“प्रणाम स्वामी जी!” बंशी बाबू ने मेरा ध्यान तोड़ा है तो मैंने उन्हें नजर उठा कर देखा है।
बंशी बाबू अपने उजले परिधान में सजे वजे, एक बेमामूल सा चश्मा पहने और नंगे पैरों चलते हमारे आश्रम के संत सनातनी माने जाते हैं। जितने उजले बंशी बाबू बाहर से हैं उतने ही प्रज्वल और परिष्कृत भीतर से भी हैं। अमर पुर के सबसे बड़े जमींदार हैं। लेकिन रहते आश्रम में हैं। न उनका अब अपने गृहस्थ से कोई सरोकार है और न हीं अपनी जमींदारी से! वो अब आश्रम की ही एक सर्वश्रेष्ठ निधि हैं।
बंशी बाबू पढ़े लिखे हैं। कांख में कुछ कागज दबाए खड़े हैं तो अचानक मुझे याद हो बाता है कि मैंने शंकर से कुछ जानने के लिए कहा था।
“बैठिये न बंशी बाबू!” मैंने उनसे आग्रह किया है। लेकिन तभी समझा हूँ कि मेरे पास बैठने का वही एक मूढ़ा है जिसपर मैं बैठा हूँ। “आइये! वहां घास पर बैठते हैं।” मैंने तुरंत बात संभाल ली है।
एक अपराध बोध मेरे अंतर में उगा है और अब मुझे लानत मनालत भेज रहा है। बंशी बाबू को ..
“आश्रम का सारा हिसाब किताब रखता हूँ स्वामी जी!” बंशी बाबू बता रहे हैं। “मैं जानता हूँ कि धन माल, पैसा धेला ..” तनिक से हंस गये हैं बंशी बाबू।
“मेरा अर्थ ये नहीं था बंशी बाबू!” मेरा भी अंतर सावधान हुआ है। “मैं तो किसी और ही सोच में डूबा हुआ था।” मैंने अलग से प्रसंग छेड़ा है। “आप ने कभी आशीर्वाद लेने आये भक्तों को गौर से देखा है?”
“नहीं तो!” बंशी बाबू नाट गये हैं।
“मैंने देखा है!” मैं भी तनिक हंसा हूँ। “मैंने देखा है बंशी बाबू कि आज कल के भक्तों में युवाओं की संख्या ज्यादा है।” मैं बता रहा हूँ। “जानते हैं क्यों?”
“क्यों ..?” बंशी बाबू भी अब जानने के लिए उत्सुक हैं।
“इसलिए बंशी बाबू कि समाज में जलजले आ रहे हैं। युवा पीढ़ी को अब नए नए आयाम खोजने हैं और पुरानी पीढ़ी अब उनके साथ नहीं है।”
“यह तो है!” बंशी बाबू मान गये हैं।
“उनका मेल जोल, हेल मेल और प्रेम प्रीत पुराने कीर्तिमानों को छोड़ रहे हैं और वो अपने जीने की राह स्वयं खोजने लगे हैं।”
“सच है स्वामी जी!” बंशी बाबू ने स्वीकार में सर हिलाया है।
“तो उन्हें सहारा भी चाहिये?” मैंने पूछा है।
“सही है!” बंशी बाबू ने अब मेरी आंखों में देखा है।
“मैं चाहता हूँ बंशी बाबू कि हम – माने कि हमारा आश्रम इनका सहारा बने।”
“वो कैसे स्वामी जी?”
“मानते हैं कि आजकल हमारे युवक और युवतियां स्वयं शादी ब्याह कर लेते हैं और शादी कर लेने के बाद उन्हें कुछ सहारे दरकार होते हैं।”
“हॉं होते हैं! लेकिन स्वामी जी हमारा आश्रम तो उनके लिए है जो दीन गरीब हैं, रोगी हैं या असहाय ओर अपाहज हैं!”
“ये भी तो अपाहिजों में से ही हैं?” मैं हंस पड़ा हूँ।
“तो फिर?”
“मैं चाहता हूँ बंशी बाबू कि – मेरा मतलब आश्रम से है, एक प्रेम नीड़ बनाएं! वहां जहां चंद्र प्रभा मुड़ती है और घना आरम्भ होता है। जो भी नए युवक शादी करने के लिए सहारा चाहें आश्रम उन्हें सहारा दे दे?”
“उत्तम विचार है स्वामी जी!” बंशी बाबू प्रसन्न हैं।
“लेकिन धन ..?” मैंने अब आ कर उनसे प्रश्न किया है।
“धन की तो आप चिंता ही न करें!” बंशी बाबू का चेहरा खिल गया है। “मैं पैसे की टूट नहीं पड़ने दूंगा चाहे मुझे भिक्षा ही क्यों न मांगनी पड़े। ये तो सबसे बड़ा पुण्य का काम होगा स्वामी जी कि हम अपने युवाओं को उनकी जीने की नई राह पर अग्रसर होने में सहारा दें! ये तो सबसे बड़ा समाज सुधार होगा – स्वामी जी।”
आज बंशी बाबू ने दूसरी बार मेरी लाज रख ली है।
