Posted on

स्वराज का स्वप्न !

इंडियन डेमोक्रेसी

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी –

उपन्यास अंश :-

“मुद्दई लाख बुरा चाहे – क्या होता है ….?” रईस खान -तीस्ता सीतलबाड़ का दांया हाथ मेरे सामने खडा -खडा कह रहा था . “मुहिम मुश्किल है !” उस ने मेरी आँखों में झाँका था . “लेकिन आप के साथ अल्ला है ! आप का अपना करम है !! आप अजेय हैं , मोदी जी …” उस ने जब मेरे चरण छूने चाहे थे ….तो …मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया था . 

तीस्ता सीतलबाड़ की शायद यह पहली शिकस्त थी – रईस खान के हाथों हुई थी . रईस खान एक सच्चा मुसलमान था ! जब उसे सच्चाई का पता चला था …तो उस का ज़मीर जाग उठा था ! उस ने पूरी सच्चाई उगल कर तीस्ता सीतलबाड़ को नंगा छोड़ दिया था !  

लेकिन मैं प्रसन्न न था ! मैं अब तक तीस्ता सीतलबाड़ की पहुँच को परख चुका था . वह अकेली न थी ! उस के साथ जो लाव-लश्कर था ….वह कोई सामान्य न था . उस की टीम में एक से बढ़ कर एक तीरंदाज़ था ….अपने फन का माहिर था …और …था – पक्का खिलाडी !

सच कहता हूँ कि …अब मुझे मुसलमानों से कोई डर न था ! रईस खान – एक अकेला मुसलमान , अनेकानेक मुसलमानों का प्रतिरूप था – जो सच्चा था …ईमानदार था ….अल्ला का था ….और उन के करम का था ! मैं अब मुसलमानों को कम …हिन्दूओं को ज्यादा दोषी मान रहा था ! उन हिन्दूओं को जो …निजी स्वार्थ में अंधे हो कर …मुझ पर हमला कर रहे थे ….हल्ला बोल रहे थे ….और किसी न किसी तरह मुझे परास्त कर देना चाहते थे ! 

वो कुछ अलग लोग थे -हिन्दू और मुसलमान थे …जो मिल कर मुझे मिटा देना चाहते थे !  

सच में तो ये लोग न हिन्दू थे …न मुसलमान ! ये थे – स्नात घ्रणा से ओत-प्रोत …नर-कंकाल …स्वार्थ में नाक तक डूबे पौलिटिकल पिट्ठू ….बईमान …लालची गीदड़ …जो मरों का मांस खाने के आदि हो चुके थे ! अब इन्हें मेरी लाश चाहिए थी – ताकि ये नोच-नोच कर मुझे खाते ….जश्न मनाते ….और खूब इनाम पाते ! इन सब की आँख मेरे ही अंत पर लगी थी !!

मैंने कई बार इन्हें विश्लेषित करना चाहा था ! मैंने चाहा था कि किसी तरह …से मैं इन्हें मना लूं ….सच्चाई बता कर इन्हें अपने पक्ष में ले लूं …..मानवता का वास्ता दे कर उन्हें अपने पवित्र इरादों से अवगत करा दूं …! लेकिन मैं हर बार ही हारा था !! 

कारण – न तो ये दानव थे ..और न ही मानव ! न ये समाज के थे …न थे देश के ! न ये नर थे …न नारी ! ये तो अव्वल दर्जे के अधम थे ….नीच थे …बेशर्म थे ….और गिरे लोग थे ! न इन का कोई धर्म था …और न ही कोई कर्म ! न इन्हें शर्म थी …न गैरत ! ये एक गिरोह था – जिस में भारत के ही नहीं विदेश के लोग भी शामिल थे . ये लोग ‘पावर गेम ‘ के खिलाड़ी थे . ये लोग सत्ता पलटना …और सत्ता कायम करना जानते थे ! इन की जड़ें बहुत गहरे में थीं ! 

मैंने पाया था कि इन्हें सत्ता और समाज के संचालन की पूरी समझ थी . इन्हें नेताओं को खरीदना और उन्हें बेचना आता था . इन्हें लोगों को गुमराह करने में महारत हासिल थी . सच की झूठ और झूठ को सच बना कर ….बेचना इन्हें आता था . इन्हें गधे को गाय बनाना …और हाथी को ऊँट साबित कर देना आता था . किसी भी व्यक्ति को ऊपर उठाना …या की उसे नीचे गिराना …इन के बांये हाथ का खेल था . काले से सफ़ेद लिख देना …इन्ही के बूते की बात थी ! 

लेकिन हाँ ! कीमत इन की अपनी थी ! और ये वसूल भी करते थे …फिर चाहे कोई हारे या जीते ? संहार से ले कर शान्ति बहाल करने तक ….के खेल के ये अचूक खलाड़ी थे ! 

सत्ता की छांह तले तीस्ता सीतलबाड़  के हर कर्म और कुकर्म के लिए स्थान था …आदर था ….नाम था …और इनाम भी था ! सेक्युलर होने के झंडे के नीचे बैठ मानवीयता का पाठ पढ़ती तीस्ता …अजर-अमर थी . उस की कहानी मैंने जितनी समझी थी ….वह इस तरह थी _ 

सेक्युलरिज्म की सब से बड़ी पैरोकार तीस्ता सीतलबाड़ ‘सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस ‘ एन जी ओ चलाने की आड़ में विदेशों के इशारों पर देश के खिलाफ काम कर रही थी ! तीस्ता सीतलबाड़ का एक ही मुद्दा था – मोदी को फंसाना ! इस के लिए वह सारे असली सबूत मिटा कर नकली सबूत पेश कर रही थी . और इस के बदले उसे मुंह मांगी रकम मिल रही थी ! 

गुजरात दंगों से पहले -जनवरी २००१ से दिसम्बर २००२ के बीच , तीस्ता सीतलबाड़ और उस के पति जावेद आनंद के यूनियन बैंक ऑफ़ इण्डिया में खुले खाते में …एक भी रूपया नहीं था ! लेकिन इस के बाद इन्होने खाते के बाद खाता खोला …धन-वर्षा हुई …और फिर तो करोड़ों के व्वारे-न्यारे हुए ! गुल वर्गा सोसाईटी के केस में तीस्ता ने सोसाईटी के पीड़ितों के लिए देश-विदेश से फण्ड लिया लेकिन उन्हें एक फूटी कौड़ी तक न दी ! निजी खातों को पैसों से नाक तक भरने के बाद …तीस्ता ने ट्रस्ट खोले …बेटी के नाम खाते खोले ….प्रॉपर्टी खरीदी ….और सब रंग कम्युनिकेशन फर्म तक  बना डाली ! 

मेरे सामने डिटेल्स और डाटा रखा है ! तीस्ता सीतलबाड़  ने जो लूट-पाट मचाई है …धन-वैभव संजोया है ….फरमें और संस्थाएं बनाई हैं …बेजोड़ हैं ! यहाँ तक कि गुल वर्गा सोसाईटी के मृतकों की याद में मैमोरियल बनाने के लिए इकठ्ठा किया धन भी तीस्ता सीतलबाड़ डकार गई है ! और अब मैमोरियल बनाने की टाल कर दी है ! 

और तो और तीस्ता सीतलबाड़  को देश-विदेश से मिले पुरुस्कारों की सूची भी बहुत लम्बी है ! इतनी लम्बी कि …मोदी तो क्या …कई मोदी भी सामने आएं तो भी परास्त हो जाएं ! और जो मोटी वह  रकम उन्हें मिल रही है …वह तो ….?

अंत में बताता हूँ कि –

अमरीका के मानवाधिकार उल्लंघन की पोल और दुनियां के राजनीतिज्ञों व् दौलतमंद व्यक्तियों की पोल खोलने वाला बैब साईट -विल्किंसन लिखता है कि – तीस्ता सीतलबाड़ और अमरीकन सरकार लगातार एक दूसरे के संपर्क में है ! और इस का सबूत है – अमरीका की  फोर्ड फाउंडेशन द्वारा २ लाख २० हज़ार अमरीकी डालर का तीस्ता को दिया पुजापा ? इस के आगे की फहरिस्त और भी लम्बी है ….

कहाँ तक नापेंगे …तीस्ता सीतलबाड़  को ….?

हाँ ! उन के नाम मैं नहीं बताऊंगा ..जिन से मेरी जान को असली जोखिम है ! ये लोग बहुत-बहुत अपने हैं ….जनता के भी प्रिय हैं ….देश के चहेते हैं …और वो हैं जिन का मैं भी कभी विश्वास पात्र रहा हूँ ! कुछ वो भी हैं जो मुझ से डर गए हैं ! और कुछ वो हैं ….जो …नहीं चाहते कि …..

आखिर ये लोग चाहते क्या हैं ? अब यही प्रश्न पैदा होता है !! 

“मोदी को मौत ….और अमित का अंत …!” इस प्रश्न का बेबाक उत्तर है ! 

और तभी मुझे रईस खान जैसे सच्चे देश वासियों की दुआओं का ध्यान हो आता है ! शायद मैं नहीं मरूंगा ! और न ही अमित का अंत आएगा ! और अगर हारने वाला कुछ है – तो वह है – अन्याय , गरीबी, भ्रष्टाचार और कुशाशन ! मैं और अमित मिल कर इस काम को अंजाम देने की शपथ ले चुके हैं ! चूंकि हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से कहीं नहीं जुड़े हैं …अतः हम हारेंगे नहीं !! 

मेरा मन कहता है – लोग हमारे साथ हैं ! देश हमें देख रहा है ! जनता को हम से उम्मीदें बंधी हैं ! आकाश खाली है ! वहां कोई ऐसा सितारा नहीं है ..जो उन के मन-प्राण को उजासों से भर दे ….आशा-दीप जला दे !!

उन की आँखें अब हमीं पर टिकी हैं !!

और हमें भी अब उन की आशाओं के अंत तक जाना होगा …उन की उम्मीदों तक पहुँचना होगा ….! परिणाम चाहे जो हो ….!!!

“इस हत्यारे डायर की जान मैं लूँगा !” घायल हुआ युवक ऊधम सिंह कह रहा था . वह देख रहा था …लाशों का जंगल …सिसकते – रोते बच्चे …औरतें —और दम तोड़ते पुरुष ! “सरेआम मारूंगा , इसे !” उस ने दांती भिंची थी . “इन बे-गुनाहों के खून का बदला …मैं लूँगा …! भारत अब बदला उतारेगा , डायर ! तुम कायर हो ….कमीने हो …! मैं तुम्हें माफ़ नहीं करूंगा ! परिणाम चाहे जो हो …..पर मैं ….” दादा जी ने मुझे अपांग देखा था . उन्हें लगा था शायद कि मैं ऊधम सिंह ही था …और अपना बदला उतार कर उन के पास आ बैठा था . “और बेटे ! ऊधम सिंह ने बदला उतार दिया था !”

“सच ….?” मैंने कूद कर पूछा था . 

“हाँ, सच !” दादा जी हँसे थे . “भारत का सच्चा सपूत था , ऊधम सिंह . सन १९४० में उस ने इंग्लेंड पहुँच कर …डायर को गोली मारी थी ! और ……” हंस रहे थे , दादा जी .

“और ….?” मैंने पूछा था . मैं नहीं चाहता था कि दादा जी अब चुप रहें . 

“और, बेटे  ! उसे फांसी की सजा मिली थी . फांसी चढते वक्त ऊधम सिंह ने कहा था – मेरा भारत मुझे देख रहा है ! लोग मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं ! मुझे फांसी से डर नहीं लगता . मुझे तो मौत भी मना रही है ! मैं आज प्रसन्न हूँ कि मैं आज ….फांसी चढ़ रहा हूँ !”

“किसी ने ….क्या किसी ने भी अंग्रेजों का विरोध नहीं किया , दादा जी …?” मैं स्वाभाविक प्रश्न पूछ बैठा था . 

“विरोध हुआ था , बेटे ! जम कर विरोध हुआ था !! समूचे भारत की आत्मा दरक गई थी . जलियाँ वाला बाग की इन न्रशंश हत्याओं ने पूरे जन-मानस को घायल कर दिया था ! पूरा -का-पूरा भारत टीस आया था !!”

“और अंग्रेज ….?” 

“हंटर कमीशन बिठा कर …प्रशाशन ने लीपा-पोती की थी ! कुछ सच …कुछ झूठ मिला कर कमीशन ने रिपोर्ट दी थी …जिस में दोनों पक्षों को दोषी ठहराया था ! और डायर को इस बात पर मुक्त कर दिया था कि …उस ने अंग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए थे …ताकि हम भारतीय कभी जुर्रत ही न करें …मुंह ही न खोलें ….गुलाम ही बने रहें ….उन के मातहत बन कर उन्हें युद्ध जिताते रहें …और उन के साम्राज्य को खुशहाल बनाते रहें ….”

“वो चाहते थे कि …हम गुलाम ही बने रहें ….?”

“हाँ ! उन का इरादा नेक न था ! उन के किए वायदे झूठे थे . द्वितीय विश्व युद्ध जीतने के बाद उन के तेवर ही बदल गए थे !”

“पर क्यों ….?”

“इस लिए ,बेटे कि ….तीतर के हाथ बटेर जो लग गई थी ? वो क्यों चाहते कि …इतना बड़ा देश उन के हाथ से निकल जाए ….? वो नहीं चाहते थे कि …सन सत्तावन जैसी गलती फिर हो …और वो यह भी नहीं चाहते थे कि …बंगाल जैसा विद्रोह फिर से हो ….! पंजाबियों और पठानों को तो वो नष्ट-नाबूद कर देना चाहते थे ! यही एक आखिरी रोड़ा रह गया था …उन के रास्ते का ! सो डायर ने सोचा कि …उस तरह के नर-संहार से उन की रूह काँप जाएगी ! फिर कोई जुर्रत ही न करेगा …कि मुंह खोले ….?” 

मेरी आँखों के सामने तब अंग्रेजी राज्य का यूनियन जैक फहर-फहर फहराने लगा था ! मैं देख रहा था – उन का साम्राज्य ….उन का वैभव ….और उन का हुनर और हुलिया ! कसाई जैसे गाय को काट रहा था …बाज़ ने कबूतर को फाड़ डाला था …गिद्ध ने मरे पशु की लाश में पंजे गाढ़ दिए थे ….और गीदड़ मरे नर-कंकालों को चबा रहे थे ! मेरी आँखों में विवशता के आंसू भर आए थे !! 

“हे , भारत ! मैं अगर रहा …तो तेरे दुःख अवश्य बांटूंगा ….!” मेरे भीतर एक आवाज़ उगी थी . 

“जलियाँ वाला बाग की ये घटना …एक सार्वजनिक दुःख बन कर …लोगों के बीच व्याप्त हो गई थी ! एक तथ्य था ये – जो तय हो चुका था ! एक निर्णय था – जो लिया जा चुका था !” दादा जी बताते रहे थे . 

“कौनसा …निर्णय …?” मैंने पूछ ही लिया था . 

“आज़ादी का निर्णय ! स्वतंत्रता का निश्चय !! स्वराज का स्वप्न …!!! सब तय हो गया था – अब …””

“पर कैसे ….??”  मैं भी जानने को उत्सुक था . 

…………………..

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!