खानदान 62

खानदान 62

घर में ज़मीन बेच-बेच कर अच्छे पैसे आ रहे थे.. रमेश का एन्जॉयमेंट भी अच्छा चल रहा था। अब ऐसे ज़मीन बेच कर आए हुए पैसों से घर तो सुनीता का बसना ही नहीं था.. और वैसे भी एक-एक रुपये की ख़बर दर्शनाजी के पास थी.. आख़िर सासू-माँ उस्तादों की उस्ताद थीं.. रमेश के पैसे उड़ाने...
सहायक  कानू

सहायक कानू

बचपन एक ऐसी चीज़ होता है.. जो इंसान कभी नहीं भुला पाता। बचपन की वो खट्टी-मीठी यादें.. यादों में हमेशा के लिये अमर होकर रह जातीं हैं। हमें भी हमारा अनमोल बचपन अक्सर याद आता है.. और फ़िर बहुत देर के लिये हम अपनी मीठी यादों में खो-कर रह जातें हैं। बचपन भी कभी-कभी ही हमसे...
और तुम चलीं गईं

और तुम चलीं गईं

बहुत सी बातें करनी थीं, तुमसे और तुम चलीं गयीं, मन की मन में ही रह गई और तुम चलीं गयीं, मन होता है लेने आऊँ तुमको बिन बताये न जाने कहाँ पर तुम चलीं गयीं, न जाने क्या सोचा तुमनें कुछ भी न कहा, और तुम चलीं गईं क्या सोच रहीं थीं? कह तो देतीं! मुड़ कर एक बार देख तो लेतीं,...
खानदान 62

खानदान 61

घर मे वही माहौल था.. आधे दिन सास की चिक-चिक, सुनीता का दिमाग़ इसी तैयारी में लगा रहता था.. नीचे जाकर कौन सी बात का क्या जवाब देना है। बच्चों में शाम हो जाया करती थी.. शाम होते ही रमेश के माँ की सीख के हिसाब से नाटक शुरू हो जाया करते थे,” रमेश आज या फ़िर उस बिल्ली ने...
खानदान 62

खानदान 60

सुनीता पिताजी की कोई भी मदद न होने के कारण बहुत ही दुखी हो गई थी। मायका मुसीबत में होने के कारण चाह कर भी कोई भी मदद नहीं कर पा रही थी, सुनीता अपने परिवार की। अंदर ही अंदर बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी.. सुनीता को। “ रमेश बता रिया था.. चौधरी.. दो लाख रुपये मांगें...