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फिर बम मारा ?

viceroy lord hardinge

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास अंश .

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !!

सच कहूं , मैंने जाने-अनजाने कभी भी किसी भी मुसलमान का बुरा नहीं किया ! क्यों करता मैं – किसी मुसलमान का बुरा ….? मेरे लिए तो मेरे पूरे प्रान्त गुजरात की प्रजा एक सामान थी ….एक जात थी ….एक समूह थी – गुजराती ! और मैं हर गुजराती के भले-बुरे में शामिल था ! मैं तो उन सब का था ….सब में शामिल था ….और उन सब के साथ था ! 

फिर मुझे बांटा क्यों जा रहा था ….?

मुझे लगा  था – जैसे मेरी दो टांगों में से एक टांग हिन्दूओं ने पकड़ ली थी ….और दूसरी टांग को मुसलमानों ने जकड लिया था ! अब हिन्दू-मुसलमान की होती इस रस्सा-कसी में …मुझे दो दिशाओं में खींचा जा रहा था ! मुझे लग रहा था कि अब मेरे शरीर की दो फाड़ें हो जाएंगी ….और मैं मिट कर रहूँगा – इस दंगे में ?

सोला हॉस्पिटल के सिविल सर्जन की रिपोर्ट मेरे सामने थी –

५४ लोगों के शव २८ फरवरी की सुबह ३.३० बजे तक अस्पताल में पहुँच चुके थे ! उन का पोस्ट मार्टम हो चुका था . सोला हॉस्पिटल में शवों को बहुत समय तक नहीं रखा गया था . लेकिन खबरें तो पंख लगा कर उड़ रही थीं ….? 

एस आई टी की जांच का ब्यौरा भी मैं आप को दे दूं !

संजीव भट्ट की ई -मेल, मोबाईल व् कंप्यूटर की जांच से पता चलता है कि संजीव भट्ट किसी गिरोह के साथ संपर्क साधे हैं ! 

और यही श्री संजीव भट्ट अब मेरी जान के प्यासे थे !! 

सांप पालने का शौक मुझे कभी से न था ! लेकिन ये जहरीले नाग जो अब मेरे जानी दुश्मन बन मेरे शरीर से लिपटे जा रहे थे – मेरे न थे ! यह सब तो मुझे विरासत में मिला था ! सब का सब एक चलता चरखा था ….और इसी को अब एक मुख्य मंत्री के बतौर मुझे चलाना था ! मुझे उस सांचे में फिट होना था …जो किसी एक के लिए नहीं ….अनेकों के लिए बना था !  

एक बारगी इस मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठा – मैं एक अलग ही जीवन की झांकियां करने लगा था ! 

“ऐसा बांटा बईमानो ने कि ….आज तक जुड़ने की जुगत नहीं लग पा रही है !” मेरे दादा जी धूप में बैठ मुझे बता रहे थे . हम दोनों फुर्सत में थे . न मुझे कोई प्रयोजन था और न ही उन्हें ! अच्छी गुजर रही थी – हम दोनों की ! आस-पास बिखरा इतिहास भी हमारे ही पास आ बैठता था ! और फिर दादा जी कोई एक कहानी आरंभ कर देते थे ! “कितने चतुर थे ये अंग्रेज , नरेन्द्र ! मैं तुम्हें बता नहीं सकता ,बेटे ….!!” वह अपने हाथ हवा में फैंक रहे थे . “सब से पहले तो इन्होने बहादुर कौमों को पकड़ा ! फ़ौज में और पुलिस में भर्ती किया . और फिर पे, पेंशन …पर्क्स और प्रमोशन  के …इतने प्रलोभन दिए ….कि लोग बाबले हो गए थे ! अंग्रेजी राज ….और अंग्रेजी हुकूमत …अफीम की तरह असर करने लगी  ! कैरियर नाम की एक अलग से गोली तैयार की ! बस , आदमी अपना कैरियर बनाने के लिए औरों को भूल ही गया ! पूरी उम्र गुलामी में काट कर ….स्वामी-भक्ति के तगमे पहन ….पब्लिक में सीना तान कर घूमता ….कहता – साब बहादुर ने मुझे ये दिया …..और मैंने साब बहादुर से हाथ मिलाया ….तो साब बहादुर ने …..” रुके थे , दादा जी . 

“आप भी तो मिले होंगे …इन साब बहादुरों से , दादा जी ….?” मैंने चुहल की थी . 

“हाँ ! मिला था !!” वो तनिक विहंसे थे . “लेकिन उन को मेरी जड़ों तक का हाल पता था….और मेरी तो जान भी उन की मुट्ठी में थी ! पर मुझे जिन्दा रखना था – अंग्रेजों ने ….एक ठिकाने की तरह ! अनुशीलन समिति और जुगंतर का वो मुझे चलता-फिरता एनसाईक्लोपीडिया मानते थे ! मेरी पैनी नज़र देखती रही थी कि ….किस तरह अंग्रेजों ने राजे-रजवाड़ों को गुलाम बनाया ….और फिर जनता पर राज करने के लिए तीन पत्ते तैयार किए !”

“कौन से पत्ते , दादा जी ….?” 

“आई पी एस , आई ए एस …..और आई ऍफ़ एस …..!” उन्होंने बताया था . 

“मतलब …..?”  

“मतलब कि ….सिविल नौकरियों में श्रेष्ठ ! इन्डियन पुलिस, एडमिनिस्ट्रेशन और विदेश सेवा के लिए …चुने गए भारतीय …वो ईजाद किए नुस्खे थे जो अंग्रेजी शाशन का पूरा कार्यभार संभालते थे ..उसे चलाते थे ….और अपने ही देश और देश वासियों के साथ गद्दारी करते थे !” दादा जी गरजे थे .

मैं भी अपनी छोटी बुद्धि को बड़ा कर कुछ सोचने लगा था ….कि आखिर अंग्रेज इतना बड़ा तंत्र जुटा कैसे पाए होंगे ….? कैसे एक सामंजस्य बिठाया होगा ….कि देश का हर नागरिक …उन का भक्त था ….?

“एक हाथ को दूसरे हाथ का पता ही न होता था ….,नरेन्द्र !” दादा जी ने खुलासा किया था . “जो भी होता था – उस की एक ही दिशा और परिणाम होता था ! और उस पर उन की गिद्ध द्रष्टि टिकी होती थी . धूल में से मुनाफे की कौड़ी ढूंढ निकालना ….अंग्रेजी दिमाग का ही कमाल था !”

“जैसे …….?” मैं जिज्ञासू था . 

“अरे, भाई ! जब ये लोग आए थे ….तो ….छोटा-मोटा व्यापार ही तो करते थे ….? लेकिन जब ये देश में घुसे तो इन की तो आँखें फटी की फटी रह गईं !”

“क्यों ….?” 

“क्यों कि …ये लोग तो छोटे से देश से चल कर आए थे ! और यहाँ आ कर इन्होने देखा ….हिमालय …गंगा -जमुना का डेल्टा ….पंजाब का वैभव ….राजिस्थान का विस्तार ….दखन का पठार …और मीलों लम्बा समुद्र तट ….! एक सम्रद्ध भारत इन के सामने नंगा खड़ा था ! दीन-ईमान के लोग थे -भारतीय ! धर्म परायण समाज था ! संतोष के साथ हिल-मिल कर रहता जन-मानस था ! और थी -विपुल सम्पदा …प्राकृतिक और संस्कृतिक वैभव ! और थे वेद  ….और था आयुर्वेद …संस्कृत जैसी परिष्कृत भाषा …और खनिज पदार्थों के अपार भण्डार ….जंगल …पहाड़ …और खाली पड़ा खुला आसमान !” दादा जी के आँखें अब समग्र भारत को देख रहीं थीं . 

“तो …..?”

“तो , क्या ….? इन की नीयत में खोट आ गया ! ये बंगाल को बाँट कर …दिल्ली चले गए …और पूरे देश के मालिक बन बैठे ! सब हथिया लिया , बैईमानों ने !” दादा जी अब मुझे बड़े ही ध्यान से देख रहे थे . “नई दिल्ली की बसावट देखोगे तो जानोगे कि कितने चतुर थे , अंग्रेज ….? सारे राजे-रजवाड़ों को बुला कर धन लिया ….उन से भी महल-तिबारे बनाने को कहा …और स्वयं भी स्थापित हो गए ! अब क्या था ….? मजाल थी ….कि बिना उन की नज़र के पत्ता तक हिल जाता ….?”   

“लेकिन ….पत्ते तो क्या ….पेड़ तक हिले थे …., दादा जी …..?”मैंने जो सुना था पूछ लिया था . 

“हाँ, हिले थे ! मैं मानता हूँ , नरेन्द्र कि तुम जानते हो कि …..पेड़ तक हिले थे ! लेकिन कैसे ….?” 

“ये मैं नहीं जानता !”

“मैं जानता हूँ !” हंस पड़े थे , वो ! “अरे, पागल ! बंगाली भी इन के पीछे-पीछे दिल्ली पहुँच गए ! बंगालिओं को बताया था कि पूरे भारत में चिनगारी लगा दो ….तो ….काम बनेगा . और जब तक उत्तर भारत में आग नहीं जलेगी तब तक ….आज़ादी की आस पूर्ण नहीं होगी !”

“कैसे लगाई आग , दादा जी ….?”

“कुछ होनहार भी बलवान होती है , नरेन्द्र ! तभी कुछ ग़दर पार्टी के लोग भारत लौटे थे . उस समय प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो चुका था ! अंग्रेजों को फिकर पड़ी थी – बाहर युद्ध जीतने की . भारतीय सैनिकों की टुकड़ियाँ इन के लिए बाहर विदेश में जा-जा कर युद्ध लड़ रहीं थीं . छावनियां खाली पड़ीं थीं . जो सैनिक पीछे छूट गए थे …वो नफरी में बहुत कम थे . छावनियों में आना-जाना आसान हो गया था !”

“इस से क्या लाभ था , दादा जी ….?” 

“लाभ ये था …, बेटे कि ..अगर ये सैनिक ….किसी तरह सन १८५७ की तरह ….विद्रोह कर देते तो ….अब काम आसान था ! जब तक अंग्रेज लौटते …तब तक देश आज़ाद हो जाता !!” दादा जी चुप थे , दम ले रहे थे . “पर ये संभव न हो सका था . ये लोग भी बहुत चौकन्ना थे . इन्हें भी तो १८५७ के सबक याद थे …?”

“फिर ….?”

“फिर तो …वही – धूम=धडाका !”

“फिर से बम मारा ….?” मैं उछल पड़ा था . “किस पर मारा …?” मैं पूछ रहा था . 

“बताता हूँ , रे !” दादा जी भी प्रसन्न थे . हम दोनों ही अब बहुत प्रसन्न थे . न जाने क्यों हम बार-बार इस आज़ादी के युद्ध को जीत लेना चाहते थे और हर बार अंग्रेजों को नीचा दिखा कर ,’मेरा भारत महान!’ का नारा स्वयं ही लगाते थे !

“लार्ड हारडिंगस  ….दिल्ली में बायसराय बना बैठा था !” दादा जी बता रहे थे . “बड़ा ही शातिर आदमी था , ये !” दादा जी की आँखों से आश्चर्य उमड़ पड़ा था . “युद्ध जीतने के लिए ये आदमी भारत के जन-धन से खेल रहा था ! मुफ्त के लोग मरने के लिए मिल रहे थे …. और बिना ब्याज का पैसा बटोर-बटोर कर इंग्लेंड भेज रहा था ! पुलिस का आतंक इतना बढा दिया था कि लोग चूहों की तरह पुलिस को देखते ही बिलों में घुस जाते थे ! गाँव में पुलिस पहुंचते ही दरवाजे बंद हो जाते थे !”

“क्यों ….?” 

“क्यों कि ये पुलिस नहीं …राज के डाकू थे ! जन-धन जो भी मिले ….हथिया कर अंग्रेज आकाओं के चरणों में अर्पित कर देते थे !”

“क्यों ….?” मैं अब अधीर था . 

“अरे, पागल ! इन्हें मोटी पगार मिलती थी ….उन के कैरियर बनते थे …..उन के साहिब प्रसन्न होते थे …! सत्ता में इन्होने भी साझा कर लिया था , नरेन्द्र !” दादा जी अब चुप थे …..दुखी थे …..ग़मगीन थे …..! 

कहानी एक दुखांत मोड़ पर आ कर खड़ी हो गई थी !! 

…………….

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!