जीने की राह अट्ठाईस

जीने की राह अट्ठाईस

न जाने ऐसा क्या है कि मैं भूखी भूखी आंखों से गुलनार को खोजता ही रहता हूँ। न जाने कहां है? न जाने कैसी है? शायद .. लौट गई हो? उसका बेटा आया होगा और वह अपने बेटे के साथ .. “स्वामी जी!” एक श्रद्धालु भक्त ने मेरा सोच तोड़ा है। “संतान नहीं है, स्वामी...
जीने की राह सत्ताईस

जीने की राह सत्ताईस

“ओये, पव्वा!” बनवारी का नौकर निहाल था। वो किसी को पुकार रहा था – बुला रहा था। मैं उसे आंखें पसारे देख रहा था और समझने का प्रयत्न कर रहा था। “सुनता नहीं बे?” निहाल गुर्राया था। “तुझे सुनाई नहीं देता क्या?” उसने मुझसे पूछा था।...
जीने की राह सत्ताईस

जीने की राह छब्बीस

प्रेम नीड़ के मेरे विचार को बंशी बाबू ने चार चांद लगा दिए हैं। हर किसी को यह विचार पसंद आया है और सब ने माना है कि आज के युवा और युवतियां पुरातन की रूढ़ियों को तोड़ रहे हैं लेकिन समाज उन्हें विद्रोही बता रहा है। मॉं बाप को जो पसंद नहीं है – वो युवा पीढ़ी को पसंद...
जीने की राह पच्चीस

जीने की राह पच्चीस

स्वामी जी के संबोधन की शक्ति का चमत्कार मैंने खुली आंखों से देखा था। मैं तो आंखें बंद किये पीपल दास के तने से चिपका बैठा था। लेकिन अचानक ही मैं हवा के पंखों पर बैठ उड़ने लगा था। तारों के पास जा बैठा था तो उन्होंने मुझे लाढ़ लड़ाया था। खुले आकाश ने मुझे विचरने की तमाम...
जीने की राह चौबीस

जीने की राह चौबीस

“प्रणाम स्वामी जी!” फिर से मैंने बंशी बाबू की आवाज सुनी है। मैंने आंखें खोली हैं तो मुझे बंशी बाबू कहीं नहीं दिखे हैं। लेकिन हॉं! मुझे पीपल दास के तने से चिपक कर बैठा पीतू दिखाई दे गया है। बुरे हाल में है पीतू। उसका पूरा तन बदन थकान में चूर है। पानी में...
जीने की राह पच्चीस

जीने की राह तेईस

“प्रणाम स्वामी जी!” बंशी बाबू ने मेरा ध्यान तोड़ा है तो मैंने उन्हें नजर उठा कर देखा है। बंशी बाबू अपने उजले परिधान में सजे वजे, एक बेमामूल सा चश्मा पहने और नंगे पैरों चलते हमारे आश्रम के संत सनातनी माने जाते हैं। जितने उजले बंशी बाबू बाहर से हैं उतने ही...