राम चरन, काशी में एक परियोजना के सिलसिले में आया था, जहां उसने आचार्य प्रहलाद से मुलाकात की। वो काशी के जीवन, उसकी संस्कृतियों से प्रभावित रहा। राम चरन की संघमित्रा से जुड़ी यादें और हिंदू राष्ट्र के भविष्य की चिंताएं उसके मन में उथल-पुथल पैदा करती रहीं, और उसने काशी के वैभव को मिटाने की ठान ली।