” इस बार ज़मीन का काम नहीं हो पाया है! रंजना मैं तुमसे आकर मिलूँगा! दोबारा जाकर कोशिश करनी पड़ेगी!”।
रमेश का रंजना को किया हुआ मैसेज सुनीता ने पढ़ लिया था। पर रमेश से कहा कुछ भी नहीं था।
रमेश सर्दियों में बिना ही ज़मीन का सौदा किए हरियाणा से इंदौर लौट कर आ गया था।
समय नए साल का था.. और रमेश रंजना से मिलने सज-धज कर जाने को तैयार खड़ा था। सुनीता रमेश को जाता देख.. एकबार फ़िर से सोच में डूब गई थी।
पर आज एक बात देखकर तो सुनीता हैरान ही रह गई थी, कि रमेश रंजना से मिलकर जल्दी ही लौट आया था। आता भी क्यों नहीं.. चालीस-लाख का फ्लैट और छब्बीस-लाख की गाड़ी का सपना तो जैसे ख़त्म होता नज़र आ रहा था.. आशिक ख़ाली हाथ ही महबूबा के दरवाज़े पर दस्तक देने पहुँच गया था। रंजना मिज़ाज़ की पहले से ही तेज़ लडक़ी थी.. छोटी- छोटी बातों पर रमेश से झगड़ा कर बैठती थी.. और इस बार तो नाराज़गी बनती ही थी.. बड़ी-बड़ी बातें करके खाली हाथ जो रमेश लौट कर आ गया था।
रंजना को अब रमेश की काबलियत पर थोड़ा-थोड़ा शक सा होने लग गया था.. रंजना सोचने पर मजबूर हो गई थी, कि वाकई में यह रमेश फैक्ट्री का आधा मालिक है.. या फ़िर मामला कुछ और ही है।
अब रंजना संग भी रमेश के छोटे-मोटे झगड़े होने लगे थे। रमेश रंजना के माँ बहनों में अब चर्चा का विषय बना हुआ था। तीनों माँ बेटियों को थी, तो बहुत उम्मीद रमेश से.. पर रमेश के अपने परिवार के ख़िलाफ़ रोज़-रोज़ का रोना ने रमेश की हवा में उड़ाई हुई बातों को शक में बदल दिया था.. और तो और ज़मीन बेच कर बैग भर नोट लाने में भी रमेश असमर्थ हो गया था। विनीत भी रमेश बाबू की मनचाही मुराद पैसों से पूरी नहीं कर पा रहे थे.. इन्हीं सब बातों के चलते रमेश रंजना से भी पैसों की माँग करने लगा था।
” उस मुस्टंडे को दे दिये होंगें! ऐसे बनठन कर आते हैं.. जैसे सोलह साल के हों!”।
वाह! सोलह साल का नया लड़का! कौन है.. ये! आइये मिलते हैं.. इस सोलह साल के हीरो से खानदान में।