” ये और वो तो बराबर के हैं.. फैसला ये करेगी!”।
रमा ने सुनीता के सवाल का जवाब दिया था.. कि रमेश और विनीत तो बराबर के हैं.. इस तरह की अगर कोई बात होती है! तो उसकी जवाबदार दर्शनाजी होंगी!
अब सुनीता के दिमाग़ में इसी बात को लेकर तरह-तरह के ख़याल आने लगे थे.. रमेश और रंजना के बच्चे को लेकर ख्याली पुलाव कुछ इस तरह का था..
” अगर ऐसा होता है! तो रमेश का अलग घर बस जाएगा ! रमेश उस बच्चे को लेकर अलग रहने लग जाएंगें! इस घर में पैसों की कोई कमी तो है नहीं! फ़िर तो वो बच्चा भी आराम से पल जाएगा!”।
वगरैह-वगरैह ख़याल मन को सताते रहे।
सुनीता का मन कुछ भी कर रंजना की तरफ़ से शांत नहीं हो पा रहा था। इधर रमेश कोना-कोना समेट और बेचकर रंजना की ख्वाहिशें पूरी किए जा रहा था.. ख्वाहिशें पूरी होने से और रोज़ का गाड़ी में बैठकर पिकनिक मनाने से होता भी क्या! रंजना के दिमाग़ में रमेश का आगे की तरफ़ से टूटी हुई गाड़ी को लाना और हिस्सा तेज़ी से घूम रहा था।
” आपसे एक गाड़ी ठीक नहीं हो पा रही!”।
यही एक बात अब रंजना हरबार रमेश से हर बार करने लगी थी.. जिसके जवाब में रमेश के पास अपना पारिवारिक नाटकों का दुखड़ा रोने के अलावा अब कुछ भी न बचा था।
रंजना रमेश के रोज़ के एक ही तरह के नाटक से परेशान हो चुकी थी.. कुछ घर में इसका था.. भी के नहीं! जवाब माँग रही थी..
अब रंजना और रमेश के रिश्ते में नोक-झोंक ने जगह ले ली थी। पहले घर में नाटक फ़िर रंजना के पास नाटक।
दोनों बार रमेश को हरियाणे की ज़मीन से कुछ मिला भी नहीं था.. ख़ाली हाथ लौट कर आ गया था.. इस हरियाणे से बैरंग लौटने पर भी रंजना की रमेश के लिये मोहब्बत का रंग फीका पड़ गया था।
” ये नए लड़के से फेसबुक पर चैटिंग! हम्म! हैरान था.. रमेश!”।
नया लड़का और नई लड़की.. कहानी ख़ूब मसालेदार हो चुकी थी.. मसालों का जायका चखते हुए.. जुड़े रहें.. खानदान के साथ।