“कायर! अकर्मण्य! छलिया! क्या पा लिया तुमने जग का छोर? आ गया अंत तुम्हारी पहाड़ जैसी महत्वाकांक्षा का? हार गए हो न तुम? सोफी का साया है जो मुझे जलील कर रहा है। रुके कदम, टूटी आशा, घोर निराशा…