“नहीं, नहीं, नहीं!” वंशी बाबू पागलों की तरह चीख रहे थे। “इस बार मैं मैदान छोड़कर नहीं भागूंगा!” वो शपथ ले रहे थे। “भाग जाएं सब! भाग जाए शास्त्री! वंशी नहीं भागेगा!” उनका एलान था। “मैं अमरपुर आश्रम…