दोसे के जायके और हम

दोसे के जायके और हम

कुछ याद है.. माँ! तुम्हें जब हमारा बचपन था.. और हमारा केवल पाँच सदस्यों का एक छोटा सा घोंसला हुआ करता था.. उस वक्त कितनी अनोखी और प्यारी कहानी हुआ करती थी.. हमारी। पिताजी फौज में अफसर थे.. मज़े के दिन और बिंदास ज़िन्दगी चल रही थी.. धीरे-धीरे तुम्हारे हाथ का लज़ीज़...
खानदान 130

खानदान 130

अब सुनीता को लेकर रमेश का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था। और वो ख़ुद ही रंजना को लेकर गहरे राज़ खोल रहा था। सुनीता के सामने कुछ इस तरह से खोले थे.. रमेश ने सारे राज़.. ” अरे! इसकी मौसी कोई मंत्री-वन्त्री नहीं है! झूठ बोलती है! ये! छोटे से फ्लैट में पड़ी है.. बोलती...
बागीचा

बागीचा

फूलों के सुन्दर बागीचे में हर भोर तुम्हें ढूंढ़ता है मन वो तुम्हारे हाथ हिलाते हुए मुस्कुराकर टहलने को देखने के लिये तरसता है मन तुम्हारे बगैर यह सुन्दर बागीचा सुनसान लग रहा है माँ! अपने भोर के टहलने से एकबार फ़िर इस फूलों भरे बागीचे को गुलज़ार कर दो माँ..!! स्वर्गलोक...
बागीचा

वहम

आकर कहाँ चली जाती हो तुम क्यों दिखकर छुप जाती हो तुम हो ही नहीं अब तुम सच तो यह है! केवल मन का वहम बन दिख जाती हो तुम अब तुम बिन जीना सीख लिया है.. मैंने! पर फ़िर भी मेरा वहम बन दिख जाती हो तुम...
कानू और मैरेज

कानू और मैरेज

शादी-ब्याह का भी अपना एक अलग ही मज़ा है! और सर्दियों में हो रही शादी की तो बात ही कुछ और होती है.. असली खाने-पीने और जायके का मज़ा तो सर्दियों में ही आता है। शरद ऋतु में शुरू होकर शादियां अब तक यानी के जून के महीने तक तो चलती ही हैं। शादी-ब्याह में आना-जाना हो ही जाता...