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खानदान 54

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चाहे कुछ भी हो!.. सुनीता की अलमारी में से मुकेशजी की मेहनत की कमाई के सोने के चोरी होने का सबको बेहद बुरा लगा था। अब घर में एक ही दामाद हो.. और वो भी इस तरह की हरकत कर बैठे तो बुरा तो लगता ही है। पर सुनीता को सही तरीके से समझाना भी ज़रूरी हो गया था। हर माँ-बाप यही चाहते हैँ.. कि चाहे कुछ भी हो.. बेटी का घर बस जाए। सुनीता के मायके में सोने की चोरी सबको बहुत बुरी लगी थी। “ माँ जी!.. सुनीता दीदी इतनी अच्छी, मेहनती और संस्कारी हैं.. फ़िर भी उनके साथ उनकी ससुराल में ऐसा कैसे हो गया!!”। अनु ने अनिताजी से सवाल किया था।

“ ये उसके कर्म हैं!’।

अनिताजी का सुनीता के लिये जवाब था.. जो सोलह आने सही था.. हर इन्सान को अपने कर्मगत भुगतने ही पड़ते हैं। हम कितने अच्छे हैं.. यह बात हमसे बेहतर परमात्मा ही जानते हैं।

मन में अपनी अंगूठियों के चोरी हो जाने का दुख लिये.. अब सुनीता अपने आप को सहज कर रही थी। अब रहना तो उसी घर में था.. आख़िर घर जो बसाना था.. चाहे कुछ भी हो। और घर बसाने वाली बात काफ़ी हद तक ठीक भी थी..  इस बात को दूसरे ढँग से सोचा जाय तो.. क्या घरों में चोर घुसकर चोरी नहीं करते.. या फ़िर सामन गुम नहीं हो जाता। यही होना था.. उस सोने पर सुनीता की मोहर थी ही नहीं.. यदि सुनीता का उसमें कुछ होता.. तो कहीं नहीं जाता।

खैर! हार थक कर एक बार फ़िर अपने दोनों बच्चों में मस्त हो गई थी.. सुनीता। पर सुनीता के चेहरे पर दुख झलकता था.. अपना ही पति!.. अपना ही पति जिस पर एक औरत सारी दुनिया को एक तरफ़ रख कर विश्वास रखती है.. वही गुरु निकला!!.. बुरा लगने वाली बात ही थी।

“ हमारी ज़मीन बिकेगी तो हम तेरे सोने के पैसे वापिस कर देंगें”। दर्शनाजी ने सुनीता से कहा था।

सब कुछ एक तरफ़ कर सुनीता अपने दोनों बच्चों में मस्त हो गई थी.. बच्चे बड़े हो रहे थे.. और नेहा भी अब छोटे स्कूल जाने लगी थी। दर्शनाजी अपने माँ-बाप की तीन बहनें थीं.. जो कुछ भी माँ-बाप का था.. वो गाँव में अब इन्हीं तीन बहनों का था.. दर्शनाजी और उनकी तीन बहनों के बीच उनके बापू की ज़मीन के बटवारे की ख़बर आई थी। दर्शनाजी के बहन के लड़के अपनी मौसी यानी के दर्शनाजी के पिता की ज़मीन में हिस्सा हड़पना चाह रहे थे। यह ख़बर गाँव से दर्शनाजी के पास आ गई थी। यह बात न तो उन्होंने रामलालजी को ही बताई और न ही विनीत के कानों में डाली थी। केवल रमेश को ही यह बात दर्शनाजी ने ऊपर चुप-चाप कमरे में आकर बताई थी। अब तो यह जानकर की दर्शनाजी के ख़ुद के रिश्तेदार ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाह रहें हैं.. माँ-बेटों में ज़ोर-ज़ोर से बातें होने लगीं थीं.. और आवाज़ें नीचे रामलालजी तक पहुँच गयीं थीं।

“ के भाँ-भाँ हो री थी!…जब तूं ऊपर पड़ी थी”।

रामलालजी दर्शनाजी से माँ और बेटा दोनों के बीच ज़ोर-ज़ोर से हो रहे ज़मीन को लेकर वार्तालाप के बारे में पूछ रहे थे।

“ कुछ ना”।

दर्शनाजी रामलालजी को अपने मायके की ज़मीन के बारे में कुछ भी बताना नहीं चाह रहीं थीं.. और उन्होंने बात टाल दी थी।

इधर गाँव में रमेश ने शिवजी नाम के पटवारी से ज़मीन का बयाना लेकर ज़मीन का सौदा कर दिया था। अब तहसीलदार के सामने जाकर ज़मीन के पूरे पैसे लेने वाली बात रह गई थी।

ज़मीन के बयाने के पैसे रमेश के बैंक में आ गए हैं.. यह बात सुनीता को रमेश ने बता दी थी। लेकिन सुनीता दर्शनाजी का स्वभाव और फ़ितरत देखते हुए.. यही अंदाज़ा लगाए बैठी थी.. कि,” अम्मा जी इनके हाथ ज़मीन के पैसे थोड़े ही आने देंगी”।

खैर! माँ-बेटों का हरयाणे जाने का कार्यक्रम बन गया था.. सिर्फ़ दर्शनाजी और रमेश जाने वाले थे.. सुनीता बच्चों संग इंदौर में ही थी।

ज़मीन वाली बात सुनीता ने यूँहीं अपने पिताजी को बता दी थी। बाप-बेटी में इस विषय पर फ़ोन पर थोड़ी बातचीत भी हुई थी.. अक़्सर लड़कियाँ मायके में ससुराल की बात किया ही करतीं हैं.. कोई नई बात न थी।

“ दर्शनाजी को देखते हुए.. लगता नहीं है.. कि वो रमेश को कुछ भी देंगीं.. पैसे पर मर-मिटने वाली औरत है”।

मुकेशजी ने कहा था।

कुछ दिन बाद ही नन्हे प्रहलाद के पास गाँव से फोन आ गया था.. नेहा और प्रहलाद खुशी से नाच रहे थे। “ मम्मी!.. मम्मी!.. पापा के बैंक में दस लाख रुपये आ गए!”।

नेहा और प्रहलाद ने सुनीता को यह ख़बर दी थी। सुनीता यह बात सुनकर हैरान हो गई थी.. क्योंकि उसे सासु-माँ से यह उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी।

“ निकाल!.. मेरे बाप के पैसे!”।