by Major Krapal Verma | Jul 30, 2021 | जीने की राह!
जीने की राह पर अंतिम पड़ाव की तरह सेवकों ने मेरे लिए एक छोटी और सुंदर कुटिया छा दी है। चंद्र प्रभा के किनारे आश्रम से तनिक दूरी पर है ये कुटिया। कुटिया से सीढ़ियां नीचे चंद्र प्रभा में उतरती हैं। नीचे एक छोटा घाट बना है पानी के किनारे जहां मैं स्नान करता हूँ, ध्यान...
by Major Krapal Verma | Jul 28, 2021 | जीने की राह!
“मुझे भगा ले चल पीतू!” गुलनार रो रही थी, बिलख रही थी और उसकी आंखों से चौधार आंसू बह रहे थे। “हम सात बहनें हैं!” रोते रोते गुलनार बताने लगी थी। “दो पहले ही बिक चुकी हैं। अब मैं ..” वह मुझसे लिपट गई थी। “मैं मर जाऊंगी पीतू। मैं...
by Major Krapal Verma | Jul 27, 2021 | जीने की राह!
मैं आश्रम में भ्रमण करने के बाद लौटा हूँ! गुलनार की आंखें बंद थीं। गहरी नींद में सोई थी शायद! लेकिन चेहरे से साफ जाहिर था कि वो अब स्वस्थ है। मेरे तीन व्रत – मेरे महा बाहुओं की तरह अब मेरे साथ ही रहते हैं। आज अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ। आज जब मैं...
by Major Krapal Verma | Jul 25, 2021 | जीने की राह!
“इस औरत के साथ स्वामी जी बंधे बंधे लगते हैं! घूम फिर कर इसी को देखने चले आते हैं!” सेवक शंकर की शंका थी। “लेकिन जब जय वीर कोमा में था और छह माह तक बेहोश पड़ा रहा था – ..?” “पागल! तुझे पता नहीं जय वीर क्या कहता है? कहता है – ये...
by Major Krapal Verma | Jul 19, 2021 | जीने की राह!
“कैसी है ..?” मैंने गुलनार की ओर इशारा कर डॉ प्रसाद से पूछा है। डॉ प्रसाद हमारे आश्रम को निशुल्क सेवाएं प्रदान करते हैं। गुलनार अभी भी बेहोश है। “बची कैसे स्वामी जी – मैं हैरान हूँ!” डॉ प्रसाद की आंखों में आश्चर्य है। “भूखी प्यासी...
by Major Krapal Verma | Jul 17, 2021 | जीने की राह!
लेकिन गहन शांति में डूबा मैं अचानक ही रोने लगता हूँ! “मॉं .. मॉं ओ मेरी मॉं ..! मइया ..! कहॉं चली गई तू ..?” “रो मत बेटे, राे मत! इतना ही साथ था हमारा!” मोहन लाल गौतम – मेरे पिता मुझे समझा रहे थे। “मैं हूँ न ..!” वह मुझे...