“क्या आप फेथ हीलर हैं?” मैं भक्तों को आशीर्वाद देकर लौटा हूँ तो मेरी मुलाकात एक विदेशी महिला से हो गई है। वह मेरे एकमात्र मूढ़े पर बैठी है। मैं उसके सामने हाथ जोड़े विनम्रता पूर्वक खड़ा हूँ। मैंने उसके चेहरे को देखा है तो मुझे वहां अहंकार बैठा दिखाई दे गया है। यही अहंकार मैंने गुलनार के चेहरे पर भी बैठा देखा था – जब मैं पीतू था। तब मैं इस अहंकार का अर्थ न लगा पाया था। लेकिन आज तो गुलनार ही उसका उत्तर स्वरूप थी। और ये .. रमणी जिसे अपने रूप स्वरूप से लेकर अपने श्रेष्ठ अभिजात्य का अभिमान था – और मेरी तुच्छता पर उसे शायद तरस आया था – अब मुझे प्रश्न पूछ रही थी।

“हूँ तो!” मैंने संक्षेप में उत्तर दिया है।

“आप का गुरु कौन है?” उसका दूसरा प्रश्न है।

“पीपल दास!” मैंने उसे इशारे से खड़े पीपल के पेड़ को दिखाया है।

“जोकिंग ..?” उसका तुरंत प्रश्न आया है।

“नहीं!” मैंने बड़ी सौम्यता से उत्तर दिया है। “ये वृक्ष ब्राह्मण वृक्ष माना जाता है। ये वृक्ष ..”

“बोलता है?” उसने फिर पूछा है।

“हॉं हॉं सभी वृक्ष बोलते हैं!” मैं हंसा हूँ। “अपनी भाषा में ये भी संवाद बोलते हैं!” मैंने उसे बताया है।

अब वो चुप है। मुझे उसने ऊपर से नीचे तक कई बार देखा है। उसकी समझ से जैसे सब बाहर है और वाहियात है! अब वह कोई निर्णय ले लेना चाहती है। लेकिन फिर वह मुझे कुछ पूछने का प्रयत्न करती है।

“मुझे क्या बीमारी है?” उसने सीधा प्रश्न दागा है।

“अहंकार!” मैंने भी मुसकुराकर उत्तर थमा दिया है।

“यही कि तुम सर्वश्रेष्ठ हो, तुम महा ज्ञानी हो, तुम से सब निम्न हैं और .. तुम ..”

“कैसे कह सकते हो?” उसने तड़क कर पूछा है।

“इसलिए कि तुम मूढ़े पर बैठी हो और मैं विनम्र भाव से हाथ जोड़े तुम्हारे सामने खड़ा हूँ।” मैंने अंत में उसे उसकी असलियत समझा दी है।

वह उछल कर खड़ी हो गई है। तनिक शर्मा गई है। उसे कुछ कुछ अहसास हुआ है कि मैं यूं ही एक बेमामूल गैरिक अल्फी में लिपटा कोई धूर्त साधू नहीं हूँ। अब वह दूसरे सटीक प्रश्न खोज रही है। वह मुझे किसी भी तरह हरा देना चाहती है।

“मेरी बीमारी की दवा आप देंगे?” उसने पूछा है।

“मैं दवा नहीं दुआ देता हूँ।” मैंने बताया है। “और तुम्हारी बीमारी दुआ से ठीक नहीं होगी।”

“फिर किससे ठीक होगी?”

“भक्ति और वैराग्य से!” मैंने उसे बताया है। “लेकिन ये तुम्हारे लिए अपनाना कठिन है।” मैं हंसा हूँ।

“क्यों?” उसने तुरंत पूछा है।

“इसलिए कि भक्ति और वैराग्य अपनाने के लिए तुम्हें जीने की राह ही बदलनी होगी – जो बहुत आसान नहीं है।”

और फिर मैंने देखा है कि उसके अहंकार ने उसकी बांह गही है ओर उसे उसी जीने की राह पर ले चला है जो सीधी संसार में जाती है।

मेरी हंसी छूट जाती है।

मेजर कृपाल वर्मा

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