खानदान 56

खानदान 56

पैसे आने से बच्चे भी खुश थे.. और रमेश भी खुश थे.. पर सुनीता खुश नहीं थी.. अन्दर ही अन्दर मन में कह रही थी.. ये पैसे तो हमारे हैं ही नहीं। ऐसा लग रहा था.. सुनीता को जैसे घर में टेम्पररी खुशी आ गई हो। यह बात कुछ हज़म नहीं हुई थी.. दर्शनाजी ने रमेश के हाथ में पैसे दे...
खानदान 56

खानदान 55

दर्शनाजी और रमेश हरियाणे के लिये निकल गए थे। जब भी माँ-बेटा हरियाणे जाया करते थे… घर का माहौल बदल जाता था। रामलालजी अपनी धर्मपत्नि की गैर हाज़िरी में बहुत खुश रहा करते थे। सुनीता और रमा भी एक दूसरे के साथ अच्छी तरह से ही रहतीं थीं। घर में तरह-तरह के भोजन बनने लग जाया...
खानदान 56

खानदान 54

चाहे कुछ भी हो!.. सुनीता की अलमारी में से मुकेशजी की मेहनत की कमाई के सोने के चोरी होने का सबको बेहद बुरा लगा था। अब घर में एक ही दामाद हो.. और वो भी इस तरह की हरकत कर बैठे तो बुरा तो लगता ही है। पर सुनीता को सही तरीके से समझाना भी ज़रूरी हो गया था। हर माँ-बाप यही...
खानदान 56

खानदान 53

क्या कर रही थी.. सुनीता!.. अरे! सासु-माँ ने ही तो चोरी करवाई थी.. और उन्हीं से उनके वफादार कुत्ते रमेश की शिकायत करने लगी हुई थी। अरे!.. पगली!.. तेरे आदमी में दिमाग़ था, ही कब!.. माँ के हाथ के इशारों पर चलने वाली कठपुतली से ज़्यादा कुछ भी नहीं था.. रमेश!.. काश! तूने...
नानी घर कानू

नानी घर कानू

“ आ जाओ!.. छुट्टियाँ शुरू हो गयीं हैं”। “ कैसे आएँ माँ!.. तुम तो जानती ही हो हम क़ानू को अकेला छोड़ कर नहीं आ सकते”। “ अरे! दामाद जी हैं!.. तो सही!, उनके संग छोड़ आओ!”। “ नहीं माँ!.. हमारी बिटिया कानू हमें छोड़कर और किसी के भी साथ नहीं रह सकती”। इस बार भी गर्मियों की...