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खानदान 75

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“ मुझे यहाँ से निकाल! नहीं तो अपनी गर्दन में कुछ घोंप डालूँगा!”।

रमेश का पूरा शरीर काँप रहा था.. बेहद डरे हुए.. रमेश ने सुनीता से कहा था.. पर सुनीता ने रमेश की बात का कोई भी जवाब नहीं दिया था। पुलिस वाले अब रमेश के ऊपर करवाई करने के लिये एकदम सीधे खड़े हो गए थे.. रमेश पुलिस वालों को अपनी तरफ़ हाथ बढ़ाता देख.. T.I साहब के कमरे की तरफ़ भागा था.. सुनीता भी पीछे-पीछे  T.I साहब के कमरे के अंदर दाखिल हो चुकी थी। रमेश T.I साहब के कमरे के अंदर जाकर बिना ही इजाज़त के उनके सामने डरा हुआ, कुर्सी पर जा बैठा था। T.I साहब ने रमेश को देखकर पूछा था..

“ क्या कहानी है!’

रमेश ने अपनी बात उनके सामने रखी थी..

“ कुछ नहीं साहब! घर के झगड़े फ़ालतू में यहाँ ले आए हैं..  आप ही बताइए.. घर की बात बाहर आनी चाहिए क्या!”।

वक्त और परमात्मा की कुछ ऐसी करनी हुई. कि वो सुनीता तो T.I साहब के कमरे में कुछ बोली ही नहीं। रमेश ही अपने हिसाब से बात करता रहा। अब क्यों नहीं बोल रही थी.. ये सुनीता! कौन सा साँप सूंघ गया था.. सुनीता को..

दरअसल थाने का माहौल बहुत गर्म हो गया था.. माहौल को देखते हुए.. रमेश का बन्द होना और फ़िर जम कर पीटना निश्चित हो गया था.. सुनीता माहौल को देखकर सब-कुछ भाँप गई थी.. फ़िर एक-बार सुनीता के संस्कारों ने रमेश को पिटने से बचा लिया था.. रमेश की सारी बातों पर ध्यान देते हुए.. केवल रमेश की ही बातों पर..

“ वैसे घरेलू मामले थाने में नहीं लाए जाते.. घर टूट जाते हैं.. आप अपना मामला आपस में ही सुलझा लीजिये.. मैं आपके रिश्ते और घरेलू मामले को ध्यान में रखते हुए.. आपको वार्निंग पर छोड़ रहा हूँ, आइन्दा मेरे थाने में कंप्लेंट आई, तो आप के ख़िलाफ़ सख़्त कारवाई की जायेगी”।

T.I साहब ने रमेश को नरमी से समझा दिया था.. दोनों कमरे से बाहर निकल आये थे। जैसे ही सुनीता और रमेश कमरे से बाहर की तरफ़ निकले. ग़ुस्से में रमेश की तरफ़ बाजू चढ़ाते हुए, और दाँत मिसमिसाते हुए.. वही ग़ुस्से वाला पुलिस अधिकारी सामने खड़ा था.. “ अब आप बीच में बिल्कुल मत आना मैडम!”।

पुलिस अधिकारी ने सुनीता को बीच में आने से रोकते हुए.. रमेश की तरफ़ ग़ुस्से में आँखे लाल करते हुए बढ़ा था.. क्योंकि T.I साहब से परमिशन तो मिल ही गई थी.. सुनीता और रमेश ने आँव देखा था न तांव दोनों थाने से बाहर निकल आए थे।

संस्कारों वाली बात तो ठीक थी.. पर एक आदमी जो बदतमीज़ी पर बदतमीज़ी किये ही जा रहा है.. वहाँ संस्कार छोड़ कर थोड़ा व्यवाहरिक होना भी ज़रूरी था.. रमेशजी जो सिर पर चढ़ कर नाच रहे थे.. उसका कारण उनका इलाज न होना था.. सुनीता की कमज़ोरी ही सुनीता के साथ रमेश के इस तरह के वयवहार के लिये ज़िम्मेदार थी.. लात मार कर हिम्मत कर अकेली खड़ी हो जाती.. ये रमेश तो पच्चीस बार नाक रगड़ता और रस्सी की तरह सीधा हो जाता। पर वही.. हर बार डर कर उसी बिल में घुस जाना सुनीता की भी आदत बन गई थी.. जो अपनी मदद खुदी नहीं कर सकता .. उसकी मदद दुनिया की कोई भी ताकत नही कर सकती।

खैर! सुनीता और रमेश के घर आने के बाद मामले की आवाज़ में धीमापन ज़रूर आ गया था.. पर अभी किस्सा तो वही था.. रंजना। रंजना को रमेश ने घर आते ही पुलिस स्टेशन के ड्रामे का सारा जायज़ा देते हुए.. और अपनी उस दौरान असलियत छुपाते हुए.. ख़ुद को हीरो बना  दिया था। पुलिस स्टेशन से आते ही रमेश अपने धर्म गुरु यानी के अपनी माँ के कांटेक्ट में अभी आया नहीं था.. इसलिये स्वर धीमा था।

“ तू क्या सोचती है! ठुल्लों से डर गया मैं! घन्टा!! डरें मेरे दुश्मन! अरे! वो तो मुझे इन दोनों बच्चों की चिन्ता थी.. हमारे घर की बेइज़्ज़ती होती.. नहीं तो अच्छी तरह बताता!”।

रमेश ने अगले दिन ही माताजी की आँख का इशारा पा सुनीता को प्रवचन सुना डाले थे।

“ मैने D.S.P से पहचान कर ली है!! अब जाना तू थाने!!”।

देखा! देख, लिया संस्कारों का नतीजा! बजाय अपनी गलती मानने के.. और माफ़ी माँगने की बजाय.. यह तो उल्टा ही पड़ गया। कौन सी आजमाइश कर रही थी.. सुनीता इस इंसान के साथ.. अपनी काबलियत को भूल कर, इसी को हीरो बनाने में लगी हुई थी.. ऐसा कौन सा डर था.. जिसके रहते अपनी ख़ुद की काबलियत और पहचान खो चुकी थी.. सुनीता। इतनी बडी धमकी के बावजूद भी उसी आत्मविश्वास के साथ खड़े हो गए थे.. रमेश बाबू! अब कौन सा नया गुल खिलाएगी.. ये रमेश और रंजना की जोड़ी जानने के लिये पढ़ते रहिये.. खानदान।