पूरे छह दिन लगा कर राधू रंगीला ने लच्छीपुरा गांव का सेट तैयार किया था।
आज सातवें दिन शूटिंग शुरू हो रही थी। मानस और प्रतिष्ठा का कोई रोल न था। अत: वो दोनों दर्शक दीर्घा में साथ-साथ बैठे शूटिंग होते देख रहे थे।
सबसे पहले कैमरे में गांव लच्छीपुरा का बोर्ड दिखाई दिया था। उसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता लच्छीपुरा कैमरे पर उभरने लगा था। सबसे पहले सरपंच हाउस पर लगा झंडा दिखा था। फिर समूचा सरपंच हाउस उजागर हुआ था। उसके बाद खेत खलिहान दिखे थे। फिर एक छोटा नाला उजागर हुआ था। नाले के पार गरीबा का घर सामने आया था। उसके आस पास अन्य घर, झोंपड़े और झुग्गियां नजर आई थीं। भेड़ बकरियों का अहाता दिखा था। और फिर कैमरा वहीं आ कर रुक गया था जहां नब्बो कमरे में बंद थी।
गांव का पूरा नक्शा देखने के बाद दर्शकों को भारत का समूचा मानचित्र दिखाई दे गया था। दो भागों में बंटे गांव की विभाजन रेखा बना छोटा नाला गरीबी अमीरी की दो भुजाओं जैसा लग रहा था। मतलब कि लच्छीपुरा में सभी गरीब और अमीर साथ-साथ रहते थे। लेकिन बीच में बहता छोटा नाला उन्हें दो गुटों में बांटना नहीं भूलता था।
कैमरे पर भेड़ बकरियां जंगल में चरने जाती दिखाई दी थीं। लड़का उन्हें टिटकारियां देता लिए चला जा रहा था।
थोड़ी देर बाद एक लड़की नब्बो का खाना लिए कमरे की कुंडी खोलती नजर आई थी।
लड़की कमरे के अंदर गई थी लेकिन फौरन लौट आई थी। वह घबराई हुई थी। खाने की प्लेट हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गई थी और दूर तक लुढ़कती चली गई थी।
“भाग गई नब्बो।” लड़की जोरों से चीखी थी और फिर गरीबा के घर की ओर भागी थी।
कैमरा भागती लड़की का पीछा करता रहा था। लड़की नाला पार कर सरपंच हाउस में घुसती दिखाई दी थी।
सरपंच हाउस के भीतर नब्बो की मां गोपू झाड़ू पोंछा कर रही थी।
“नब्बो भाग गई मौसी।” लड़की पछाड़ खा कर गोपू के सामने गिर पड़ी थी। “भाग गई।” वह दहाड़ें मार रही थी। “कमरे में नहीं है। कमरा बाहर से बंद था।” लड़की बताती रही थी।
गोपू के होश उड़ गए थे। झाड़ू पोंछा छोड़ वह घर से बाहर भागी थी।
शोर सुन कर सरपंच की पत्नी यशोदा कमरे में आई थी। गोपू और लड़की को बाहर जाते देख वह हैरान खड़ी रह गई।
सरपंच मुखमेल सिंह भी शोर सुन कर कमरे के अंदर आ गया था।
“धीरज कहां है?” मुखमेल सिंह यशोदा से पूछ रहा था।
“वो … वो धीरज …?” यशोदा घबरा गई थी। “वो तो कल ही मौसी के यहां चला गया था। झूठ बोला था यशोदा ने।
कैमरा ने लच्छीपुरा को फिर से दिखाया था।
शोर उठता चला जा रहा था। लोग घरों से निकल-निकल नाले पर जमा होने लगे थे। नब्बो के भाग जाने की सूचना आग की तरह फैलने लगी थी। धीरज गांव में नहीं था – लोगों को पता चल गया था। गांव वालों का जमा हुजूम जोर-जोर से बतियाता लगा था।
“अब गरीबों की इज्जत भी नीलाम होगी।” भीड़ में से किसी ने कहा था।
“पूछो सरपंच को।” और भी आवाजें उठी थीं।
सरपंच मुखमेल सिंह सामने खड़ी जटिल घटना का मुंह ताकता रहा था।
गोपू रोती बिलखती घर में घुसती है। गरीबा को देखते ही दहाड़ें मारने लगती है। गरीबा थर-थर कांपने लगता है। कुछ लोग गरीबा के घर के आस पास इकट्ठे हो जाते हैं।
“मुझे नब्बो चाहिए।” गोपू की रुलाई नहीं रुकती। मैं … मैं … मर जाऊंगी।” कहते-कहते वह जमीन पर लेट हाथ पैर फेंकने लगती है। गरीबा घर से बाहर आता है। पगला गया गरीबा नाले पर जमा भीड़ को देखता है। वह भी आहिस्ता-आहिस्ता चल कर भीड़ में मिल जाता है।
अब कैमरा सरपंच हाउस पर चला जाता है।
सरपंच हाउस के सभी खिड़की दरवाजे बंद हैं। सरपंच मुखमेल सिंह और पत्नी यशोदा घर के भीतर मोढ़ों पर बैठे हैं। दोनों डरे हुए हैं।
“सच-सच बोल।” मुखमेल सिंह यशोदा से पूछता है। “कहां है धीरज?”
“कल खेत पर गया था। उसके बाद नहीं आया।”
दोनों चुप हैं। डरे हुए हैं – घर के बाहर जमा होते लोग दिखाई दे रहे हैं। शोर मचाते कुछ लड़के खिड़की दरवाजों को पीटने लगते हैं।
“बाहर निकलो।” भीड़ चिल्लाने लगती है।
राधू रंगीला अब एक बार फिर लच्छीपुरा को कैमरे में कैद करता है।
सरपंच हाउस उमड़ती भीड़ के बीचों-बीच एक चुनौती जैसा खड़ा दिखता है।
“गरीबों की तो बहन बेटी भी सुरक्षित नहीं हैं।” एक युवक कहता फिरता है।
भीड़ उत्तेजित होने लगती है। सभी को अब सरपंच को देखना है। सभी को धीरज कहां है यह जानना है। सब लोग गरीबों पर होते जुल्मों को गिन रहे थे।
दिन ढलने की ओर चल पड़ा है।
लोकेशन पर पुलिस का आगमन हुआ है।
भीड़ नारे लगाने लगती है। पब्लिक का रोष रोके नहीं रुक रहा है। दुख में सब गरीबा के साथ हैं। गरीबा की बेटी सब की बेटी है। गांव लच्छीपुरा की इज्जत है नब्बो।
पुलिस ने सरपंच हाउस का दरवाजा खुलवाया है। मुखमेल सिंह और यशोदा अब घर से बाहर आए हैं। पुलिस ने सब के सामने तहकीकात की है।
“दोनों बालिग हैं। बड़े हैं। कहीं भी आ जा सकते हैं। किसी से भी मिल जुल सकते हैं।” पुलिस ने जमा भीड़ को बताया है। “ये कोई क्राइम नहीं है।” पुलिस का कहना है।
“नब्बो को धीरज भगा ले गया है।” एक युवक गरजा है। “और पुलिस …?”
“तुमने आंखों से देखा है?” पुलिस ने युवक को पकड़ कर पूछा है।
“नहीं।” लड़के का उत्तर है।
“फिर तुम ये बयान झूठे दे रहे हो। तुम्हें बंद करूंगा।” पुलिस ने लड़के को धमकाया है। “कोई ऊंच नीच नहीं है। सब लोग समान हैं। वह दोनों बालिग हैं। साथ-साथ रह भी सकते हैं, शादी भी कर सकते हैं – उन्हें कोई नहीं रोकेगा। ये देश का कानून है।”
जमा भीड़ पुलिस का मुंह ताकती रहती है।
“जाइए अपने-अपने घर। कोई दंगा पंगा किया तो …?”
लोग लौटने लगते हैं। भीड़ छटने लगती है।
“मेरी बेटी …?” गरीबा ने पुलिस से सीधा सवाल किया है।
“सरपंच के बेटे की बहू बनेगी। तुझे कौन सा घाटा है गरीबा?” पुलिस वाला बोला है।
जमा लोग भी हंस पड़े हैं।
प्रतिष्ठा और मानस ने एक दूसरे को ललचाई निगाहों से देखा है।
दोनों में से कोई भी घाटे में नहीं है। वह मान गए हैं।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड