“गुरु! टेलीग्राम आया है।” कदम ने राम लाल को सूचना दी थी। “बाबू कह रहा है कि आ कर ले जाएं अपना टेलीग्राम।” उसने आदेश को कह सुनाया था।

राम लाल जैसे नींद से जागा हो – इस प्रकार की प्रतिक्रिया हुई थी।

नई नवेली बनी पर्ण कुटीर तैयार थी। राम लाल ने अभी-अभी पर्ण कुटीर का जायजा लिया था। राज हंस को स्थापित करने का निर्णय टाल दिया था। सच था उसका सपना – वह तनिक मुसकराया था। आनंद बाबू आ रहे हैं – उसे अटूट विश्वास था।

अजीब-अजीब भाव आ जा रहे थे। कई प्रकार के सच झूठ आ-आ कर राम लाल से लड़ रहे थे। बार-बार आनंद बाबू का दिव्य चेहरा आंखों के सामने आता और फिर मिट जाता। खुशी थी तो गम भी था। आस थी तो निराशा भी पास आ बैठी थी। हंसना चाहता था तो रोना भी साथ ही चला आता। राम लाल की आंखें खुशी के आंसुओं में डूबी हुई थीं। उसका हिया आनंद बाबू से मिलने के लिए तड़प उठा था।

“सेंड द टिकट।” टेलीग्राम में लिखा था।

लंबे पलों तक राम लाल उस लिखे को पढ़ कर शांत खड़ा रहा था।

“कल्लू को बुलाओ।” राम लाल ने पास खड़े कदम से आग्रह किया था।

कल्लू की राय मशवरा लेना महत्वपूर्ण था। एक से दो भले होते हैं – राम लाल का अपना मत था। और फिर कल्लू से बड़ा उसका हितैषी और था भी कौन?

“आ रहे हैं – श्रीमान।” राम लाल ने हंसते हुए कल्लू को सूचना दी थी। “अब तुम जानो।” राम लाल ने कल्लू की आंखों को पढ़ा था।

“अब क्यों आ रहा है?” कल्लू का प्रश्न था। “भूखों मरने लगा होगा।” उसने स्वयं ही उत्तर दिया था। “खैर। आने दो देखते हैं।” कल्लू का स्वर असंपृक्त था।

राम लाल अकुला गया था। कल्लू का सोच उसे अच्छा न लगा था।

“फिर मौका हाथ से छूट जाएगा कल्लू।” राम लाल ने चेताया था कल्लू को। “जो भी रहा हो।” राम लाल ने कल्लू को समझाया था। “स्वामी अनेकानंद थे तो हमारे ही साथ। समाधि में। यह तुम भी तो कह रहे थे?” राम लाल भावुक था। “अब तो पूरा देश विदेश जानता है कि स्वामी जी सिद्धि प्राप्त करने के बाद ही पट खोलेंगे।” राम लाल ने कल्लू को याद दिलाया था। “और हम अगर ये मौका चूक गए कल्लू तो बरबाद हो जाएंगे।” राम लाल का स्वर तल्ख था। “इस बार गलती नहीं करते यार।”

कल्लू चुप था। कल्लू सोच रहा था। राम लाल की बात में दम था – वह समझ रहा था। राज हंस अभी कोई हस्ती न था। जो आनंद बाबू का स्थान ले लेता – वह जानता था।

“ठीक है।” कल्लू मान गया था। “ठीक से स्वागत करते हैं स्वामी अनेकानंद का।” कल्लू तनिक मुसकुराया था। “अब सब मुझ पर छोड़ दो गुरु। देखना क्या गुल खिलाता हूँ।”

राम लाल की प्रसन्नता का ठिकाना न था। कदम का चेहरा भी खिल उठा था। वह भी स्वामी अनेकानंद का कहीं परम भक्त था।

स्वामी अनेकानंद का दिव्य और ईश्वरीय चेहरा उन तीनों के सामने आ खड़ा हुआ था। तीनों ने भक्ति भाव के साथ आनंद बाबू का भव्य स्वागत करने का मनसूबा बना लिया था।

“आज ही टिकट भेजो गुरु।” कल्लू ने फरमान जारी किया था। “सब कुछ गुप्त रह कर करना होगा।” उसने तीनों के बीच की बात की थी। “आप ही जाना आनंद बाबू को रिसीव करने।” कल्लू कह रहा था। “हम दोनों यहां का मोर्चा संभालेंगे। उसने कदम को मुसकुराते हुए देखा था। “जश्न मनाते हैं, गुरु।” कल्लू ने घोषणा की थी। “ऐसा जश्न जिसे लोग देखते रह जाएं।” कल्लू ने आज अंतरमन से घोषणा की थी।

लगा था – कल्लू के मन प्राण में भी न जाने क्यों आनंद बाबू वास करते थे।

तीनों प्राणी बारी-बारी गले मिले थे। तीनों प्राणियों ने आते आनंद बाबू को कंघों पर उठा लिया था।

जैसे रेल गाड़ी प्लेटफार्म पर रुकी थी राम लाल का दिल धड़ाधड़ धड़कने लगा था।

रात के दो बजे थे। लेकिन प्लेटफार्म अभी भी भीड़ से भरा था। राम लाल बोगी नम्बर एस 3 के सामने खड़ा था। यात्री सामान ले लेकर बाहर आ रहे थे। राम लाल की निगाहें आनंद बाबू को खोज रही थीं। एक मैले कुचैले यात्री को देख राम लाल को भ्रम हुआ था – आनंद बाबू के होने का। लेकिन उसका मन न माना था। बोगी खाली हो गई थी। उदास निराश राम लाल ने मुड़ कर प्लेटफार्म को देखा था। मैले कुचैले उस आदमी के ब्रीफकेस पर निगाह पड़ते ही राम लाल ने पहचान लिया था – आनंद बाबू को।

धूल धूसरित आनंद बाबू का चेहरा निस्तेज था। आंखें भी छोटी-छोटी दिख रही थीं। बाल न जाने कब से न धुले थे – गंधा रहे थे। कपड़े वही थे जो आनंद बाबू बंबई से पहन कर गए थे। जूते फट गए थे। काया सूख गई थी। दांत दिख रहे थे। लग रहा था उनका दम अब बाहर आ जाएगा और …

“स्वागत है आपका आनंद बाबू।” राम लाल ने पास जा कर भर्राए कंठ से कहा था।

राम लाल को अपार दुख हुआ था – आनंद बाबू को उस हाल में देख कर। जरूर कोई न कोई हादसा हुआ था – राम लाल ने अनुमान लगाया था।

“आप से मिलना हो गया इतना ही बहुत है। मैं तो सोच रहा था कि शायद …?”

“मैं न आता?” राम लाल ने वाक्य पूरा किया था। “ऐसा कैसे हो सकता है आनंद बाबू?” राम लाल ने प्रसन्नता जाहिर करने की कोशिश की थी। “आप तो हमारे मन प्राण हैं। आप लोगों के मन प्राण हैं। आप …”

“बस भी कीजिए राम लाल जी।” धीमे से कहा था आनंद बाबू ने।

आनंद बाबू की आवाज में अनूठा दर्द था। एक गहरी टीस थी। एक पश्चाताप था।

राम लाल डर गया था। आश्रम पहुंचने तक अबोला रहा था। बीस हजार रुपये क्यों नहीं भेजे – अगर आनंद बाबू ने पूछा तो क्या उत्तर देगा – राम लाल सोच में पड़ गया था। बर्फी को बीच में लाना राम लाल को मुनासिब न लग रहा था।

रात का अवसान था। सब सोए पड़े थे। राम लाल ने आश्रम के बाहर ही आनंद बाबू को कार से उतारा था। कदम ने आनंद बाबू का ब्रीफकेस उठा लिया था। कल्लू ने पर्ण कुटीर का पीछे का दरवाजा खोला हुआ था। उन तीनों ने आनंद बाबू को पिछले दरवाजे से पर्ण कुटीर के अंदर दाखिल किया था। तीनों ने मिल कर आनंद बाबू के कपड़े बदले थे। वही पुराने कपड़े – बिना धुले और प्रेस किए आनंद बाबू की सूखी काया पर पेस्ट कर दिए थे।

“आराम कीजिए। कदम आपको नाश्ता पानी कराएगा।” कल्लू आनंद बाबू को समझा रहा था। “चार बजे आपने पर्ण कुटीर की हरी बत्ती जला देनी है बस।” तनिक मुसकुराया था कल्लू। “आप का पुनर्जन्म होगा आनंद बाबू। आप की सिद्धि सफल हुई है। आज आप साधना से उठे हैं। अब आप इस संसार में पुन: प्रवेश कर रहे हैं।” कल्लू ने संक्षेप में आनंद बाबू को सब कुछ समझा दिया था।

आनंद ने अबोध बालक की तरह कल्लू का कहा सब कुछ स्वीकार लिया था।

“पंडित जी।” कल्लू ने फोन पर पंडित अवध नारायण को जगाया था। “आप को अभी आना होगा। स्वामी अनेकानंद जागृत हो रहे हैं। उनकी सिद्धि संपूर्ण हुई। छह बजे पट खुलेंगे। आप आइए। पूजा हवन कीर्तन का संचालन कीजिए।”

“बड़ी सुंदर खबर है कल्लू जी। मन खुश हो गया। मैं तुरंत पहुंचता हूँ।” पंडित अवध नारायण कल्लू की बात मान गए थे।

आश्रम जगने लगा था। खबर फैलने लगी थी। एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। हवा पर तैर आया था एक जुनून। स्वामी जी के दर्शन लाभ का लोभ लोगों को खींचने लगा था। यहां तक कि प्रेस और अखबार तक जागे थे और दर्शन लाभ के लिए भागे थे।

दर्शकों के आने पर गर्मागरम चाय थी, तो जाने पर प्रसाद का पैकिट था।

विभूति को भनक लगते ही उसने मीरा मर्फी को फोन किया था।

“साथ-साथ निकलते हैं भारत के लिए विभूति।” मीरा मर्फी मान गई थी।

आनंद ने महसूस किया था कि वो आज एक नहीं दो में विभक्त हो गया था। एक था वो आनंद जो फिर से राम लाल के प्रपंच में शामिल हो गया था और एक दूसरा आनंद था जो उसके भीतर बैठा-बैठा अंदर से भभक रहा था।

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मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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