देर रात घर लौटी सुंदरी सोच रही थी – प्यार .. नहीं-नहीं – उन्माद .. नहीं-नहीं निरा पागलपन! पहली बार सुंदरी को इस पागलपन की अनुभूति हुई थी। महेंद्र के साथ तो .. प्यार था! लेकिन कभी-कभी औरत ही आवारा हो जाती है, पागल हो जाती है और सब कुछ हार जाती है – मात्र एक पुरुष को पा जाने के लिए!