चंद्र भागा नदी के किनारे बने चंद्रमा चौक आश्रम में भीड़ जुटी है। रोगी-धोगी और जीने की राह में अटके भटके सभी लाइन में आ खड़े हुए हैं! मैं केवल उनके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देता हूँ। सेवक उन्हें प्रसाद देते हैं। लाइन जब समाप्त हो जाती है तो ही मुझे सांस आती है।
लोग कहते हैं कि उन्हें फल मिलता है – मैं नहीं!
लेकिन आज अचानक ही मेरा उठा हाथ रुक गया है। सामने आशीर्वाद लेने खड़ी महिला को मैंने गौर से देखा है। हॉं हॉं! शत प्रति शत ये तो गुल नार ही है। छू कर देखा है। बदन बुखार में तप रहा है। अपनी बेहोशी को तनिक संभाल कर गुल नार ने मुझे देखा है। वह भी पहचान गई है कि मैं पीतू हूँ!
हे भगवान! ये अब नया कौन सा दोराहा आ खड़ा हुआ? मैंने रहम की भीख मांगी है अपने इष्ट से!
“इन्हें आश्रम में ले जाओ!” मैंने सेवकों से कहा है। “बताना – तुलसी जल से इनका माथा सेंकेंगे!” मैंने निर्देश भी दिया है।
जाते जाते गुल नार मुझे देखना न भूली है!
मैं भी कहां भूला हूँ गुलनार को! ओर मैं तो आप को आज भी गिन गिन कर गुलनार से हुई गलतियां बता सकता हूँ! कैसे भटकी ये जीने की राह से – मैं जानता हूँ!
और हॉं दूध का धुला तो मैं भी नहीं हूँ!

मेजर कृपाल वर्मा