“मुक्ति!” “सर!” “मैं देहली जाना चाहता हूँ!” मैंने भर्राए कंठ से ही मांग जैसी की है जिस पर मैं अपना अधिकार खो बैठा हूँ। “अब संभव नहीं सर!” मुक्ति ने संयत स्वर में कहा है।…