जीने की राह चालीस

जीने की राह चालीस

“समझ ही नहीं आ रहा कि मुझसे गलती कहां हुई?” श्री राम शास्त्री का स्वर कातर था। वह अपांग एक अफसोस में डूबे थे। जीवन के आखिरी छोर पर पहुंच कर उलझ गये थे। अब उन्हें कोई रास्ता ही न सूझ रहा था जिस पर वो चल कर शेष जीवन बिता लें। “एक तपस्या की तरह जिया...
जीने की राह उनतालीस

जीने की राह उनतालीस

दौड़ते दौड़ते, भागते भागते और एक के बाद दूसरी सफलता के सोपान चढ़ते चढ़ते मैं अचानक ही औंधे मुंह आ गिरा था। सफलता की सीढ़ी कुल चार कदम पर थी लेकिन अब उसे छूना तक दुश्वार हो गया था। “तेरा काल तेरे सर पर आ बैठा है पीतू!” मुझे अपने भीतर से आवाज आई थी।...
जीने की राह अड़तीस

जीने की राह अड़तीस

बधाइयां बज रही थीं! हमारा पूरा घरबार उल्लास में नाक तक डूबा था। सजीवजी गुलनार का हुस्न और हुलिया देखने लायक था। मैं बैठा बैठा उसे ही आते जाते निहार रहा था। यूं तो सजा वजा घर द्वार बड़ा ही मोहक लग रहा था लेकिन मेरी मंजिल तो मेरी गुलनार ही थी! मैं तो मानता था कि ये सब...
जीने की राह अड़तीस

जीने की राह सैंतीस

मैं भाग रहा हूँ! मैं सर पर पैर रख कर भाग रहा हूँ! मैं गुलनार से डर कर भाग रहा हूँ। मैं मान रहा हूँ कि गुलनार अब मुझे मोहित कर लेगी, रिझा लेगी, मना लेगी और .. और अपनी आंखों में आंसू भर कर मुझे मना लेगी और हर तरह से मुझे .. लेकिन मैं हूँ कि भाग छूटा हूँ। मैं अब गुलनार...
जीने की राह चालीस

जीने की राह छत्तीस

अब मेरे मन ने मेरे तीन संकल्पों को सहजता से स्वीकार कर लिया है। भक्ति में रम जाता है और खूब डूब डूब कर आनंद लेता है। ब्रह्मचर्य का भी पूर्ण रूपेण पालन करता है। भटकना छोड़ दिया है और ब्रह्मचर्य के महत्व को समझ लिया है। जहां तक विपुल वैराग्य का प्रश्न है तो अब इसे कुछ...
जीने की राह उनतालीस

जीने की राह पैंतीस

रोते बिसूरते पीतू को मैं दिलासा दे रहा हूँ। “कौन नहीं उजड़ता, कौन नहीं मिटता, कौन नहीं मरता और हर हर मिटने, मरने और उजड़ने का कोई न कोई बहाना तो होता ही है पीतू! तुम क्या सोच रहे हो कि तुम अब अमर हो गये हो? चुटकी बजाते ही किसी दिन .. यूं ही बैठे बिठाए ..”...