वह उन का है …उन के लिए है …और उन का ही रहेगा …!

आदमी से उस का नाम ले कर बातें करना ….बुजुर्गों के पैर छू कर …उन से आशीर्वाद लेना …महिलाओं की पवित्र भावनाओं का आदर करना ….और बच्चों के सहज हास-परिहास को बांहों में बटोर लेना ….मोदी का अपना स्टाईल है !

कितना अपनापन दे जाता है – ये आदमी . अमित हैरान था !

सरखेज में चुनाव लड़ते वक्त ….उस ने भी तो इसी कला का प्रयोग किया था ….? उस ने भी तो सरखेज के चप्पे-चप्पे की खबर ले ली थी ….? उस ने भी तो नरेन्द्र भाई जी की ही तरह ….अपने भरोसे के लोग चुने थे ! उन्ही के द्वारा तो उस ने अपनी बात जनता तक पहुंचाई थी ? और उन्ही के द्वारा तो उस ने सरखेज के भीतर-बाहर का पूरा का पूरा परिद्रश्य देख लिया था ! घर-घर जा कर अमित ने अलख जगाया था ! कहा था – मैं आप का सेवक हूँ ! मैं नरेन्द्र मोदी जी का दास हूँ …..उन के अजश्र प्रेम का पुजारी हूँ ! मैं उन का अनुयाई ..इस लिए हूँ …कि वो आप के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हैं …जनता के हैं …देश के हैं ! उन का उद्देश्य जनता की सेवा करने के सिवा और कुछ नहीं है !

“अगर हमारी जीत होती है —-तो आप की जीत होती है !” अमित लोगों को बताता . “अगर प्रदेश की प्रगति होती है ….तो आप की प्रगति होती है ! अगर आप संपन्न होते हैं ….तो राष्ट्र संपन्न होता है ! अतः हमारी नीतियां आप को ही संम्पन्न बनाने के लिए बनेंगीं …और आप के ही सहयोग से बनेंगीं !!”

लोग अमित को बड़े ही ध्यान पूर्वक सुनते थे ! बड़े ही धैर्य के साथ …वो बैठे-बैठे …इस उमंगों से भरे सागर को निहारते रहते थे ! उन्हें लगता -अमित उन्ही का बेटा-बच्चा था …जो उन्ही के खेत-खलिहानों में ….कल से ही हल चलाएगा …और सच्ची-मुच्ची की फसल उगाएगा ! अभी तक के लोग तो ठग थे ! केशू भाई …बघेला ….या थगेला …. सब के सब स्वार्थी थे …झूठे थे ….!!

अमित – बोलता -डोलता …एक सच का प्रतीक लगता था – उन्हें !!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!