मैं बहुत हताश और अधीर हुआ जा रहा हूँ। सबसे ज्यादा अफसोस मुझे मानव के विकृत संबंधों और उसकी टुच्ची महत्वाकांक्षाओं के बनावों पर हो रही है। लगता है अब समाज या तो असलियत खो रहा है और या वर्षों से धर्म…