खानदान 117

खानदान 117

” पन्द्रह बीस हज़ार रुपियाँ का खर्चा सै! गड्डी ठीक हो जागी!”। रमेश यह राग की पंद्रह से बीस हज़ार तक में पोलो गाड़ी ठीक हो जाइयेगी.. दर्शनाजी और विनीत के आगे गाता फ़िर रहा था। पर इस गाड़ी के राग को अलापने का कोई भी फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा था। विनीत इस बार...
मेरी यादें

मेरी यादें

वक्त का पहिया घूमता ही चला गया.. मैं बचपन से बडी हो गई.. और आज अपने जीवन से सीख लेते हुए.. एक मोड़ पर आ खड़ी हुई हूँ.. अकेली नहीं खड़ी हूँ.. मेरी परछाई यानी के अपने दो बच्चों के साथ हूँ। पीछे  मुड़कर देखना अच्छा लगता है.. अपने परिवार में राजसी ठाठ में बचपन बिताया...
बाँसुरी वादन कानू के साथ

बाँसुरी वादन कानू के साथ

“सारा दिन घर में बैठकर इधर-उधर की बातें करते रहते हो! कुछ अच्छा सीखो! हमारा मतलब है.. छुट्टीयां बर्बाद मत करो! कोई मन-पसन्द कोर्स कर लो!”। ” हम्म! क्या सीखें माँ! बात तो आपकी सही है!”। ” हाँ! आईडिया..!! क्यों न हम गिटार बजाना सीखें! नहीं!...
खानदान 117

खानदान 116

रमेश अब रंजना के परिवार में भी चर्चा का विषय बन गया था। रंजना की माँ-बहनों को भी अब रमेश पर शक से होने लगा था। ” कहाँ गये वो हज़ार रुपये! दे दिये होंगें उस मुस्टंडे को!”। रंजना की बडी बहन रंजना से अपने दिये हुए, हज़ार रुपये के नोट पर बोली थी। और बोलती भी...
मुझे तुम याद आए

मुझे तुम याद आए

इस बार की छुट्टीयों में मायके में मन तो खूब लगा.. पर मन का मायका कहीं और ही जा बसा था। वो लम्बी सी सड़क पर चलते हुए.. आपसे मिलने जाना आज भी मेरी यादों में बस गया है। फ़िर बहुत इंतेज़ार के बाद आपका आना भूल नहीं पा रही हूँ मैं! अकेले बैठकर आज घर नहीं.. मुझे आपका स्थान...
खानदान 117

खानदान 115

” इस बार ज़मीन का काम नहीं हो पाया है! रंजना मैं तुमसे आकर मिलूँगा! दोबारा जाकर कोशिश करनी पड़ेगी!”। रमेश का रंजना को किया हुआ मैसेज सुनीता ने पढ़ लिया था। पर रमेश से कहा कुछ भी नहीं था। रमेश सर्दियों में बिना ही ज़मीन का सौदा किए हरियाणा से इंदौर लौट कर आ...