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खानदान 53

indian wedding

क्या कर रही थी.. सुनीता!.. अरे! सासु-माँ ने ही तो चोरी करवाई थी.. और उन्हीं से उनके वफादार कुत्ते रमेश की शिकायत करने लगी हुई थी। अरे!.. पगली!.. तेरे आदमी में दिमाग़ था, ही कब!.. माँ के हाथ के इशारों पर चलने वाली कठपुतली से ज़्यादा कुछ भी नहीं था.. रमेश!.. काश! तूने अपने इशारों पर दुनिया की और औरतों की तरह नचाने की अक्ल रखी होती.. तो रमेश कभी-भी दहलीज़ लाँघ कर घर के बाहर क़दम नहीं टेकता।

खैर! अलमारी के लॉकर में से सोना निकलने से परेशान सुनीता ने घर से बाहर जा कर अपनी माँ को दिल्ली फ़ोन लगाया था,” माँ!.. मेरी सारी देहज में दी हुई अंगूठियां रमेश ने बेच खायीं.. अब में क्या करूँ!” सुनीता ने माँ से अपनी तकलीफ़ और समस्या जताई थी।

“ तू कुछ मत कर!.. अगर में यह बात तेरे पिताजी को बतायउँगी.. तो उन्हें यह सब जानकर बहुत तकलीफ़ होगी!. और वैसे भी होनी तो हो कर ही रहती है.. जो कुछ हो रहा है!.. तेरे साथ.. वही परमेश्वर की मर्ज़ी है। बेटा!.. तू अपना चेहरा मत ख़राब कर.. इस होनी के निशान अपने चेहरे पर मत आने देना.. तेरा चेहरा ख़राब होता चला जाएगा.. लेकिन होनी हो कर ही रहेगी.. ठीक है!.. अपना ध्यान रखना”। और अनिताजी ने फ़ोन रख दिया था।

“ अब मैं क्या करूँगी!”।

सोच में डूबी सुनीता.. टेलीफोन बूथ से घर लौट रही थी.. अनिताजी ने परमात्मा के ऊपर बात छोड़ दी थी। एक तरह से अनिताजी अपनी जगह बिल्कुल सही थीं.. पर क्या शैतान को यूँ छोड़ देना ठीक था.. यह निर्णय दर्शनाजी के आगे बढ़ रहे कदमों को बढ़ावा देना था। नहीं-नहीं दर्शनाजी जैसी शातिर दिमाग़ औरत भली-भांति जानती थी.. की क्या नाटक करने से क्या हो सकता है। यह शैतान जात की औरत कभी-भी अँधेरे में तीर नहीं चलाया करती थी.. जब तक इस औरत को नतीजा कन्फर्म नहीं हो जाता था.. बंदी तरकश में से तीर नहीं निकाला करती थी। लेकिन अनिताजी ने दर्शनाजी की तरह इतनी लम्बी-चौड़ी न सोच कर.. वाकई में अपनी बिटिया को परमात्मा के आगे समर्पण करने को कहा था। अनिताजी ख़ुद भी एक पूजा-पाठ वाली और ईश्वर की लीला में अखंड विश्वास रखने वाली महिला थीं।

सुनीता बहुत दुखी थी.. चिल्ला-चोट सब करके देख लिया था.. दौड़ कर माँ के पास पूछने भी पहुँची.. पर कोई सुनीता को समस्या का सही हल नहीं मिल पाया था। हालाँकि जो अनिताजी सुनीता को समझाना चाहतीं थीं.. वही समस्या का सही समाधान था। पर उम्र कम होने के कारण सुनीता अपनी माँ की बातों की गहराई को समझ न पाई थी। इधर रमेश अपनी माँ के साथ एकदम मस्त था.. माँ-बेटा जम कर हँसी-ठठठ्ठा कर रहे थे.. रमेश को अपनी की हुई ग़लती का ज़रा भी अफ़सोस नहीं था.. और अफ़सोस कैसा भाई!.. रमेश की नज़रों में तो उसनें कोई गलती की ही नहीं थी.. वो तो पूरे तरह से ईमानदार था.. अलमारी के लॉकर में से सोना निकालकर बेचना उसका हक था.. आख़िर रमेश की सोच के हिसाब से जो कुछ भी उसनें बेचा.. वो उसकी चीज़ थी। पर सच! तो यह था.. कि सोच रमेश की नहीं.. रामलाल विला की डॉन दर्शनादेवी की थी। रमेश तो केवल बिना दिमाग़ का घोड़ा था.. जिस दिशा में माँ चाबुक मार देती थी.. हिनहिना कर बिना ही आगे का खुदा हुआ गड्ढा देख कर दौड़ पड़ता था।

हारी हुई सुनीता आख़िर क्या करती.. रमेश को यूँ दाँत निकलता देख.. अब सुनीता का ग़ुस्सा बाकी न था.. सुनीता का रमेश पर यूँ क्रोधित होना.. और मन ही मन मनचाही गालियाँ देकर रमेश को कोसना घटित घटना को मध्य नज़र रखते हुए.. बिल्कुल भी ग़लत न था.. अगर सुनीता की जगह कोई और थोड़ा तेज़ सी महिला होती.. तो सीधा पुलिस में रिपोर्ट कर माँ-बेटों की धज्जियाँ उड़ा देती.. करोड़पतियों से पैसा वसूल कर.. ऐसा नाटक रचती.. की बात तलाक तक पहुँच जाती.. नाटक कंपनी को भी सबक मिलता।अगर माँ का परमात्मा वाला फ़ॉर्मूला समझ नहीं आया था.. तो सुनीता को सारी दुनिया को एकतरफ रख.. पुलिस वाले फ़ॉर्मूले को ही अपना कर देख लेना चाहये था.. रमेश को भी तो पता चलवाती.. आख़िर सुनीता भी कोई अपनी शक्सियत रखती है। पर नहीं.. डरी और घबराई हुई सुनीता एक बार फ़िर माँ से बात करने के लिये टेलीफोन बूथ की तरफ़ बढ़ी थी। अरे! पगली!..इतना भी क्या घबराना था!.. अगर पीटने का मन कर रहा था… तो जम कर धुलाई करवा डालती.. माँ-बेटों की। पर नहीं फ़िर कुछ और ही सोच-सोच कर डर रही थी.. सुनीता को किसी ने यह सलाह नहीं दी थी.. कि परमात्मा के द्वार पर हथियार डालना तो ठीक बात थी.. पर परमात्मा का नाम लेकर आगे क़दम बढ़ाकर निर्णय लेने का अपना अलग ही मज़ा था.. ईश्वर उसी का हाथ थामकर मदद करते हैं.. जो वाकई में अपनी मदद ख़ुद करना चाहता है..चलने की हिम्मत हो.. तो परमात्मा कदमों तले गहरे पानी मे भी पैरों के नीचे पत्थर लगाते चलते हैं.. पर होना चाहये ख़ुद पर विश्वास.. नहीं तो सब व्यर्थ है!

दुखी सुनीता ने एकबार फ़िर माँ का नम्बर मिलाया था,” Hello! माँ!”।

अनिताजी सुनीता के”Hello!”  बोलने के अंदाज़ से ही बात को समझ गईं थीं.. “ हाँ! बिटिया!.. मैने तेरे पिताजी को तेरी समस्या के बारे में बता दिया था.. पिताजी ने कहा है.. सुनीता से कहना,” हवा को आने दो!.. हवा को जाने दो!.. तुम केवल अपने दोनों बच्चों की परवरिश में ध्यान दो!.. और उस घर में आराम से पिकनिक मनाते हुए मौज लो!”।

और फ़िर वही अपने तरीके से सुनीता को समझाकर फ़ोन रख दिया था।

मुकेशजी दूरदर्शी और सनझदार आदमी थे.. जानते थे.. असली चोर कौन है.. और चोर को पकड़वाने का उपाय क्या है.. मुकेशजी को पता था.. रामलालजी के घर में सारे नाटक की जड़ संपत्ति में हिस्सेदारी है.. जिसको पाने के लिये हर आदमी अपनी तरह से गेम खेले चल रहा है। रमेश ख़ुद कोई भी गेम न खेलकर अपनी माँ की वाफ़ादारी निभाये चल रहा था.. जो रमेश की कभी से थी ही नहीं.. बहुत उम्दा खेल खेल रही थी.. यह औरत.. इसको इस खेल में आउट करने का और सुनीता को अपना घोंसला बचाने का केवल एक ही तरीका शेष था.. “जो रमेश कहता चले, वो आँख बंद करके करते चलने में ही भलाई है.. बुढ़िया तभी पकड़ी जा सकती है.. नहीं तो दर्शनाजी की निगरानी में सही ढँग से घोंसला बनना असंभव है.. अभी कड़वी दवा के घूँट पीने और संघर्ष करने में कोई बुराई नहीं है.. बाद में मीठी दवा परमात्मा अपने आप दे देंगें”।

एक पिता की अपनी बेटी के शुभचिंतक होने के नाते सलाह थी।

सारी दी जाने वाली सलाह सुनीता को सहीं थीं.. आख़िर बताने वाले बेहद संस्कारी और सच्चे लोग थे। अपने पिता और घर वालों की बात मानकर और जो कुछ हुआ.. उसे भूलकर एकबार भोली और मन की साफ़ सुनीता.. फ़िर से अपने दोनों बच्चों के संग मुड़ी थी.. रमेश की तरफ़।

“ दस लाख रुपये आ गए.. पापा के बैंक में!”। प्रहलाद और नेहा ख़ुशी से उछले थे।