चुनाव के प्रचार प्रसार में एक अलग तरह की सुनामी ला दी थी स्वामी घनानंद ने।
मात्र सनातन को लेकर ही स्वामी घनानंद ने कुछ ऐसा जादू मारा था कि लोग उन्हें सुनने के लिए खिचे चले आते थे। जैसे सोते भारत को स्वामी घनानंद जगा रहे थे और स्वामी विवेकानंद की तरह जन क्रांति लाने का प्रयत्न कर रहे थे – लोगों को बहुत पसंद आ रहा था।
यही कारण था कि बबलू ने मजबूर हो कर विलोचन शास्त्री को चुनाव प्रचार में घसीट लिया था। विलोचन शास्त्री भी अपने पूरे पराक्रम के साथ अब स्टेज पर बोलते थे और जनता को बताते थे कि वो नारी समाज को आगे ला कर एक संपूर्ण क्रांति का सृजन कर रहे थे। उनका कहना था कि बिना नारी के सहयोग के देश संभ्रांत नहीं बन सकता। नारी लक्ष्मी का रूप थी। नारी दुर्गा का अवतार थी। और नारी विश्व शांति का प्रतीक थी।
लेकिन घना नंद की गर्जना विलोचन शास्त्री के बुने बारीक ताने बाने को एक ही दहाड़ में उड़ा देती।
“सनातन ही एक ऐसा सच है जो भारत को विश्व गुरु बना सकता है।” स्वामी घनानंद दूर की कौड़ी ला कर जनता को थमा देते। “धर्म के अभाव में कोई राष्ट्र टिक ही नहीं सकता। हमें सनातन चाहिए। हमें संस्कृत चाहिए। हमें संस्कार चाहिए।” स्वामी घनानंद बताते और बीच-बीच में संस्कृत के श्लोक बोलते।
स्वामी घनानंद का जादू जनता के सर पर चढ़ कर बोलने लगा था।
इसलिए बबलू ने एक नई लाइन खोली थी।
“हमारी पार्टी पावर में आती है तो हम महिलाओं को तैंतीस परसेंट टिकिट में आरक्षण देंगे। हम चाहेंगे कि नर और नारी समान स्तर पर हों, फिर चाहे वो राजनीति हो या नौकरियां। समाज जब तक नहीं सुधरेगा जब तक हम नारी को चौखट के पीछे छुपा कर रक्खेंगे। हमें उसे अब आजाद करना ही होगा।
खूब तालियां बजती थीं। खूब भीड़ इकट्ठी होती थी।
“मैं चाहती हूँ कि हमारी कामकाजी महिलाओं की हम मदद करें। हर माह उन्हें तीन हजार की रकम गुजारा भत्ता के तौर पर दें।” ये पल्लवी अलग से वायदा करती थी।
पल्लवी की घोषणाएं नारी समाज को मंत्र मुग्ध कर देतीं। लगता पल्लवी ही मायनों में नारी समाज के उत्थान के लिए समर्पित है।
“मैं नारियों के विरोध में नहीं हूँ।” स्वामी घनानंद बीच-बीच में बबलू और पल्लवी के किए प्रचार पर चोट कर जाते। “लेकिन मैं चाहता हूँ कि आज की नारी का चेहरा गार्गी और मैत्रेयी का चेहरा होना चाहिए न कि एक फूल बेचने वाली का।”
जोरों से तालियां बजतीं और पब्लिक स्वामी घनानंद के साथ सहमति जताती तो एक अलग उमंग नारी समाज में उठ खड़ी होती।
“नारी को अनपढ़ रक्खा जाता है। नारी का शोषण होता है। नारी को पुरुष के मुकाबले कमतर माना जाता है। कमजोर कहा जाता है। मैं चाहती हूँ बहनों कि हम इस सामाजिक बुराई से लड़ें। और इस का तरीका है। हमारे पास भी पुरुष की तरह ही बराबर की पावर हो। और जब हम विधान सभा में बराबरी पर बैठेंगी तब हम अपनी मांगें पा सकेंगी। वरना तो …”
पल्लवी की इन तकरीरों का असर होता था।
लेकिन सीता देवी को लगता कि पल्लवी एक जाल बुन रही थी। उन्हें अहसास होता कि पल्लवी बबलू की बगल में बैठ कर पार्टी हथियाने का षडयंत्र रच रही थी। विलोचन शास्त्री बूढ़े हो रहे थे। प्रतिष्ठा विदेश में थी। वह स्वयं भी विवश थीं। पल्लवी के लिए यह एक अच्छा मौका था जब वह … सीता देवी की जंग विलोचन शास्त्री के साथ जुड़ गई थी।
“क्यों खटते हो रात दिन? खांसते-खांसते रात गुजरती है। क्या तुम्हें सामने खड़ी मौत नहीं दिखती?”
“चुनाव जीतने के बाद ही मरूंगा मैं – सीता।” हंस कर कहते विलोचन शास्त्री।
मग्गू मोची ने अपने पूर्व चुनावी अनुभव से महसूसा था कि स्वामी घनानंद जो चुनावी प्रचार प्रसार कर रहे थे, वो तो मात्र एक तमाशा था।
हालांकि बंबई शहर में स्वामी घनानंद मशहूर हो चुके थे। उनके प्रवचन सुनने भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। वो बड़े ही गुण ज्ञान की बातें बताते थे। लेकिन पार्टी के बारे ज्यादा कुछ न कह पाते। खुल कर लोगों को न बताते कि उनका उद्देश्य पार्टी को चुनाव जिताना था।
जबकि बबलू ने कमाल कर दिखाए थे। पल्लवी ने घर-घर जा कर महिलाओं को जो तीन हजार की रकम प्रति माह का लालच दिया था उसने तो छप्पर फाड़ कर रख दिया था। और विलोचन शास्त्री ने अभी से टिकिट बांटना आरंभ कर दिया था।
“वक्त रहते अपना काम संभालो।” उनका पार्टी कार्य करताओं से कहना था। “अपने वोटरों से संपर्क साधो। उनसे मिला जुलो और उनके हित साधन की भी बात करो। बताओ उन्हें कि हमारी पार्टी की विशेषता क्या है? कहो कि हमारे नेता विलोचन शास्त्री हैं। वो एक ईमानदार व्यक्ति हैं।” विलोचन शास्त्री ने अपनी टीम को तैयार कर फील्ड में समय रहते उतार दिया था।
बबलू को पता था कि माधव मोची का तरकस तीरों से खाली था। स्वामी घनानंद के प्रवचन कोई क्रांति न ला कर देंगे। पब्लिक जानती थी कि एक साधु को क्या लेना देना था सत्ता से? उसे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ न था। वह तो मग्गू के कहने पर भाषण देता था और चला जाता था। पब्लिक के साथ उसका कोई मेल मिलाप न था।
“क्या कर रहे हो महाराज?” माधव मोची का मन उदास था। “ये राम कथा कहने से हम चुनाव नहीं जीत सकते।” उसने स्वामी घनानंद को पास बिठा कर समझाया था। “हमें तो पब्लिक से वोट लेने हैं स्वामी जी।” माधव मोची मुद्दे पर आया था। “लोगों को पार्टी के बारे बताना है। बताना है कि हमारी पार्टी उनके लिए क्या-क्या करेगी?” माधव मोची ने स्वामी घनानंद की आंखों में देखा था।
“क्या-क्या करेगी?” स्वामी घनानंद ने प्रति प्रश्न किया था। उन्हें क्या पता था कि पार्टी चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या करती थी।
माधव मोची चुप था। वो क्या बताता कि स्वामी घनानंद ने पब्लिक को क्या बताना था। उसे तो स्वयं भी कुछ याद न आ रहा था। जो पिछली बार हुआ था वह तो एक तुक्का था। लोग विलोचन शास्त्री से नाराज थे। सो उन्होंने माधव मोची को वोट दे दिया था। उनका मानना था कि माधव मोची से वो जो चाहेंगे कान पकड़ कर करवा ही लेंगे। लेकिन …
माधव मोची ने जो भी किया था – अपने लिए किया था। 5
उसने अपने लोगों से मिलना जुलना तक बंद कर दिया था। वह जानता था कि उसका तुक्का एक बार ही लगना था। भूत विद्या मल्लई बारह बरस चल्लई – उसे याद था। पांच साल के बाद उसे कोई नहीं पूछेगा – वह जानता था। अत: उसने दोनों हाथों माल लूटा अपने लिए। लेकिन अब …?
“लोगों के पास जाओगे तो जूते मारेंगे।” माधव मोची का अंतर बोला था। “किसी को बुलाओगे भी तो क्या कह कर?” माधव मोची के पसीने छूट रहे थे।
स्वामी घनानंद चित्रवत बैठे-बैठे माधव मोची का खाली-खाली चेहरा पढ़ रहे थे। गहरी व्यथा में डूबा था माधव मोची।
“इसी से कुछ करने को कहो।” माधव मोची ने नजरें घुमा कर स्वामी घनानंद को घूरा था।
स्वामी घनानंद असंपृक्त भाव से चुपचाप बैठे थे। उन्हें किसी चुनाव की जीत हार से कुछ लेना देना न था।
मग्गू मोची का मन आया था कि लात मार कर भगा दे इस मोढ़ा घनानंद को। नाट जाए चुनाव लड़ने से। क्या धरा था बेकार की झंझट में? हर पांच साल के बाद चुनाव आने थे – कब तक लड़ता वह? क्यों लड़ता? उसकी कौन सी खर में तेल जा रहा था? खूब तो कमा लिया था? अब भाड़ में जाए राजनीति।
“कल्लू जी को बुलाइए ना?” स्वामी घनानंद ने चुप्पी तोड़ी थी।
अचानक ही अंधकार में डूबा माधव मोची उजालों की दुनिया में चला आया था।
वो कल्लू को भूल कैसे गया – समझ न पा रहा था माधव मोची।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड