जीने की राह – चार

जीने की राह – चार

लेकिन आज इन संकट के पलों में मैं महा ज्ञानी, मठाधीश और भूले भटकों को राह बताता सुझाता स्वयं ही राह भूल गया था और अंधा हो गया था। “क्या .. क्या गुलनार मुझे ले कर डूब जाएगी?” मैं स्वयं से प्रश्न पूछ रहा था। “जब लोगों को पता चलेगा कि मैं और गुलनार ..?...
जीने की राह – तीन

जीने की राह – तीन

रात्रि का सूना प्रहर था। चंद्र प्रभा शांत बह रही थी। लेकिन गुलनार अशांत थी। उसके तपते माथे पर मैंने अपना हाथ रख दिया था। उसने आशीर्वाद जो नहीं लिया था। अब मैं प्रार्थना कर रहा था प्रभु से गुलनार के लिए! न जाने कहां से चलकर आई थी गुलनार! न जाने कौन कौन सी विपदाएं झेल...
जीने की राह – दो

जीने की राह – दो

चंद्र भागा नदी के किनारे बने चंद्रमा चौक आश्रम में भीड़ जुटी है। रोगी-धोगी और जीने की राह में अटके भटके सभी लाइन में आ खड़े हुए हैं! मैं केवल उनके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देता हूँ। सेवक उन्हें प्रसाद देते हैं। लाइन जब समाप्त हो जाती है तो ही मुझे सांस आती है। लोग...