by Rachna Siwach | Feb 17, 2019 | Uncategorized
पैसे आने से बच्चे भी खुश थे.. और रमेश भी खुश थे.. पर सुनीता खुश नहीं थी.. अन्दर ही अन्दर मन में कह रही थी.. ये पैसे तो हमारे हैं ही नहीं। ऐसा लग रहा था.. सुनीता को जैसे घर में टेम्पररी खुशी आ गई हो। यह बात कुछ हज़म नहीं हुई थी.. दर्शनाजी ने रमेश के हाथ में पैसे दे...
by Rachna Siwach | Feb 15, 2019 | Uncategorized
दर्शनाजी और रमेश हरियाणे के लिये निकल गए थे। जब भी माँ-बेटा हरियाणे जाया करते थे… घर का माहौल बदल जाता था। रामलालजी अपनी धर्मपत्नि की गैर हाज़िरी में बहुत खुश रहा करते थे। सुनीता और रमा भी एक दूसरे के साथ अच्छी तरह से ही रहतीं थीं। घर में तरह-तरह के भोजन बनने लग जाया...
by Rachna Siwach | Feb 13, 2019 | Uncategorized
चाहे कुछ भी हो!.. सुनीता की अलमारी में से मुकेशजी की मेहनत की कमाई के सोने के चोरी होने का सबको बेहद बुरा लगा था। अब घर में एक ही दामाद हो.. और वो भी इस तरह की हरकत कर बैठे तो बुरा तो लगता ही है। पर सुनीता को सही तरीके से समझाना भी ज़रूरी हो गया था। हर माँ-बाप यही...
by Rachna Siwach | Feb 12, 2019 | Uncategorized
क्या कर रही थी.. सुनीता!.. अरे! सासु-माँ ने ही तो चोरी करवाई थी.. और उन्हीं से उनके वफादार कुत्ते रमेश की शिकायत करने लगी हुई थी। अरे!.. पगली!.. तेरे आदमी में दिमाग़ था, ही कब!.. माँ के हाथ के इशारों पर चलने वाली कठपुतली से ज़्यादा कुछ भी नहीं था.. रमेश!.. काश! तूने...
by Rachna Siwach | Feb 12, 2019 | Uncategorized
“ आ जाओ!.. छुट्टियाँ शुरू हो गयीं हैं”। “ कैसे आएँ माँ!.. तुम तो जानती ही हो हम क़ानू को अकेला छोड़ कर नहीं आ सकते”। “ अरे! दामाद जी हैं!.. तो सही!, उनके संग छोड़ आओ!”। “ नहीं माँ!.. हमारी बिटिया कानू हमें छोड़कर और किसी के भी साथ नहीं रह सकती”। इस बार भी गर्मियों की...