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खानदान 73

holi

नाटक तो खैर! रामलाल विला में छोटे और बडे सारे साल चलते ही रहते थे। इस परिवार में सब कुछ एक तरफ़ छोड़कर बस एक ही बात अच्छी थी.. कि यहाँ पर सभी साल में आने वाले त्यौहार एक अपने अलग ही अंदाज़ में मनाए जाते थे। अब ये तो न कहना चाहये कि त्यौहार आने से पहले नाच-गाने ही शुरू हो जाया करते थे.. अब रामलालजी के परिवार का त्यौहार मनाने का अंदाज़ निराला ही था.. कोई भी त्यौहार आने से पहले ही घर में जम कर झगड़ा हो जाया करता था, और होता भी क्यों नहीं.. हर तरह के कलाकारों का जमघट जो था.. रामलालजी का परिवार.. और उससे भी ऊपर एक बात और थी.. वो ये कि.. दर्शनाजी ने परिवार को शिक्षा और संस्कार ही इतने अच्छे दे रखे थे.. कि त्यौहार आने से दो-चार दिन पहले ही सब एक-दूसरे से बजाय गले मिलने के एक बार आपस में जम कर झगड़ा ज़रूर कर लिया करते थे.. आख़िर! करोड़पति परिवार जो था.. त्यौहार आने से पहले घर की नज़र उतरनी ज़रूरी हो जाया करती थी।

ऐसे ही रामलाल विला में होली का त्यौहार महत्व रखता था। होली आने से हफ़्ता भर पहले ही दर्शनाजी भूखी भेड़नी की तरह से सारे घर में घूमती रहतीं थीं.. कि कौन उनके हत्थे चढ़े.. और वो उसका त्यौहार अपनी बक़वास से एडवांस में ही मना डालें। यह बात घर के लोगों को भली-भाँति पता होती थी, और सभी अपने ढँग से बच कर निकला करते थे। ज़्यादातर नम्बर तो रामलालजी का ही लग जाया करता था.. और बेचारे त्यौहार से पहले धर्मपत्नीजी के प्रवचनों के कारण भूल ही जाया करते थे.. कि वो किसी फैक्ट्री के मालिक भी हैं। अपना पूरा हँगामा त्यौहार से पहले निकालने के बाद दर्शनादेवी का चंडी रूप शाँत हो जाया करता था.. और फ़िर एकदम आराम से हो जाया करतीं थीं।

होलिका दहन वाले दिन घर में बाहर से गाड़ी भर कर बडी-बडी लकड़ियाँ आ जातीं थीं.. और घर के बाहर वाले आँगन में शाम के वक्त सभी परिवार के सदस्य इकट्ठा होकर पूजा की तैयारी किया करते थे.. और निश्चित समय पर होलिका दहन हो जाया करता था।

खेलने वाली होली पर बच्चे सुबह ही दोस्तों संग होली खेलने निकल जाया करते थे.. दोनों भाई भी फैक्ट्री में और अपने-अपने मिलने वालों संग होली खेला करते थे.. ख़ास बात यह थी.. कि दोनों भाई और घर की दोनों बहुएँ आपस में न ही एक-दूसरे को रंग लगाया करतीं थीं.. और न ही त्यौहार की मुबारकबाद ही एक-दूसरे को दी जाती थी। बस! घर की डॉन और सारे नाटक की रचयिता दर्शनाजी ही खेलने वाली होली के दिन दोनो बहुओं को आजू-बाजू खड़ा कर उनकी मदद से पर अपनी पसंद से सारे घर के लिये पकवान बना कर रख दिया करतीं थीं।” खीर ये दोनों बना लेंगीं! तू रेन दे!”।

रामलालजी दर्शनाजी से कहते ही रह जाया करते थे.. कि वे परेशान न हों.. खीर बहुएँ बना लेंगीं। पर रामलालजी भी हद ही कर दिया करते थे.. अब सासू-माँ जब बहुओं के हाथ की बनी रोटी तक नहीं खातीं थीं.. तो भला खीर कैसे खातीं.. अब चिन्ता तो हो ही जाती है.. बहुओं के हाथ का खाकर अगर कुछ हो गया तो यह सम्पत्ति का और सांसारिक सुख कौन भोगता.. और देखा जाए तो ठीक ही सोच रहीं थीं.. दर्शनाजी.. मरें! उनके दुश्मन।

खीर-पूरी बढ़िया खाकर और अपने-अपने ढँग से गुलाल लगाकर एक अनोखे ही अंदाज़ में होली का यह पर्व रामलाल विला में सम्पन्न हो जाया करता था। बच्चे भी महँगी पिचकारियों और रंगों से होली के त्यौहार का आनन्द ले ही लिया करते थे। बस! इस परिवार में एक ही चीज़ अधूरी रह जाया करती थी.. वो थी.. रिश्तों में मिठास और अपनापन। संपत्ति के नाटक और “ अगर कुछ नहीं मिला तो!” इस डर ने रिश्तों की डोर को बेहद कमज़ोर कर दिया था.. घर की रखी हुई नींव को देखते हुए.. रामलालजी और दर्शनाजी के घोंसले के बिखरने में कोई भी सन्देह नहीं था।

“ मुझे यहाँ से निकाल!”

फ़िर आगे आने वाले समय में रामलालजी और दर्शनाजी के घोंसले के बिखरने के बाद.. जो कि होना निश्चित है.. कहाँ जायेंगे.. घोंसले में बैठे.. दो परिन्दे! अपने चूज़ों संग। अगर आप भी इन परिन्दों के भविष्य में दिलचस्पी रखने लगे हैं.. तो पढ़ते रहिये खानदान।

रामलालजी के पूरे परिवार की ओर से आप सभी मित्रों को होली के त्यौहार की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं!!