खानदान 76

खानदान 76

माँ का इशारा पा रमेश फ़िर उसी दो-कौड़ी के रूप में आ गया था। सुनीता अपनी अक्ल पर पछतावा करते हुए.. फ़िर सोच में डूब गई थी।” आप ने फ़िर बेवकूफ़ी करके उस आदमी को क्यों बचाया! हो गए न फ़िर से ड्रामे शुरू! अरे! दिल्ली भी बता देते और फ़िर मज़ा चाखवाते इसे!’ प्रहलाद ने एक...
खानदान 76

खानदान 75

“ मुझे यहाँ से निकाल! नहीं तो अपनी गर्दन में कुछ घोंप डालूँगा!”। रमेश का पूरा शरीर काँप रहा था.. बेहद डरे हुए.. रमेश ने सुनीता से कहा था.. पर सुनीता ने रमेश की बात का कोई भी जवाब नहीं दिया था। पुलिस वाले अब रमेश के ऊपर करवाई करने के लिये एकदम सीधे खड़े हो गए थे.. रमेश...
डर

डर

डर के कारण तुमको खोया डर के कारण ख़ुद को खोया और भी बहुत कुछ खोया, मैने डर से इसी डर के कारण कहीं मुझसे अब, रिश्ते न खोयें तुम मेरी मदद कर मुझे इस डर से उभारो...
खानदान 76

खानदान 74

सुनीता पुलिस स्टेशन में पुलिस डिपार्टमेंट के लोगों के साथ अपना केस डिसकस करने में लगी हुई थी.. प्रहलाद भी अपनी माँ के साथ आना चाहता था.. पर सुनीता ने बेटे को थाने लाना अपने साथ ठीक न समझा था। वैसे हमारे समाज में महिलाओं का पुलिस स्टेशन में यूँ बैठना अच्छा नहीं समझा...
खानदान 73

खानदान 73

नाटक तो खैर! रामलाल विला में छोटे और बडे सारे साल चलते ही रहते थे। इस परिवार में सब कुछ एक तरफ़ छोड़कर बस एक ही बात अच्छी थी.. कि यहाँ पर सभी साल में आने वाले त्यौहार एक अपने अलग ही अंदाज़ में मनाए जाते थे। अब ये तो न कहना चाहये कि त्यौहार आने से पहले नाच-गाने ही शुरू...