शनिवार की शाम थी। उत्सव अपने उत्कर्ष पर था। परम सुंदरी गुलनार के हुस्न को स्वामी जी की निगाहों ने घूंट-घूंट कर पिया था। मन था कि गुलनार के प्रेम सागर में डूब-डूब कर नहाया था। इतने अंतराल के…