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लेख– स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से हो रहा सुधार मोदी सरकार के नेतृत्व में

       महात्मा गांधी ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। स्वच्छता ही स्वस्थ होने की पहली सीढ़ी है। ऐसे में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है, उनका दृष्टिकोण ही स्वस्थ समाज के निर्माण पर शायद नहीं था। भारत की आत्मा गावों में बसती है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारें पिछले सात दशक में गांवों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर करा नहीं पाई। जो उनकी नाकामयाबी ही समझ आती है। देश को सेहतमंद बनाना है तो इसके लिए गावों के आधारभूत ढांचे में सुधार लाना होगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी कहना था,  कि सरकार की योजनाओं की कसौटी अंतिम जन होता है। यदि जन तक किसी भी लोक – कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं  पहुंच रहा है इसका मतलब है कि वह योजना धरातल पर सफल नहीं हो पाई है। ऐसे में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार जो गांधी पर अपना हक़ दिखाती, वहीं उनके विचार से कन्नी काटती। फ़िर क्या सामाजिक लक्ष्य समझें उसके राष्ट्रीय पार्टी होने के। 

        महात्मा गांधी का कहना था, कि यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ नहीं है तो वह स्वस्थ नहीं रह सकता। ऐसे में भारतीय राजनीति में 2014 के बाद का कालखंड स्वच्छता के लिहाज़ से स्वर्णिम काल कहा जा सकता। केन्द्र में मोदी के नेतृत्व में आई भाजपा  ने जन-स्वास्थ्य जैसे विषय को भी जन आंदोलन बनाने का कार्य किया। केंद्र की भाजपा सरकार ने न सिर्फ़ ‘ सबका साथ सबका विकास ‘ का नारा दिया। अपितु सबके स्वास्थ्य की तरफ़ ध्यान भी केंद्रित किया। जिसके फलस्वरूप महात्मा गांधी के विचारों को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम देश के गांवों और शहरों को स्वच्छ बनाने की मुहिम छेड़ी। जो देखते देखते जन आंदोलन में तब्दील हो गया। प्रधानमंत्री ने अपने एक व्यक्तव्य में कहा कि हम कम ख़र्च में मंगल तक पहुँच सकते, तो क्या गली-मुहल्ले साफ नहीं कर सकते। उनके इस कथन से स्पष्ट है, कि वर्तमान की केंद्र सरकार स्वच्छ और स्वस्थ भारत के लिए किस स्तर तक समर्पित है। यह बेहतर समाज के निर्माण का कर्त्तव्य बोध ही है, कि मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत, तो स्वस्थ भारत का नारा दिया। जो पूर्ववर्ती सरकारों के एजेंडे से बाहर था। मोदी सरकार ने स्वच्छता से ही स्वस्थ में सुधार होगा, इसको समझा। तभी शहरी क्षेत्रों को स्वच्छ बनाने के लिए के लिए 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय और प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा प्रदान करने का संकल्प लिया। वहीं इस कार्यक्रम के तहत आवासीय क्षेत्रों में जहां व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण करना मुश्किल है वहां सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करने का लक्ष्य रखा। तो वहीं ग्रामीण भारत को भी बेहतर स्वस्थ सुविधाएं देने की सरकार ने कर्तव्यनिष्ठता व्यक्त की।

     एक सरकारी आंकड़ें के मुताबिक वर्ष 1947 से लेकर 2014 तक सिर्फ़ 6.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण देश मे किया गया,  जबकि वर्ष 2014 से लेकर 2018 के बीच 7.25 करोड़ शौचालय का निर्माण हुआ। वहीं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व में देश की स्वच्छता कवरेज 38.70 % थी, जबकि 2014-18 तक 83.71 % रही। सरकार के आंकड़े कहते हैं, कि अब तक देशभर में लगभग 84 करोड़ शौचालय स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए जा चुके हैं। अब आसानी से समझ सकते कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार जो देश में अधिकतर समय सत्ता सिहांसन पर काबिज़ रहीं। शायद उसकी प्राथमिकता में सबसे पहली प्राथमिकता स्वच्छता भी नहीं थी। फ़िर जन सरोकार के विषयों पर उसके कर्तव्यनिष्ठ होने की उम्मीद करना बेईमानी ही लगता है।

     वहीं स्वच्छता के बाद मोदी सरकार का ध्यान जन स्वस्थ में सुधार का है। जन स्वास्थ्य को लेकर भाजपा सरकार की प्राथमिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता, कि 2018 के बजट में स्वास्थ्य की मद में 27 फ़ीसदी ज़्यादा रकम की बढ़ोतरी की गई। इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार ने डायबिटीज, हाइपरटेंशन, और सामान्य कैंसर के सब- सेंटर और प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर स्क्रीनिंग करने की सुविधाएं भी दे रही। इसके अलावा हार्ट स्टेंट के लिए कीमतों की सीमा भी सरकार ने तय की है। बेयर मेटल स्टेंट 7,260 रुपये जबकि मैटेलिक और बायोडिग्रेडेबल स्टेंट समेत ड्रग एल्युटिंग स्टेंट यानी डीईएस 29,600 रुपये तक की कीमतों में अब मिलेंगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस तरह से स्टेंट की कीमतों में 85 फ़ीसदी तक की कमी आ गई है। जो यह दर्शाता है, कि मोदी सरकार जन स्वस्थ को लेकर सचेत है।

     इसके अलावा मोदी सरकार ने के तहत  देश के कमज़ोर इलाकों में मेडिकल शिक्षा, रिसर्च और क्लीनिकल केयर में सुधार लाने के साथ-साथ हेल्थकेयर की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कार्यरत है। वहीं मोदी सरकार ने 13 एम्स की स्थापना की घोषणा 2014 में ही कर चुकी है। वहीं सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक भी मोदी सरकार के नेतृत्व में बनाये जा रहे हैं। इनके अलावा दो नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट, 20 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और विशेष इलाज और सुविधाओं से लैस 50 कैंसर केयर सेंटर भी बनाये जा रहे हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) देश  को समर्पित किया। 2018 में स्वास्थ्य के मद पर 56,226 करोड़ रुपये आवंटित हुआ। ऐसे में समझ सकते 2014 के बाद लगातार स्वास्थ्य के मद पर बजट में बढ़ोतरी हुई है। अब बात आयुष्मान भारत यानी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की करते हैं। तो मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आयुष्मान भारत के शुरुआती सौ दिनों में 6.85 लाख लाभुकों ने नि:शुल्क उपचार कराया है और पांच लाख से अधिक लोगों के उपचार के दावे का निपटारा करते हुए उसके लिए धन भी मुहैया करा दिया गया है। इस योजना के अंतर्गत कार्यरत प्रणाली की कार्यक्षमता का अनुमान इस बात से पता किया जा सकता कि हर दिन पांच हजार दावों का निपटारा हुआ है। चालू वित्त वर्ष के अंत तक 25 लाख लोगों को उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। तो वहीं इस महत्वाकांक्षी योजना में 10 करोड़ से अधिक परिवारों यानी अमूमन देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या को अस्पतालों में भर्ती होकर उपचार कराने का अवसर मिलेगा। वंचित तबक़े के परिवार देश के 16 हजार अस्पतालों में हर साल पांच लाख रुपये तक का उपचार करा सकते है। इस योजना के अंतर्गत वंचित तबक़े का स्वास्थ्य पर व्यय का 60 प्रतिशत भाग केंद्र सरकार को वहन करना है तथा शेष योगदान राज्यों का होगा। ऐसे में समझ सकते कि मोदी सरकार गांधी के स्वच्छ भारत,  स्वास्थ्य भारत की परिकल्पना को पंख देने का कार्य तेजी से कर रहीं, बशर्तें उसके पास कार्य करने का समय कम है।

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लेख– गणतंत्र में गण की पूछ कहीं कम तो नहीं हो रहीं?

संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत होती है, हम भारत के लोग। इसका निहितार्थ यहीं है, कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर असम तक हम सब एक है। ऐसे में जब हम गणतंत्र दिवस इस वर्ष मनाने जा रहें। फ़िर हमें विचार करना चाहिए, कि क्या हम सभी वास्तव में एक है। फ़िर वह किसी भी रूप में क्यों न हो। 
     आज हमारा देश भाषा के नाम पर बंट रहा, धर्म के नाम पर, क्षेत्रीयता के आधार पर और तो और ग़रीबी- अमीरी के नाम पर भी देश में खाइयां गहरी होती जा रहीं। फ़िर कैसे मान लें। इतने वर्षों बाद संविधान की प्रस्तावना को सुशोभित करने वाले शब्द समाजवादी, पंथनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य, प्रतिष्ठा और अवसर की समता आदि सार्थक हो पा रहें। इसके अलावा अगर हमारा संविधान सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करता है तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देता है। तो क्या ये सब बातें वास्तविक धरातल पर आकार लेती हुई दीगर होती। इसकी तथ्यात्मक विवेचना होनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद अवसर की समता की बात करता है। क्या आज के परिवेश में अवसर की समता दिखती है। ऐसे में अगर हम कहें कि उजाले में चिराग लेकर भी देखें तो देश मे किसी भी स्तर पर यह समता दिखाई नहीं देगी। ज़्यादा नहीं राजनीतिक दलों का उदाहरण ही ले लीजिए, क्या किसी दल में सामान्य व्यक्ति वह पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता। जो वंशवाद के नाम पर मुफ़्त में बांटा जा रहा। चाहें वह उस योग्य हो, या नहीं। फ़िर कहाँ गई अवसर की समता की राजनीतिक दुहाई? आज देश के लोकतंत्र की महती समस्या यहीं है, कि जिस गण को संविधान सर्वोच्चता प्रदान करता उसी गण की समस्त शक्तियों और अधिकारों को सियासतदां अपने निजी हित और सरोकार को साधने के लिए कागजों में समेट कर रख दिए हैं।
      भारतीय संविधान में आम नागरिकों को मौलिक अधिकार के रूप में अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक विभिन्न प्रकार की समता की बात की गई है। संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 धर्म, वंश, जाति, लिंग और जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किए जाने का समर्थन करता है। वहीं अनुच्छेद 15.4 सामाजिक एवम् शैक्षिक दृष्टि से पिछडे वर्गो के लिए विशेष उपबन्ध की बात करता है। इसके अलावा अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता और 17 छुआछूत  के अंत की बात करता है। अब जब हम 70 वां गणतंत्र मनाने जा रहें, तो हमें विचार-मंथन अवश्य करना चाहिए कि आख़िर इन वर्षों के दरमियान हमने कितना इन विषयों पर सार्थकता पाई। गणतंत्र दिवस, संविधान और आम जनमानस पर चर्चा कर रहें, तो यह समझना होगा। लोकतंत्र में जिस लोक को सर्वोपरि बताया जाता रहा है, वहीं आज पिछड़ता दिख रहा।
            देश परमाणु शक्ति से संपन्न और महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। भारतीय वैज्ञानिकों ने दुनिया के देशों के सामने अंतरिक्ष में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया है। हम चांद-मंगल भी फ़तह कर लिए हैं। फिर भी आज देश के सामने प्रत्यक्ष रूप से ऐसे अनगिनत सवाल ख़ड़े हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं, कि हम किस आज़ादी और संवैधानिक ढांचे का ढिंढोरा पीट रहें? जब देश आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर ही लहूलुहान हो जाता है। क्षेत्रवाद और भाषा के नाम पर हम एक देश के होकर भी बंटे हुए हैं। युवाओं को अपने आज़ाद देश के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान नहीं रहा है। तो वही बहुतेरे प्रश्न मुँह बनाकर हमें चिढ़ा भी रहें, कि हम कैसा गणतंत्र दिवस मना रहे, जब सामाजिक और राजनीतिक कुरीतियों और बुराइयों से अलग आज़तक देश नहीं हो सका। कुछ प्रश्न हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देंगें, कि संविधान की बातें तो सिर्फ़ किताबी हो चुकी है। हमारे रहनुमा अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक योजनाओं को पहुँचा नहीं सके। देश में महिलाओं को तमाम प्रकार के प्रतिबंधों से मुक्ति दिला नहीं सके। धर्म और जाति की जकड़न और जंजीरें हम झंझावात लाकर तोड़ नहीं पाए। इसके साथ अगर आज़ादी के सात दशक बाद भी किसान और मजदूर पूंजीवाद की जकड़न से स्वतंत्रता महसूस नहीं कर पाए। फिर कैसा अवसर की समता और कैसा लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य? 
        गांधी और अम्बेडकर ने तो यह सपना कभी नहीं देखा होगा, कि आने वाले वक्त में भी हमारा सपनों का भारत छुआ-छूत और उच्च और निम्न श्रेणी के अधर में पिसता रहेगा! विवेकानंद ने कभी न सोचा होगा, कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी नशे में आकंठ डूब जाएं। पर शायद आज की व्यवस्था को इन सब बातों का जरा भी फ़र्क नहीं पड़ता। आज के वक़्त सत्ता के लिए खुला खेल चल रहा। नैतिकता, सामाजिक आदि कर्तव्यों को दरकिनार कर दिया गया है। राजनीति तो राजनीति के लोग, समाज का उच्चतर तबका भी इस मसलें पर कमतर कहीं से कहीं तक नहीं है। सियासतदां संविधान की दुहाई देते नहीं थकते कि वे समाज को सर्वसमावेशी बना रहें, लेकिन हकीकत कुछ ओर है। ऐसे में सियासतदानों को समझना चाहिए। देश का निर्माण तो चंद अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले व्यक्तियों से होता नहीं। देश बनता है प्रदेश के समूह से। प्रदेश किससे बनता है, जिलों, तहसीलों आदि से। वह जिला कैसे निर्मित होता है। वहाँ पर रहने वाले व्यक्तियों के समूहों से। ऐसे में जब तक हर व्यक्ति के हाथ में समान संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत सुविधाएं न पहुँच जाएं। तब तक सभी नीति और नैतिकी भोथरी ही लगती है।
               अब बात समाज में समानांतर पुष्पित और पल्लवित हो रहीं दकियानूसी, अमानवीय सोच की। हम विश्वगरु और वैश्विक परिदृश्य के नेतृत्वकर्त्ता बनना चाहते। जिस पर समाज की ऐसी सोच अंकुश लगाने का कार्य ही करती है। कुछ उदाहरण से यह बात समझते हैं। जब हम और हमारा समाज ही जाति-धर्म के नाम पर आपस में बिखरा पडा है, तो कहीं विश्वगुरू बनने का सिर्फ़ मुलम्मा तो नहीं खड़ा किया जा रहा। इस पर गहन विचार-विमर्श होना चाहिए। आज हमारे समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानता ही नहीं। इक्कीसवीं सदी में जब विश्व प्राचीन भारतीय मानवतावाद को आत्मसात कर रहा। उस दौर में हमारे देश में धर्म और शिक्षण स्थलों पर भी मानवीय जातिभेद से ग्रसित हैं। 26 जनवरी को हम 70 गणतंत्र दिवस मनाने जा रहें। दूसरी तरफ़ देव भूमि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू बंजार घाटी की एक घटना संवैधानिक ढांचे और मानवीय मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगा रही। वाकया कुछ यूं है, कि जिस दौर में सियासतदां विश्व गुरु और वैश्विक शक्ति बनने का दिवास्वप्न दिखा रहें। उसी दरमियान कुल्लू की बंजार घाटी के थातीबीड़ में एक मेले में लोकपरम्परा के नाम पर एक अनुसूचित जाति के युवक के साथ मारपीट की गई और साथ मे जुर्माना भी। अब उसके साथ अमानवीय व्यवहार क्यों किया गया। उसे समझते हैं। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के बंजार में वासुकी नाथ देव का मंदिर है। यहाँ हर वर्ष फागली उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव के अंतिम दिन देवता के गुर नर्गिस के फ़ूल को टोकरी में रखते हुए नाचते हैं और वह नाचते हुए यह फूल फेंकता है और जो इस फ़ूल को पकड़ता है। उसे स्थानीय परम्परा के अनुसार ऐसा माना जाता है भगवान का वरदान मिला है। अब उस युवक का ज़ुर्म यहीं था, कि उस युवक ने फूल पकड़ लिया था। जिसकी वज़ह से अनुसूचित जाति के युवक को पीटा गया और 5100 रूपए का अर्थदण्ड लगाया गया। यह वैज्ञानिक युग की कैसी विडंबना है, कि मानवता और मानवीय मूल्य को हमारा समाज देहरी पर रखता हुआ प्रतीत हो रहा। 
       अगर बात धार्मिक तथ्यों के आधार पर भी हो, तो कहा जाता है सबका मालिक एक है। इसके अलावा जब देवता कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करता। फ़िर मानव को यह आज़ादी किसने दे दी? देवता कभी इंसानों में भेदभाव करता तो श्रीराम कभी सबरी के जूठे बैर नहीं खाते और बाल्मिकी कभी रामायण नहीं लिख पाते। यह हमारे समाज को समझना होगा। अब बात शिक्षा के स्थल में भेदभाव की करते हैं। इसके लिए भी पहला उदाहरण देवभूमि के कुल्लू का। यहां के एक शिक्षण संस्थान की अखबारी सुर्खियां बनती है कि प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों के साथ जातिगत भेदभाव हुआ। शिक्षण संस्थानों में भेदभाव का ये एक उदाहरण मात्र है। पूरे देश मे ऐसी घटनाएं आज के दौर में आम हो चली हैं। कभी मिडे-मिल के नाम पर तो कभी विषय-विशेष को पढ़ाने के नाम पर बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव लगातार होता आ रहा। ऐसे में इन बाल मन वाले बच्चों पर इन बातों का क्या असर होता होगा, ये तो उन्हें ही मालूमात होगा। ऐसे में जब कुंठा और संकुचित मानसिकता बच्चो के दिमाग मे बालपन से ही समाज में भरी जा रहीं। फ़िर कैसा होगा देश और समाज का भविष्य। इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता। ये समाज में असमानता के चंद उदाहरण हैं। ऐसे उदाहरणों औऱ कृत्यों से हमारा परिवेश भरा पडा है। फ़िर बेहतर सामाजिक जीवन कैसे निर्मित हो सकता। यह लाख टके का सवाल उभर कर हमारे सामने आ जाता है। 
       भारतीय संविधान जो मानव-मूल्यों और कर्तव्यों, कानूनों की शरणस्थली है। क्या उसके लागू होने के बाद गांव, गरीब की स्थिति बदली। अब समय है, कि उस संविधान से प्राप्त अधिकारों और कर्तव्यों से ग्रामीण संरचना में कितना बदलाव आया, उस तरफ दृष्टि डालकर देख लें। संविधान भारतीय नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है, तो कर्तव्यों के साथ कुछ बंदिशे भी लगता है। 1950 से शुरू हुआ दौर 21वीं शताब्दी के 2019 में पहुंच चुका है। अब यह जानना आवश्यक है, कि देश की लाचारिता कितनी कम हुई? ग्रामीण वातावरण के परिदृश्य में क्या बदलाव हुए? आज जब देश में विकसित देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाने की सोच रहा है, तो क्या देश की आधारभूत संरचना भी विकसित देश के समक्ष टिकने लायक हो गई है। प्रथम गणतंत्र बेला पर भारत की आबादी 38.1 करोड़ थी, वर्तमान समय में देश में जनसंख्या विस्फोट की व्यथा उत्पन्न हो चुकी है, फिर 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी 121 करोड़ को पार कर चुकी है, फिर यह जानना लाजिमी हो जाता है, कि क्या देश में मूलभूत सुविधाओं और जरूरतों की पूर्ति हो पा रही है, या नहीं। औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न पलायन के बावजूद 83.3 प्रतिशत आबादी ग्रामीण अंचलों में आज भी निवास करती है। संविधान में तमाम अधिकारों और कानूनों के उल्लेख के बावजूद ग्रामीण तबका शहरों की ओर पलायन करने पर क्यों मजबूर हो रहा है, इस विषय की सच्चाई से रूबरू होना भी जरूरी है।               वर्तमान परिस्थिति में ग्रामीण परिवेश अनेकों समस्याओं से ग्रसित है, और तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद ग्रामीण भारतीय परिवेश को शहरों की ओर रोजगार, शिक्षा आदि के लिए पलायन करना पड़ रहा है, लेकिन जनसंख्या दबाव के कारण शहरों की स्थिति भी भयावह हो रही है। ऐसे में यह सवाल उठना बेहद जरूरी हो जाता है, कि ग्रामीण अंचल का विकास क्यों नहीं किया जा रहा। जिससे लोग शहरों की तरफ विस्थापित न हो। किसी गणतांत्रिक और लोकाशाही राष्ट्र के विकास का पैमाना और उत्तम मानक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर होते हैं। इस मुद्दे पर कोई पूछेगा देश की स्थिति क्या है, फिर जवाब प्रतिकूल ही मिलता है। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में 2011 मे एक लाख 76 हजार के आस-पास समुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हो चुके है, देश में 9 लाख के करीब आधुनिक प्रणाली के डाॅक्टरों की फौज है, फिर भी दीपक तले अंधेरा ही है, कुपोषण, एनीमिया, और अतिसार के कारण देश का बड़ा हिस्सा काल-कलवित हो रहा है। साथ में सुदूर अंचलों में स्वस्थ और शिक्षा के स्तर पर भी वर्ग भेद साफ़ दीप्तिमान होता है। जो कभी दुःखद स्थिति को बयां करता है। जब देश का गणतंत्रता दिवस संविधान लागू होने की वजह से मनाया जाता है, और उसी संविधान की धारा 47 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है, कि स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना राज्यों का दायित्व है। फिर यह  प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है, कि आजादी के पश्चात करोड़ों के खर्च के बावजूद जल की भयावह समस्या और स्वच्छ जल लोगों को क्यों नसीब नहीं हो रहा है। और हो भी रहा, तो सामुदायिक स्तर पर जातीय और लैंगिक भेदभाव क्यों? ऐसे में ऐसा भी नहीं देश की सूरत और सीरत नहीं बदल रहीं। बदल तो रहीं, लेकिन कुछ विषमताएं है। जिसे दूर करके ही बेहतर राष्ट्र का निर्माण हो सकता। जो विश्वगुरु बनने का माद्दा रखेगा!

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लेख– मोदी सरकार के नेतृत्व में तेज़ी से बढ़ रही देश की अर्थव्यवस्था!

   किसी देश की समृद्धि और खुशहाली का पैमाना उसकी आर्थिक नीति और स्थिति पर निर्भर करता है। वर्तमान दौर में अगर भारत ब्रिटेन को पछाड़कर वैश्विक अर्थव्यवस्था के मामले में पांचवे स्थान पर पहुँचने वाला है। तो यह देश के नागरिकों और खासकर वहां की तत्कालीन रहनुमाई तंत्र के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी। वैसे एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। भारत को एक वक्त सोने की चिड़िया कहा जाता था। ऐसे में समझ सकते कि सोने की चिड़िया कहलाने के पीछे का मक़सद क्या रहा होगा। आज जब हमारी अर्थव्यवस्था विकासशील देश होने के बाद भी विकसित देशों के समानांतर पहुँच रहीं। ऐसे में आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन की माने, तो हमारी अर्थव्यवस्था पहली सदी से दसवीं सदी तक विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। इनके मुताबिक पहली सदी में भारत का सकल घरेलू उत्पाद विश्व के कुल जीडीपी का लगभग 33 फ़ीसदी के करीब था। जो आज की 2019 की स्थिति से काफ़ी अधिक था। ऐसे में यह दीगर होना चाहिए, कि अगर पहली सदी में हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी, और आज के समय में पांचवे स्थान पर पहुँचने वाली है। तो भारत की अर्थव्यवस्था के पिछड़ने का कारण ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था का जमकर शोषण होना और आज़ादी के बाद भी भारतीय रहनुमाई व्यवस्था सिर्फ़ अपने हित के लिए लम्बे समय तक कार्यरत रहना रहा। 
     आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के पैमाने पर भारत जो कीर्तिमान बनाने जा रहा है। उसकी परिकल्पना शायद ही किसी ने देश की आज़ादी के समय किया हो, क्योंकि आज़ादी से पूर्व लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रेजी औपनिवेशिक काल में भारतीय अर्थव्यवस्था को लूट कर खंडहर में तब्दील कर दिया गया था। आज़ादी के बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की राह पकड़ा। आज़ादी के पश्चात भी कई बार ऐसा दौर आया जब भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई। 1991 में जब भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, तो देश का सोना भी गिरवीं रखना पड़ा। ऐसे में उस दौर में शायद ही कोई यह उम्मीद कर रहा होगा, कि एक समय ऐसा भी आएगा जब भारत विकसित देशों के समकक्ष खड़ा हो पाएगा।
    आज भारत विश्व मे तेज़ी से अर्थव्यवस्था के मामले में बढ़ रहा है। 2018 में ही हमारे देश ने यूरोप के विकसित देश फ्रांस को पछाड़ते हुए विश्व की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। बिजेनस स्टैंडर्ड के मुताबिक 2017 के अंत में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.597 लाख करोड़ डॉलर रहा, जो फ्रांस के  2.582 लाख करोड़ डॉलर से अधिक रहा था। जिस कारण भारत को विश्व बैंक ने छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में शुमार किया था। इसके बाद अब 2019 में भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़कर पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। यह बात पीडब्ल्यूसी की वैश्विक अर्थव्यवस्था निगरानी रिपोर्ट बता रही। ऐसे में जिस हिसाब से आज हमारा देश अर्थव्यवस्था के मामले में आगे बढ़ रहा। वह यह साबित कर रहा, कि नोटबन्दी और जीएसटी से देश को नुकसान नहीं हुआ है। इस पर सिर्फ़ विपक्षी दल नकारात्मक माहौल पैदा करके अवाम को भड़काना चाहते हैं। जिससे इन दलों का राजनीतिक अस्तित्व बना रहे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मानें तो भारत की 2019 में विकास दर 7.8 प्रतिशत रहने वाली है।
      ऐसे में आज जिस दौर में देश के भीतर सभी विपक्षी दल मोदी सरकार को कमज़ोर बताकर एकजुट हो रहें। नोटबन्दी और जीएसटी को मोदी सरकार की सबसे बड़ी भूल बता रहें। उसी दरमियान अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष कहता है, भले ही भारत के लिए बेरोजगारी बड़ी चुनौती है।  लेकिन सरकारी कदम सकारात्मक दिशा में है। ऐसे में बढ़ती बेरोजगारी के लिए सिर्फ़ मोदी सरकार को दोष देना विपक्षी दल बंद करें। ख़ासकर कांग्रेस और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, क्योंकि देश में बेरोजगारी आदि आज चरम पर है। तो इसके लिए जिम्मेदार कहीं न कहीं यूपीए की पिछली सरकार है। जिस दौरान सिर्फ़ देश घोटालों का अड्डा बन गया था। आईएमएफ ने कहा कि हाल के बरसों में जहां चीन की वृद्धि दर नीचे आ रही है। वहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था ऊपर की ओर बढ़ रही है।
    फ़िर कुल मिलाकर हम उम्मीद कर सकते कि आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व के विकसित देशों से भी आगे निकल सकती। जैसा कि एचएसबीसी की रिपोर्ट भी कह रही। एचएसबीसी की एक रिपोर्ट कहती है, कि भले वर्तमान दौर में वैश्विक जीडीपी में भारत का हिस्सा सिर्फ़ तीन फीसदी हो। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि की प्रवृत्ति यह जरूर बयाँ कर रही कि यह अगले दशक में जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत वित्त वर्ष 2016-17 में 2300 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था रहा है। लेकिन भारत 2028 तक 7000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। हां तो इसके लिए एक बेहतर कार्य नीति वाली और स्थाई सरकार की ज़रूरत भी है। जिस पर खरा वर्तमान दौर में भाजपानीत एनडीए ही दिखती है, क्योंकि पूर्ववर्ती सरकारों ने जिस हिसाब से देश का धन स्वहित और घोटालों के नाम पर लुटा। वह देश की अर्थव्यवस्था को बट्टा लगाने वाला ही साबित होता है। तो ऐसे में अगर पूर्व रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन की सिफारिशों जैसे कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और उच्च कॉर्पोरेट निवेश के रास्ते में आने वाली मुश्किलो को कम करने के अलावा देश को स्थाई सरकार अगले एकाध दशक के लिए मिलती है। जो रघुराम राजन के सुझाव पर अमल भी करें। तो पहली सदी में जितना हिस्सा भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में था। वह तो हासिल नहीं कर लेगा। लेकिन एक बेहतर स्थिति में भारत स्थापित होता जरूर वैश्विक परिदृश्य में दिख सकता है। जहां पहुँचने की परिकल्पना शायद किसी ने देश की आज़ादी के वक्त की हो?