पिता

पिता

हमें अपनी जरूरतों की कुर्बानियों पर पाला है , हमारी शख्सियत में अपने संस्कारों को डाला है , हमारी हर ख्वाहिशों को यूँ चुटकियों में पूरा कर डाला है , लगता है हमारे पिता ने अलादीन का चिराग ढूंढ निकाला...
तुमसे मुलाकात

तुमसे मुलाकात

” हमें नहीं पढ़ना है! यहाँ..!! भोपाल कोई जगह है! दिल्ली जाकर पढ़ना चाहते हैं.. हम!”। बिटिया ने कॉलेज के दाख़िले को लेकर ज़िद की थी.. और उनकी ज़िद अपनी जगह सही भी थी.. आख़िर अव्वल अंकों से बारहवीं जो पास की थी.. बिटिया ने! दिल्ली भेजने और पढ़ाने में हमें...
खानदान 145

खानदान 145

” तन्ने पेलयां न बताया कि तन्ने पाँच-लाख रूपये की ज़रूरत सै! तो हम इंतज़ाम करते.. अब इतनी जल्दी इतने रुपये कित्ते देंगें! कोशिश करेंगें! गाम में कोई हमनें देता हो तो!”। रमेश के चाचा ने रमेश से कहा था। अब तो गाँव में रमेश और प्रहलाद के रोज़ के फ़ोन जाने लगे...
जहाँ मान मिले

जहाँ मान मिले

जहाँ मान मिले सम्मान मिले मेहनत का पूरा दाम मिले काम वहीं तुम करना सपने देखो बड़े बड़े नहीं होते पूरे बिना लड़े समय का सारा खेल यहाँ जो ना पहचाने समय का रूख और समय की कीमत वो बह जाता ना रूक पाता ना कुछ अर्जित ही कर...
राम

राम

राम केवल नाम नहीं हैं राम बस इंसान नहीं हैं राम तो जीवन दर्शन हैं कष्टों में धैर्य का प्रदर्शन हैं राम त्याग की मूर्ति हैं राम प्रेम की अनुभूति हैं राम एक संस्कार हैं राम मर्यादा का सार...
खानदान 145

खानदान 144

पिता के घर आते ही.. प्रहलाद अपने दाख़िले को लेकर पीछे लग गया था.. ” पापा वो दादू के गाँव वाली ज़मीन बेच देते हैं.. उनसे जो पैसे आएँगे.. मेरी फ़ीस भर देना आप!”। रमेश का सारा परिवार इसी बात को लेकर रमेश के पीछे लग गया था.. लालची दिमाग़ का रमेश! जिसे केवल...