अस्त होता चंद्रमा मेरे पस्त इरादों को उभारता लगा है। गोधूलि की आभा जैसा प्रकाश भी तिमिर बन जाएगा, सब अंधकारमय हो जाएगा, नदी और किनारे सभी घिल्लमिल्ल हो कर आपस में मिल जाएंगे तो मेरा क्या होगा?…