जीने की राह सोलह

जीने की राह सोलह

चांदनी रातों में मैं कुटिया में बत्ती नहीं चलाता हूँ। चंद्र कलाएं चारों ओर से आ आ कर मुझसे लिपट जाती हैं। स्निग्ध, शीतल और उज्ज्वल ये चंद्र कलाएं मुझे दैवीय लताओं सी लगती हैं – जो मुझे अपने में समेट कर मेरे सारे संताप हर लेती हैं! मेरा मन इनके साथ खूब खेलता है।...
जीने की राह सोलह

जीने की राह पंद्रह

बड़ा बेशर्म होता है – ये मन! गुलनार से जूते खाने के बाद भी गुलनार से ही चिपका रहता था – ये मेरा मन! गुलनार के सिवा मुझे और कुछ सूझता ही नहीं था। मन बार बार सलाह देता था कि किसी तरह मैं गुलनार को पटा लूँ, मना लूँ, बहका लूँ और फिर उसके अछूते संसार में प्रवेश...
जीने की राह सोलह

जीने की राह चौदह

अगर कभी गुलनार के पैर में कांटा भी लग जाता था तो टीस मेरे तन में होती थी। मैं बिगड़ उठता था। मैं संसार को ही भस्म कर देने पर तुल आता था। लेकिन जब कभी गुलनार खुश होती थी तो मेरा मन भी गले में मृदंग पहन नाचता गाता फिरता था – गली गली! गुलनार की खुशी और गम दोनों...
जीने की राह तेरह

जीने की राह तेरह

लोगों ने मेरी कुटिया को बड़े करीने से बनाया था! तीनों ओर मोखे छेक दिये थे। हवा और रोशनी का खूब आगमन था। सामने का दरवाजा चंद्र प्रभा की ओर खुलता था। मुझे भीतर बैठे बैठे ही वैकुंठ दिखाई दे जाता था। लेकिन आज न जाने कैसे और क्यों मुझे भोजपुर दिखाई दे रहा था। वही कमरा...
जीने की राह बारह

जीने की राह बारह

“स्वामी जी! वो औरत फिर बीमार हो गई!” शंकर मुझे सूचना दे रहा है। “न जाने क्या क्या बक रही है। वो किसी पीतू को पुकार रही है स्वामी जी! कह रही है – मुझे माफ कर दो पीतू! पीतू मैं तुम्हारी गुनहगार हूँ .. और ..” मैं और मेरा समूचा वजूद हिल गया...
जीने की राह ग्यारह

जीने की राह ग्यारह

शनिवार का दिन आश्रम के लिए अनूठा दिन होता है। शाम को कीर्तन होता है। आशीर्वाद लेने आये लोग भी कीर्तन में शामिल होते हैं। दूर दराज से भी लोग कीर्तन में भाग लेने आते हैं। खूब भीड़ लगती है। पंडित प्रभु पाद जी की मंडली सभा को अपने भजन कीर्तन और वाणी विलास से मोह सा लेते...