शाम ढल रही थी। मीरा मर्फी सैर करने निकल पड़ी थी। उसके पैर जैसे हवा पर तैर रहे थे। उसका शरीर सूक्ष्म सा कुछ था। उसका मन तो पहले ही स्वामी अनेकानंद से जा मिला था। उसके सपने स्वतः ही साकार होने लगे थे। संवाद थे – प्रेम पगे संवाद। होंठों तक आते और भाग जाते। आंखों में ढलते सूरज की आभा उतर आई थी।
स्वामी अनेकानंद का आज हाल बुरा था। वो जानते थे कि मीरा मर्फी से मुलाकात तो होगी। लेकिन वो यह न जानते थे कि इस मुलाकात का मतलब क्या था? जो मन था वो तो बेईमान था। उसका चाहा तो कुछ होगा ही नहीं – वो जानते थे। लेकिन … लेकिन? क्या मीरा से कुछ अपेक्षाएं? नहीं-नहीं। उन्होंने सर हिलाया था।
“कैसी हैं आप?” स्वामी अनेकानंद ने मीरा मर्फी के दोनों हाथ अपने हाथों में भर कर पूछा था।
“ठीक हूँ और ठीक नहीं भी हूँ।” मीरा मर्फी ने विहंस कर बताया था।
“कोई कुंठा …?” स्वामी जी ने अगला प्रश्न पूछा था।
“हां।” मीरा मर्फी ने स्वीकार में सर हिलाया था।
“क्या?” स्वामी जी ने पूछ लिया था।
“मां का मिशन।” मीरा ने संक्षेप में बताया था।
“कैसा मिशन?” स्वामी जी ने पूछ ही लिया था।
मीरा बड़ी देर तक सोचती ही रही थी। उसके चेहरे पर भिन्न-भिन्न तरह के भाव आते जाते रहे थे। कई बार उसने स्वामी अनेकानंद को नई निगाहों से देखा था। उसकी आंखें नम हो आई थीं। उसे याद आ रहा था – मां पापा की मौत का हादसा। वह रो लेना चाहती थी।
“क्या हुआ?” स्वामी जी ने चुप्पी तोड़ी थी।
“एयर क्रेश। दोनों की मौत।” कहते-कहते मीरा मर्फी रो ही पड़ी थी। “टोटल लॉस।” वह कहती रही थी।
“कैसा लॉस?” स्वामी जी ने पूछा था।
“उन दोनों का मिशन था अमेरिका में ब्रज धाम की स्थापना।” मीरा बताने लगी थी। “मां भारत की थीं, पापा भारत संस्कृत की शिक्षा लेने काशी विश्व विद्यालय आए थे। यहीं दोनों की मुलाकात हुई थी। प्यार हुआ था। फिर दोनों अमेरिका लौट गए थे। दोनों ने यहां आ कर संस्कृत विश्व विद्यालय की स्थापना की थी। फिर ब्रज धाम की स्थापना की थी। एक बड़ा ही मंगलमय मिशन खड़ा हो गया था। अमेरिका की कमर तोड़ जिंदगी को छोड़ कर लोग ब्रज धाम में आ कर बसने लगे थे। फिर एक … मूवमेंट …” मीरा ने मुड़ कर स्वामी जी की आंखों में झांका था। “ऐसा ही एक मूवमेंट जैसा कि …?”
“राम लाल ने खड़ा कर लिया है?” स्वामी जी ने मन में कहा था और मुसकुराए थे।
“तो क्या बंद हो गया?” अचानक स्वामी जी ने प्रश्न पूछा था।
“नहीं।” मीरा मुसकुराई थी। “लेकिन … लेकिन मैं अकेली …?” मीरा ने स्वामी जी को जैसे निमंत्रण दिया था और कहा था कि चाहें तो वो भी मिशन से जुड़ सकते थे।
“एक के बाद दूसरा फरेब?” स्वामी जी ने अपने आप से प्रश्न पूछा था। “राम लाल के नहले पर दहला था।” वो मुसकुराए थे। उनका मन तो बेईमान बनने को तैयार था लेकिन आनंद इस बार दूसरी गलती करने को तैयार न था। वह इस आडंबर को तोड़ देना चाहता था।
लेकिन … लेकिन स्वामी अनेकानंद कैसे बताते कि वो कोई सिद्ध स्वामी न थे। वो तो एक एम ए इन हिस्ट्री – आनंद थे – एक बेवकूफ आनंद जो तीन अनपढ़ राम लाल, कल्लू और कदम के जाल में फंस गया था।
उस शाम का सूरज गरूब हो गया था।
लेकिन स्वामी जी के दिमाग में उस रात नया सूरज उग आया था।
रात थी लेकिन दिन का उजाला चारों ओर खिल गया था। अंधेरा नहीं था। चारों ओर राहें थीं और रास्ते थे। और वो रास्ता जो मीरा मर्फी ने दिखाया था उन्हें हाथ के झाले मार-मार कर बुला रहा था। कह रहा था – आओ-आओ आनंद बाबू इधर आओ। इस बार गलती मत करना। मिल रहा है तुम्हें एक मौका। लपक लो आनंद बाबू। अगर ये हाथ से निकल गया तो …
लेकिन जड़ हुए आनंद बाबू उस मौके को बुला न पा रहे थे।
“खजूर से उतरे – खाई में गिरे।” आनंद बाबू का विवेक उन्हें सचेत कर रहा था। “मीरा और राम लाल में क्या अंतर है? अब तक उसने ठगा है अब ये लूटेगी।”
आनंद बाबू का मन न था कि वो फिर से किसी स्वामी अनामी का स्वांग भरें। वो न चाहते थे कि लोगों को इस तरह गुमराह …
पूरे दिन स्वामी अनेकानंद का मन बिछलता रहा था। एक बार तो उन्होंने निर्णय ले लिया था कि आज की शाम वो घूमने न निकलेंगे। अब नहीं मिलेंगे मीरा मर्फी से। इस बार तो वो कोई सच्ची अच्छी राह गहेंगे। इस बार दूध का दूध और पानी का पानी को साक्षी मान कर ही जीएंगे। कोई भी हो – अपनी ही राह गहेंगे – और अपनी ही कमाई खाएंगे। नहीं तो वह लंघन ही मर जाएंगे।
शाम ढलने को थी। न जाने किस प्रेरणा के तहत आनंद बाबू आज फिर से सैर के लिए निकल आए थे।
मोह ग्रस्त मीरा मर्फी भी आज फिर स्वामी अनेकानंद से मिलने चली आई थी।
“कहीं दूर चलते हैं।” स्वामी अनेकानंद का मन आज उचट रहा था। “नौका ले कर …?”
“मेरा मन भी यही कह रहा है।” मीरा मुसकुराई थी। “आज शांत है – समुद्र।” उसने निगाहें पसार कर सागर को देखा था।
“लेकिन मेरा मन आज बहुत अशांत है मीरा जी।” आनंद ने आज आप बीती सुनाने का निर्णय ले लिया था। “मैं … मैं – और मेरा …” चुप हो गए थे आनंद बाबू।
अब केवट उन्हें सागर के पसरे नए संसार में ले आया था।
“मैं नहीं चाहता मीरा जी कि आप को अंधकार में रक्खूं।” आनंद बाबू गंभीर थे।
“कैसा अंधकार?” मीरा ने सीधा आनंद बाबू की आंखों में देखा था। “आप तो ज्ञानी ध्यानी हैं। आप तो सर्व ज्ञाता हैं।”
“मैं कुछ भी नहीं हूँ मीरा जी।” उखड़ आए थे आनंद बाबू। “मैं … मैं हूँ एक उजड्ड गंवार, मैं हूँ एम ए इन हिस्ट्री – एक पढ़ा लिखा पागल। मैं निरा एक बेवकूफ आदमी हूँ।” आनंद बाबू सीधा मीरा की आंखों में देख रहे थे।
मीरा मर्फी दंग रह गई थी।
“सब कुछ सच-सच बताऊंगा।” आनंद बाबू का स्वर संयत था। “फिर आप स्वयं सोचना कि …”
“बताइए।” मीरा ने आग्रह किया था।
“मां ने कुछ पैसे दे कर मुझे बंबई नौकरी करने भेजा था।” आनंद बाबू बताने लगे थे। “बंबई आ कर मैं …” आनंद बाबू ने जिए जीवन के हर पल को खोल कर मीरा के सामने रख दिया था। “मां मरी तो गांव लौटा। बिल्लू की सगाई टूटी तो मैं टूटा। हम दोनों भाई पूरे गांव वालों के सामने बेइज्जत हो कर …” भावुक हो आए थे आनंद बाबू। “राम लाल ने बीस हजार न भेजे। और आज भी … अब भी …” आनंद बाबू रो पड़े थे। मीरा के आगोश में मुंह छुपा कर रोना उन्हें उचित लगा था – न जाने क्यों अच्छा लगा था। “न जाने बिल्लू …?” अभी भी सुबक रहे थे आनंद बाबू।
“अब आप इसे जाने दीजिए।” मीरा मर्फी ने आनंद बाबू के आंसू पोंछ दिए थे। “यहां। बिल्लू का पता लिख दें प्लीज।” मीरा ने आग्रह किया था।
मीरा मर्फी की उस छोटी डायरी में आनंद बाबू ने बिल्लू का पता लिख दिया था।
“मिलते रहिए आनंद बाबू।” मीरा ने आग्रह किया था और चली गई थी।
आनंद बाबू को लगा था आज जिंदगी में पहली बार उसे होश लौटा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड