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नानी घर कानू

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“ आ जाओ!.. छुट्टियाँ शुरू हो गयीं हैं”।

“ कैसे आएँ माँ!.. तुम तो जानती ही हो हम क़ानू को अकेला छोड़ कर नहीं आ सकते”।

“ अरे! दामाद जी हैं!.. तो सही!, उनके संग छोड़ आओ!”।

“ नहीं माँ!.. हमारी बिटिया कानू हमें छोड़कर और किसी के भी साथ नहीं रह सकती”।

इस बार भी गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गईं थीं.. और माँ ने हमें हमेशा की तरह से दिल्ली बुलाने की जिद्द पकड़ ली थी.

माँ को हमनें अपनी छोटी सी बिटिया कानू के बारे में समझा तो रखा है.. पर नहीं वो तो सुनने को ही तैयार नहीं होतीं.. अब गलती उनकी भी नहीं है.. दरअसल हमें भी समझना चाहये की क़ानू की तरह से ही हम भी उनकी बिटिया हैं। खैर! क़ानू के बारे में लाख समझाने पर भी माँ का फ़ोन आया था.. “ तुम अपनी कानू को भी ले आओ!… इस बार बच्चों के संग तुम्हारी डॉगी भी हमारे यहाँ घूम जाएगी”।

अब माँ के कानू को डॉगी कहते ही हमसे रहा न गया, और हम भी तुरन्त बोल उठे थे,” यदि आप हमारी प्यारी सी बिटिया कानू को बार-बार डॉगी कहेंगीं.. तो हम आते भी होंगें तो भी न आएँगे”।

“ चलो! भई!.. न कहेंगें.. तुम्हारी बिटिया कानू.. को डॉगी!.. हम टिकट करवाए दे रहें हैं.. अपने दोनों बच्चे और अपनी छोटी बिटिया कानू संग थोड़े दिन हमारे पास दिल्ली घूमनें आ जाओ!”।

हमनें माँ को पहले ही बता दिया था.. कि कानू डॉग बॉक्स में सफ़र नहीं कर सकती.. इसलिये माँ ने हमारी लाड़ली बेटी कानू को ध्यान में रखते हुए ही फर्स्ट A.C का टिकट करवा दिया था। इस बार पहली बार हमारे सबके साथ कानू दिल्ली नानी-हाउस जा रही थी। बच्चे बहुत खुश हुए थे।

“ माँ! इस बार हमें ट्रैन में कानू संग बहुत मज़ा आ जाएगा”। बच्चों ने अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा था।

अब माँ ने हमारी सबकी टिकट तो करवा ही दीं थीं.. तो हम सभी अपनी-अपनी तैयारी में जुट गये थे.. जिस दिन हमें दिल्ली जाना था.. उस दिन स्टेशन जाने से एक घंटा पहले ही हमनें कानू को बेहोशी की दवा देकर बेहोश कर दिया था.. ताकि प्यारी कानू को हम आराम और प्यार से अपने साथ ट्रैन के कम्पार्टमेंट तक ले जा सकें। कानू ट्रैन के कम्पार्टमेंट तक हमारे साथ आराम से पहुँच गई थी.. और हम सब अपनी गुड़िया कानू के संग खेलते और क़ानू को दुलार करते दिल्ली पहुँच गए थे।

हमनें क़ानू की वजह से किसी को भी घर से स्टेशन लेने आने के लिये मना कर दिया था.. अब नई जगह थी.. और आख़िर थी, तो कानू कुत्ता ही..

खैर ! हम अपने साथ बेहोशी की थोड़ी एक्स्ट्रा दवा लेकर आए थे.. हमनें फ़िर से दिल्ली स्टेशन आने से पहले ही कानू को  बेहोश कर दिया था.. और आराम से अपने स्टफ टॉय कानू को लेकर हम दिल्ली घर तक आराम से पहुँच गये थे। दिल्ली में बिल्डिंग के नीचे पहुँचते ही प्यारी क़ानू अपने होश में आ गई थी। हमनें फटाफट कानू को चैन और पट्टा लगाया था..  और तुरन्त माँ को फ़ोन लगा कर बताया था.. कि सभी लोग हॉल में से हट जाएँ.. और अपने-अपने कमरों में चले जाएँ.. हम लोग आपकी नई मेहमान कानू संग ऊपर आ रहे हैं। “ ठीक है!.. वेलकम! होम.. आ जाओ!.. हमारी गुड़िया कानू को लेकर.. हमनें हॉल ख़ाली कर दिया”। माँ ने हमसे फ़ोन पर ही कहा था।

हम सब क़ानू और सामान सहित ऊपर की तरफ़ चढ़ रहे थे.. कानू अभी थोड़ा सा बेहोशी की हालत में ही थी.. पर सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त कानू को यह अहसास हो गया था.. कि यह हमारी वाली सीढ़ियाँ नहीं हैं.. और हम माँ के संग कहीं और ही आ गए हैं। क़ानू को ले हम घर के दरवाज़े पर पहुँच गए थे..और क़ानू हॉल में खड़ी हो ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगी थी। क़ानू को अजनबी जगह खड़े होने का अहसास हो गया था। हमनें क़ानू को धीरे-धीरे अपने ढँग से चुप कराने की कोशिश करी थी.. और बच्चों ने भी क़ानू को बहुत बहलाया.. पर अभी क़ानू ने भौंकना बंद नहीं किया था। अब धीरे-धीरे घर के सदस्य भी कमरों में से हॉल में आ गए थे.. हमनें कानू को तो चैन और पट्टे से टाइट पकड़ रखा था।कमाल ही हो गया था.. कानू थोड़ी सी देर तो भौंकी थी.. पर फ़िर अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए चुप हो गई थी। कानू ने अपने आसपास खड़े सभी रिश्तों में प्यार और अपनापन जो देख लिया था। आख़िर जानवरों में हमसे ज़्यादा दोस्त और दुश्मन को पहचानने की शक्ति जो होती है.. यहाँ हम जानवरों की बात कर रहें हैं.. पर हमारी कानू तो जानवर है.. ही नहीं.. हमारी बिटिया कानू तो बचपन से ही इंटेलीजेंट है।

“ अरे!.. बुआ!.. कितनी स्वीट है!.. कानू!.. हम इसे छू कर देखें काटेगी तो नहीं”।

भतीजी और भतीजे ने हमसे पूछा था।

“ क्या!.. काटेगी-वाटेगी बोलते हो!.. अरे!.. भई!.. प्यारी कानू भी कजिन सिस्टर है, तुम्हारी!.. कानू के संग भी खेलो-कूदो!”।

हमनें अपने भतीजे और भतीजी से कहा था।

बच्चे हमारी बात सुन खूब हँसे थे.. और बोले थे,” देखो! दादी क्या कहती है.. बुआ!”।

“ ठीक ही तो कह रही है.. बुआ!.. क़ानू भी तुम्हारी तरह से ही अभी छोटी और प्यारी सी बच्ची है.. और हम भी अब से  क़ानू की नानी हैं”। माँ ने हमारी बात पर सहमती दिखाई थी।

कानू सभी घर के सदस्यों को बहुत ही प्यारी लगी थी.. और सभी ने अपने-अपने ढँग से कानू से दोस्ती कर ली थी। कानू भी नानी-घर हमारे संग मस्त हो गई थी। अब तो कानू रोज़ खुशी-खुशी बिल्डिंग में नीचे घूमने जाया करती थी। हमारी भतीजी से क़ानू-मानू की ख़ास दोस्ती व प्यार हो गया था.. इसलिये हम माँ के संग गप्पे हाँका करते रहते.. और क़ानू की पूरी ज़िम्मेदारी हमारी भतीजी ही पूरी किया करती थी। पर हमें भूली न थी.. हमारी बिटिया..  कानू हमें घर में चेक करने ज़रूर आया करती.. कि हम कहाँ बैठे हैं.. और हम भी क़ानू के गाल पर पप्पी कर कानू को खुश कर दिया करते थे।

क़ानू हमारे बिल्डिंग में हमारे पड़ोसियों को भी बहुत प्यारी लगी थी.. और अब कानू दिल्ली में गिने दिनों भीतर ही सबकी प्यारी और दुलारी हो चली थी। सभी पड़ोसी हमसे कहने लगे थे,” बहुत प्यारी और क्यूट है.. तुम्हारी बेटी क़ानू.. देख! .. लो!..नहीं बोला न हमनें क़ानू को डॉगी!.. हमनें भी क़ानू को तुम्हारी तरह ही बेटी जो मान लिया है”।

अब हुआ यूँ की एक दिन हम दिल्ली में अपनी प्यारी क़ानू को छत्त पर घुमाने ले गए.. वहाँ हमारे पडिसियों की डॉगी लूसी भी आई थी.. अब लूसी कानू से दोस्ती करना चाहती थी.. पर कानू ने तो भोंक-भोंक कर नाक में दम ही कर दिया था.. मानो कह रही हो,” लूसी!.. क्यों परेशान कर रही हो.. नहीं करेंगें हम तुमसे दोस्ती.. अरे! भई! हम यहाँ अपनी नानी-घर आये हैं.. गेस्ट हैं.. कुछ दिन बाद वापस चले  जाएँगे”।

इस तरह खुशी-खुशी कानू की छुट्टियाँ प्यार से नानी-घर में बीत रहीं थीं। घर के सभी सदस्यों को भी बेहद लगाव हो चला था.. क़ानू से। आते-जाते बस!.. घर में क़ानू!..कानू!.. होती रहती थी। पर अब छुट्टियाँ ख़त्म हो चुकीं थीं.. और हमें वापिस भोपाल आना था.. क़ानू अब वापस सबको छोड़कर भोपाल चली जाएगी.. सब उदास हो गए थे। हमारी भतीजी तो रो ही पड़ी थी.. कहने लगी थी,” बुआ! आप कानू को हमें ही दे जाओ!.. अब हम भी प्यारी सी कानू बगैर न रह पाएँगे”।

“ पूछ लो!.. तुम कानू से.. हाँ!.. कहती हो.. तो रह जायेगी.. तुम्हारी कानू… तुम्हारे पास!”। हमनें भतीजी से कहा था।

भतीजी ने क़ानू को अपने पास बुलाकर यही बात पूछी थी.. हमारी क़ानू समझदार होते हुए.. दीदी की बात सनझ गई थी.. और अपनी पिंक कलर की जीभ से दीदी के गाल को प्यार कर अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए.. हमारे पास आकर खड़ी हो गई थी.. मानो कह रही हो,” दीदी! अगले साल हम फ़िर आएँगे.. और आपको भी अपने घर ज़रूर बुलाएंगे..  पर हम अपनी माँ के साथ ही भोपाल वापिस जाना चाहते हैं.. अब हमें हमारे घर की छत्त बहुत याद आ रही है.. और चिड़िया, तितली भी हमें याद कर रहे होंगें.. हमें जाना होगा”।

हुमारे विदा होने का दिन आ गया था.. माँ-बाबूजी और घर के सभी सदस्य हमारे और हमारी कानू के लिये बहुत सारे तोहफे ले आये थे। हमारे पड़ोसी भी प्यारी क़ानू को विदा करने घर आ गए थे.. और पड़ोसियो ने भी क़ानू को अलग-अलग रंग के पट्टे तोहफ़े में देकर विदा किया था।

वही बेहोशी की दवा दे अब हम कानू को लेकर ट्रेन में भोपाल की तरफ़ आ रहे थे…. अचानक कानू को कंपार्टमेंट में होश आया था.. क़ानू ने इधर-उधर देखा था.. नानी-मामा कहाँ हैं!.. माँ!.. हमसे पूछने लगी थी… हमारी लाड़ली कानू!

पर हमनें क़ानू को गोद में लेकर प्यार से समझाया था,” काना!.. अब आप अपनी छत पर खेलने जा रहे हो!.. फ़िर आएँगे.. अगले साल!”।

और प्यारी क़ानू बात समझ गई थी। यूँहीं हर साल क़ानू संग नानी-घर आते-जाते.. तोहफ़े और खुशियाँ बटोरते एक बार फ़िर हम सब चल पड़े थे.. प्यारी कानू-मानू के साथ।