“ए बाई! इधर पोंछा तो छूट गया!” मैं बीमार, बेहोश बिस्तर पर पड़ी-पड़ी आवाजें सुनती। गुलनार बताने लगी थी। “ये क्या रे? तुम को तनिक भी शऊर नहीं बाई!” घर की मालकिन डाटने लगती। “गीले कपड़े से बर्तन पोंछ…