by Major Krapal Verma | Sep 10, 2021 | जीने की राह!
चांदनी रातों में मैं कुटिया में बत्ती नहीं चलाता हूँ। चंद्र कलाएं चारों ओर से आ आ कर मुझसे लिपट जाती हैं। स्निग्ध, शीतल और उज्ज्वल ये चंद्र कलाएं मुझे दैवीय लताओं सी लगती हैं – जो मुझे अपने में समेट कर मेरे सारे संताप हर लेती हैं! मेरा मन इनके साथ खूब खेलता है।...
by Major Krapal Verma | Sep 4, 2021 | जीने की राह!
बड़ा बेशर्म होता है – ये मन! गुलनार से जूते खाने के बाद भी गुलनार से ही चिपका रहता था – ये मेरा मन! गुलनार के सिवा मुझे और कुछ सूझता ही नहीं था। मन बार बार सलाह देता था कि किसी तरह मैं गुलनार को पटा लूँ, मना लूँ, बहका लूँ और फिर उसके अछूते संसार में प्रवेश...
by Major Krapal Verma | Sep 4, 2021 | जीने की राह!
अगर कभी गुलनार के पैर में कांटा भी लग जाता था तो टीस मेरे तन में होती थी। मैं बिगड़ उठता था। मैं संसार को ही भस्म कर देने पर तुल आता था। लेकिन जब कभी गुलनार खुश होती थी तो मेरा मन भी गले में मृदंग पहन नाचता गाता फिरता था – गली गली! गुलनार की खुशी और गम दोनों...
by Major Krapal Verma | Aug 7, 2021 | जीने की राह!
लोगों ने मेरी कुटिया को बड़े करीने से बनाया था! तीनों ओर मोखे छेक दिये थे। हवा और रोशनी का खूब आगमन था। सामने का दरवाजा चंद्र प्रभा की ओर खुलता था। मुझे भीतर बैठे बैठे ही वैकुंठ दिखाई दे जाता था। लेकिन आज न जाने कैसे और क्यों मुझे भोजपुर दिखाई दे रहा था। वही कमरा...
by Major Krapal Verma | Aug 6, 2021 | जीने की राह!
“स्वामी जी! वो औरत फिर बीमार हो गई!” शंकर मुझे सूचना दे रहा है। “न जाने क्या क्या बक रही है। वो किसी पीतू को पुकार रही है स्वामी जी! कह रही है – मुझे माफ कर दो पीतू! पीतू मैं तुम्हारी गुनहगार हूँ .. और ..” मैं और मेरा समूचा वजूद हिल गया...
by Major Krapal Verma | Aug 3, 2021 | जीने की राह!
शनिवार का दिन आश्रम के लिए अनूठा दिन होता है। शाम को कीर्तन होता है। आशीर्वाद लेने आये लोग भी कीर्तन में शामिल होते हैं। दूर दराज से भी लोग कीर्तन में भाग लेने आते हैं। खूब भीड़ लगती है। पंडित प्रभु पाद जी की मंडली सभा को अपने भजन कीर्तन और वाणी विलास से मोह सा लेते...