सुबह का सूरज निकलने के साथ-साथ दोनों भाई नाश्ता पानी करते और कदम खंडी पर पहुंचते।
आनंद की आंखें अचानक ही बिल्लू के बताए कोमल सपने से जा मिलतीं। कदम खंडी की साढे़ सात बीघा जमीन जैसे आनंद को आ कर बार-बार सैल्यूट मारती और मालिक होने के गर्व से भर देती। कदम खंडी पर कोठी बनाने का सपना भी साथ होता। और फिर एक सीधी सादी संस्कारी कन्या दृष्टिगोचर होती। आनंद का तन मन रोमांचित हो जाता।
अचानक ही पूरी कदम खंडी एक अलौकिक उपवन बन आनंद को रिझाने लगती। न जाने कैसे आनंद की जुबान पर प्रेम संवाद उग आते। आंखों में स्नेह उमड़ आता। नई नवेली संस्कारी युवती को स्पर्श करने की इच्छा उत्पन्न हो आती।
“अगले बुधवार को मेरी सगाई का शगुन आना है भइया।” बिल्लू ने आनंद को जगा सा दिया था। “तब तक तो पैसे आ जाएंगे ना?”
“हां-हां। आ जाने तो चाहिए बिल्लू।” आनंद ने सगर्व हामी भरी थी।
“मैं इसलिए कह रहा हूँ भइया कि सुनार जेवर उधार नहीं देता।” बिल्लू ने आनंद को खबरदार किया था।
आनंद मुसकुराया था। बिल्लू अपनी शादी के लिए कितना लालायित था – आनंद हैरान था। कल का बिल्लू और आज का बिल्लू अलग-अलग थे। वह भी तो कितना बदल गया था – आनंद ने भी महसूस किया था। स्वामी अनेकानंद का पूरी बंबई में डंका बजा था – उसे याद हो आया था। लेकिन बिल्लू नहीं जानता था कि …
“कदम खंडी के कागज करा कर ही बंबई लौटना भइया।” बिल्लू ने सुझाव दिया था। “आप के नाम पर ये जायदाद चढ़ेगी। इसलिए आपका होना जरूरी होगा।” बिल्लू ने कारण बताया था।
“ठीक है बिल्लू। मैं रुक जाऊंगा।” आनंद ने हामी भरी थी।
बंबई जाने की जल्दी में आनंद था भी नहीं।
चुपचाप एक चिंता बिल्लू से आ चिपकी थी। अगर पैसे नहीं पहुंचे तो सगाई टूट जाएगी। वह जानता था। उसे हजार रुपये हर माह मिलने की घटना याद थी। कभी पैसा लेट न होता था। लेकिन अब ये देर कैसी – वह समझ न पा रहा था।
“बड़े डाकखाने पूछ कर आ जाऊं भइया?” बिल्लू ने आनंद को सुझाव दिया था। “हो सकता है पैसे पहुंच गए हों और कोई अड़चन हो।”
“हर्ज क्या है।” आनंद भी मान गया था। “चला जा।” आनंद ने अनुमति दे दी थी।
उस दिन अकेला आनंद कदम खंडी में अपने सपनों के साथ निर्बाध घूमा था।
जैसे आनंद अपनी आजादी का जश्न मना रहा था – उसने हर सपने को छू-छू कर देखा था। हर मुराद को मांग-मांग कर घर बसाया था। दोनों भइयों ने मिल कर खूब नाम और नामा कमाया था। और राम लाल की कैद से मुक्त होने का जश्न कई-कई बार मनाता रहा था आनंद।
“लोगों को बेवकूफ बनाना अच्छी बात नहीं है।” आनंद ने स्वयं से कहा था। “अब दोनों भाई अपनी मेहनत की कमाई पर बसर करेंगे।” आनंद का अंतिम निर्णय था।
लेकिन बिल्लू डाकखाने से खाली हाथ लौटा था तो आनंद को धक्का लगा था। उसे राम लाल पर क्रोध चढ़ आया था।
“पैसा उल्टे पैरों चलता है भइया।” बिल्लू ने आनंद को ज्ञान बांटा था। “आदमी जब आगे जाता है तो पैसा पीछे जाता है।” बिल्लू तनिक हंसा था। “अगर पैसा नहीं आता तो …”
जाओ यहां से – बिल्लू का मूक संदेश था।
आनंद एक बार फिर चौड़े में आ गया था।
“कितनी बेवफा निकली बर्फी?” अकेले में बैठा राम लाल सोच रहा था। “बिल्ली की तरह छुप कर वार किया।” राम लाल का मन भर आया था। “जबकि उसने बर्फी को हर सुख दिया, सहारा दिया, बच्चे दिये और … और वो बंगला?” राम लाल की भीगी पलकों के पार खड़ा बर्फी का बंगला उसे बुलाने लगा था। “मलाल नहीं था उसे उठ कर चले आने का, लेकिन ये जो प्रहार हुआ – सारा सौहार्द तोड़ कर रख दिया। दुश्मनी हो या दोस्ती हो – होती तो खतरनाक है।” टीस आया था राम लाल।
आनंद के साथ भी तो राम लाल एक शिद्दत के साथ जुड़ गया था।
“बीस हजार पहुंच जाते तो आ जाता आनंद।” राम लाल का अंतर बोला था। “अगर बीस हजार और भी पहुंच जाते हैं तो क्या?” राम लाल उंगलियों पर हिसाब लगा रहा था। वक्त पलट रहा है।” राम लाल को आभास हुआ था। “चिपकाए रक्खो पूंजी को।” वह खबरदार था।
“क्या खबर है गुरु?” अचानक कल्लू ने राम लाल का ध्यान तोड़ा था। “है कोई सूचना आनंद बाबू की?” उसने सीधा प्रश्न दागा था।
राम लाल की आंखें भर आई थीं। उसके मन में टहलता दुख दौड़ कर कल्लू के पास उठ कर आ गया था। कल्लू को भी एहसास था कि आनंद के जाने के बाद सब सूना-सूना था। आश्रम खाली हो गया था। होटल से भी लोग भाग रहे थे। विपासना वाली बात का असर कम हो रहा था। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे थे।
“अब क्या होगा कल्लू?” राम लाल ने भारी कंठ से प्रश्न किया था।
“कौन कयामत आएगी गुरु?” चहका था कल्लू। “फिकर नॉट।” उसने राम लाल को तसल्ली दी थी। “मैं सोच रहा हूँ कि घनानंद को भेज कर मठ से एक नया मोढ़ा मंगवा लूं।” कल्लू ने राम लाल की भीगी आंखों को देखा था। “डरो मत।” कल्लू ने राम लाल को साधा था। “नया नोसरा होगा तो हमें भी सुहाएगा गुरु, उसे भी अपने टोने टोटके, तंत्र मंत्र और जादू टोना सिखा देना।” कल्लू मुसकुराया था। “इत्ती सी तो बात है।”
राम लाल भी हलका हो आया था।
कल्लू की बात में दम था। एक से दो हो भी जाएंगे तो हर्ज क्या था। आनंद को भी तो उसी ने सिखाया पढ़ाया था। एक से आगे दो और दो से आगे अनेकों अनेकानंद क्या एक अच्छा विचार नहीं था?
“घनानंद …?” राम लाल ने मुड़ कर प्रश्न किया था।
“बड़ा ही धांसू आदमी है गुरु।” कल्लू ने स्पष्ट कहा था। “ये तीर चल गया न तो ये साला मग्गू मोची पी एम बन कर रहेगा। और सच्ची गुरु हम लोगों के सारे पाप धुल जाएंगे।” कल्लू ने राम लाल के हाथ पर हाथ मारा था। “क्या साले की आवाज है गुरु। क्या लहजे में बोलता है – पूछो मत।” कल्लू घनानंद की प्रशंसा करता रहा था। “पढ़ा लिखा है। बी ए पास।” कल्लू फिर हंसा था। “कमाल ये गुरु ये सारे पढ़े लिखे इत्ते मूर्ख क्यों होते हैं कि …”
“लेकिन आनंद मूर्ख नहीं है कल्लू।” राम लाल को याद हो आया था। “लौट आया तो …”
“और इंतजार करना तो बेकार है गुरु। कब तक लोगों को पागल बनाएंगे? अगर भांडा फूट गया तो मारे जाएंगे।” कल्लू ने राम लाल को सचेत किया था।
अचानक राम लाल को बर्फी की डराती आवाज सुनाई दी थी – झूठ। झूठ बोलते हो।
“मैं सोचता हूँ कल्लू कि आनंद को बीस हजार और भेज दूं। हो सकता है आनंद किसी मुसीबत में हो?” राम लाल का शुभ विचार था। “है तो अपना ही आनंद।”
कल्लू की निगाहें बदली थीं। कल्लू ने अच्छे और नेक राम लाल को दोबारा देखा था। भला आदमी था राम लाल लेकिन किस्मत का हारा था – ठीक उसी की तरह। दूसरों के लिए जीने की आदत पड़ जाती है तो आदमी खुद के लिए कुछ नहीं कर पाता। उसे भी तो औरों के लिए खटने में खूब खुशी मिलती थी।
“मुझे साफ-साफ नजर आ रहा है गुरु।” कल्लू की आवाज तल्ख थी। “पैसे न भेजोगे तो शायद है कि आनंद लौट आए। और अगर पैसे भेज दिए तो फिर आनंद कभी नहीं लौटेगा।” हाथ झाड़ दिए थे कल्लू ने। “मर्जी आपकी।” वह मुसकुरा रहा था।
राम लाल ने कल्लू की बात मान ली थी और आनंद को पैसे नहीं भेजे थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड