जीने की राह चौंतीस

जीने की राह चौंतीस

“वो आश्रम से जाना नहीं चाहती स्वामी जी!” शंकर मुझे बताने लगा है। “कहती है – उसका कोई नहीं है। बे घर बार की है। परिवार तो था – पन उजड़ गया!” शंकर ने मुझे देखा है। शंकर को इंतजार है कि मैं कुछ कहूंगा। आज जैसा आघात तो मुझे कभी पहले...
जीने की राह चौंतीस

जीने की राह तैंतीस

दीपावली का परम पावन पर्व उल्लास के साथ साथ मुझमें उजाला भी भरता जा रहा है। भोज पुर आश्रम के स्वामी पूर्णानन्द जी महाराज का दिव्य स्वरूप मैं अचानक ही देखने लगा हूँ। मैं समझ रहा हूँ कि जाने अनजाने मुझ में उन्हीं का वो प्रतिरूप समाया है और मैंने भी उनके निरन्तर देते रहने...
जीने की राह बत्तीस

जीने की राह बत्तीस

“आप का शिष्य गोवर्धन दूसरा ब्याह रचा रहा है!” बंशी बाबू ने हंसते हुए सूचना दी है। मात्र सूचना ने ही मुझे आहत कर दिया है। मैं हूँ – अब हाथी पर बैठा कानी को ब्याहने जाते अपने पिताजी के साथ उछल कूद कर रहा हूँ। बेहद प्रसन्न हूँ मैं कि मेरी नई मॉं घर आएगी...
जीने की राह इकतीस

जीने की राह इकतीस

“क्या आप फेथ हीलर हैं?” मैं भक्तों को आशीर्वाद देकर लौटा हूँ तो मेरी मुलाकात एक विदेशी महिला से हो गई है। वह मेरे एकमात्र मूढ़े पर बैठी है। मैं उसके सामने हाथ जोड़े विनम्रता पूर्वक खड़ा हूँ। मैंने उसके चेहरे को देखा है तो मुझे वहां अहंकार बैठा दिखाई दे गया...
जीने की राह चौंतीस

जीने की राह तीस

बिच्छू की तरह डंक मारते मन को मैंने बड़ी सावधानी से पकड़ा है। गुलनार को देखते ही बमक गया था – मेरा मन। अचानक ही मैं माया मोह के महासागर में गोते खाने लगा था। विगत ने हाथ के इशारे से मुझे पास बुला लिया था और बिठा लिया था। फिर गुलनार भी मेरे पास आ बैठी थी। बेटे का...
जीने की राह चौंतीस

जीने की राह उनतीस

“राधा रमण हरि गोविंद जय जय!” कीर्तन अपने चरम पर है। ढोलक पर खूब थाप पड़ रही है। भक्त झूम रहे हैं। सब तल्लीन हो हो कर गा रहे हैं। “गोविंद जय जय बोलो गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय!” मैं भी मन प्राण से आज तल्लीन होकर सुर दे रहा हूँ और सर...