पंडित जी को शाम को मंदिर से विदा करने के बाद राम चरन अकेला ही मालिक होता था। मन प्राण में एक आह्लाद भर आता था। एक बेजोड़ कामयाबी जैसी भावना उसके भीतर भरती ही चली जाती थी। उसे लगता था – ढोलू…