खानदान 124

खानदान 124

” अब तो सब-कुछ बेच-वेच कर दुबई जाने का इरादा है। लडक़ी पीछे पड़ रही है.. मेरे साथ दुबई चलो!”। यह ख़बर अब पूरे घर में आग की तरह फैल गई थी। सुनीता ने दुबई जाने का जैसे गाना ही बना डाला था। अब तो हर घर के हर आदमी ने रमेश और दुबई का जैसे जुमला ही बना डाला था।...
रेल

रेल

माँ..!! कहाँ हो तुम मेरी आवाज़ सुन आजाओ न! कितनी तेज़ी से आवाज़ हुई कि तुम्हारी रेल निकल गई कौन सी रेल में बैठ निकल गईं तुम मैं देखती ही रह गई इतनी तेज़ी से क्यों चढ़ गईं थीं माँ तुम छोड़ कर सबको दौड़ी चली आई थी मैं पर तुम्हारी रेल निकल गई अब हर रेल के आते-जाते...
रेल

विदा

बहुत ख़ुश कर गईं हो माँ अब तुम मुझको ढ़ेर लिबास दे विदा मेरी भर गईं हो तुम तो रोज़ नया तुम्हारा आशीर्वाद पहन अब घूमूँ फिरूँ मैं मन ख़ुश हो गया ऐसी विदा भर गई हो तुम तो पर तुम यह सब पहनतीं तो मन ज़्यादा हँसता तुम्हें रोज़ सजा-धजा देख सच! मन खिल उठता आजाओ माँ! भूल से...
खानदान 124

खानदान 123

एक बहन का तो घर बस गया था, दूसरी बहन इंतेज़ार में बैठ-बैठ कर थक गई थी। बेचारी रंजना ने सीधे-सीधे भी रमेश से हिस्से का पूछ लिया था… पर कोई जवाब ही नहीं मिल पा रहा था। शादी-शुदा बहन के ठाठ-बाट देख.. रंजना की परेशानी बढ़ती जा रही थी। ” आपको पता है! ये रिश्ता मेरे...
खानदान 124

खानदान 122

रंजना और रमेश का रिश्ता अब खटास लिए आगे बढ़ रहा था। रंजना की बड़ी बहन का रिश्ता तय हो चुका था..  लड़का देखने सुनने में अच्छा और पढ़ा-लिखा था। दुबई में अच्छी नौकरी थी.. लड़के की! अच्छा-ख़ासा पैसा कमा लेता था। रंजना ने यह ख़बर रमेश को देने में बिल्कुल भी देर नहीं...
खानदान 124

खानदान 121

” ये और वो तो बराबर के हैं.. फैसला ये करेगी!”। रमा ने सुनीता के सवाल का जवाब दिया था.. कि रमेश और विनीत तो बराबर के हैं.. इस तरह की अगर कोई बात होती है! तो उसकी जवाबदार दर्शनाजी होंगी! अब सुनीता के दिमाग़ में इसी बात को लेकर तरह-तरह के ख़याल आने लगे थे.....