बिस्तर पर ध्यान मग्न बैठे मोहन मकीन को अमेरिका से लौटी विभूति ने आंखें भर-भर कर देखा था।
आई आहट से सचेत हो मोहन मकीन ने आंखें खोली थीं। सामने खड़ी अपनी प्रिय बेटी विभूति को उन्होंने फौरन पहचान लिया था। विभूति ने भी देखा था कि उसके महान पापा मोहन मकीन की आंखों में जो स्नेह की चंद्र कलाएं उगी थीं, वो बेजोड़ थीं। उनके चेहरे पर धरा नूर उद्भासित हुआ था। उनका सारा शरीर गतिमान हो गया था। हाथ कांपने लगे थे। जुबान बोलने के लिए तड़प गई थी। विभूति ने आगे बढ़ कर उन्हें छूआ था। और उठे उद्वेग को शांत किया था।
“आराम कीजिए।” विभूति ने भर्राए कंठ से आग्रह किया था।
बिस्तर पर लेट गए मोहन मकीन के माथे को अपनी सुघड़ उंगलियों से सहलाती विभूति बेटी का दायित्व अदा कर रही थी। उसकी आंखें सजल थीं। दिमाग में पितृ प्रेम के उन्माद का तूफान उमड़ आया था। पहली बार विभूति ने महसूसा था कि मां के जाने के बाद पापा उसकी शरण में लौट आए थे। अब वो शांत थे।
“थोड़ा-थोड़ा भोजन करने लगे हैं।” कदम ने विभूति को सूचना दी थी। “दाल, खिचड़ी और फलों का सेवन कर लेते हैं।”
“गुड!” विभूति के मुंह से निकला था। “कदम …” विभूति का मन भर आया था। “तुम्हारा ये बहुत बड़ा उपकार है भइया।” उसका गला रुंध गया था। “ये स्नेह भी भारत में ही मिलता है।” उसने अमेरिका को जैसे एक उलाहना भी दिया था। “वहां तो …” विभूति ने आंखें पोंछ ली थीं।
“अब ठीक हो जाएंगे।” कदम मुसकुराया था। “दान का मान तो परमात्मा रखते हैं।” कदम ने जीवन का सारांश कहा था।
अचानक ही विभूति को अपने पापा के जीवन दाता स्वामी अनेकानंद याद हो आए थे। एक उत्कट इच्छा प्रकट हुई थी। वह उठी थी और उनकी तलाश में पर्ण कुटीर पहुंची थी। लेकिन वहां तो पट बंद थे। वीराना था। खामोशी थी। आश्रम भी खाली-खाली था। होटल में भी उसे पहले जैसी चहल-पहल न दिखी थी।
“माजरा क्या है?” सामने आए कल्लू से विभूति ने सीधा प्रश्न पूछा था।
“विपासना पर हैं। जब तक सिद्ध न हो लेंगे, नहीं लौटेंगे।” कल्लू ने सूचना दी थी।
विभूति का तन मन कमल सा खिल गया था।
स्वामी अनेकानंद की उज्ज्वल धवल पिंडी उसे भक्क से दिखाई दे गई थी। कैसा तेजोमय चेहरा था – स्वामी अनेकानंद का। आंखें जैसे दिव्यता बांटती दो परियां थीं। एक हल्की सी मुसकान जैसे अमरता बांटती थी। और आशीर्वाद देने उठा उनका हाथ …
“क्या लिखे अपनी मित्र मीरा मर्फी को?” विभूति के सामने प्रश्न था। वह अमेरिका छोड़ने से पहले उससे वायदा कर आई थी कि जाते ही उसे भारत बुलाएगी और स्वामी अनेकानंद से मुलाकात कराएगी। “क्या कहूं? कैसे कहूं?” विभूति सोच में पड़ गई थी।
“कब तक कल्लू जी …?” विभूति ने सामने खड़े कल्लू से ही प्रश्न किया था।
“ये बताने की बात नहीं है मैडम।” कल्लू ने घोर उदासी के मध्य से कहा था। “ये तो दैवीय संवेदनाएं हैं।” कल्लू का उत्तर था। “कहो तो कल … और कहो तो …” कल्लू चुप हो गया था।
“स्वामी तप पर बैठे हैं।” विभूति ने मित्र को लिखा था। “प्रकट होंगे तो मैं सूचना दूंगी। अलौकिक लोग हैं। इन्हें संसारी मोह नहीं सताते, मीरा। तेरा संस्कार होगा तभी काम सिद्ध होगा, मेरी बहन।” तुम्हारी अपनी विभूति।
होटल में अभी भी कुछ श्रद्धालु इंतजार में बैठे थे। कुछ आश्रम में भी धरना दिए थे। कुछ के लिए तो रोज-रोज खबर लेने आना एक मजबूरी थी।
और अब मीरा मर्फी अमेरिका में बैठी-बैठी स्वामी अनेकानंद से मिलने के लिए बेचैन थी।
भौतिक दुनिया की धूम ने अमेरिका में तहलका मचा दिया था। प्यासे मरते इंसानों को अब पानी कहीं नजर न आ रहा था।
“मैं और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती विभूति।” मीरा मर्फी ने पत्र में लिखा था। “आई एम डाइंग टू मीट समवन लाइक स्वामी अनेकानंद वैरी सून।” उसका खुलासा था। “अंकल मोहन मकीन की तरह ये भौतिक दुनिया का बुखार मेरी नस-नस में तारी होता चला जा रहा है। तू मानेगी नहीं विभूति कि मैं इस धन के महा उदधि में नाक तक डूब चुकी हूँ। मुझे कुछ नहीं सुहाता अब। अब मैं और मेरा मन पपीहे की तरह घिर आए बादलों से गुहार लगा-लगा कर एक बूंद पानी मांग रहा है। कब मिलेगी मुझे पानी की ये बूंद कुछ तो बताओ विभूति?”
मीरा का पत्र पढ़ कर विभूति थर्रा गई थी। पापा भी तो उसी तरह डूबे थे – वह जानती थी।
“मुझे एक पुरुष चाहिए विभूति।” मीरा का स्पष्ट बयान था। “एक ऐसा पुरुष जो …” मुक्त हो कर मीरा ने सब कुछ लिखा था।
विभूति को फिर से स्वामी अनेकानंद का दिव्य स्वरूप याद हो आया था।
“अलग ही आदमी थे स्वामी अनेकानंद।” विभूति को याद आ रहा था। “एक ऐसा आदमी जो अकेला ही आसमान पर ऊंचा टंगा था। बहुत ऊंचा। किसी का भी उठा हाथ उसे छू नहीं सकता था। तभी तो उसने स्वामी अनेकानंद को अपना गुरु मान लिया था। वह तो उनकी शिष्या थी जिसे उन पर पूरा-पूरा भरोसा था। अब मीरा का मन मीरा जाने। आदमी तो आसमान पर लटका है – फॉर ए फ्री फॉल। किसकी झोली में आ कर गिरेगा – कौन जाने?
बर्फी भी तो आस निराश हो कर लौट गई थी। उसे बीस हजार पाने की खुशी से ज्यादा आनंद को गंवाने का गम था।
“जुड़ो स्वामी जी से …” विभूति का अंतर बोला था। “कुछ – कुछ ऐसा अभियान छेड़ो जो सीधा-सीधा उनके चरण कमलों को छूए?” विचार एक शुभ संदेश की तरह विभूति के दिमाग में कौंधा था। “इससे पहले कि स्वामी जी अपनी साधना संपूर्ण कर बाहर आएं उनका नया अबोड – माने कि नई पर्ण कुटीर आश्रम में तैयार हो जानी चाहिए। और यही मुबारक मौका होना चाहिए जब वो और मीरा – दोनों दोस्त स्वामी जी से मिलें। मीरा अपने लिए मांगे और वो पापा के लिए।” विभूति की मांग पर प्रश्न चिन्ह जैसा लग गया था।
“आज नहीं तो कल तुम्हें कुछ तो अपने लिए भी मांगना ही होगा।” किसी ने विभूति के कान में कहा था। “अगर मां होती तो पापा इस तरह कभी न डूबते।” विभूति को याद था। “पुरुष नारी की एक बुनियादी फरमाइश है। और नारी नर के लिए एक अनिवार्य मुकाम है जहां वह विश्राम करता है, श्रम मिटाता है, सुख पाता है, दुख बांटता है और स्वस्थ हो कर जीत हासिल करने के लिए निकलता है। अकेले-अकेले तो पंछी भी बहक जाता है।” सच्ची राय थी जिसे विभूति मान गई थी।
विभूति प्रसन्न थी। उसे अपना काम याद आ गया था।
“मल्लू महाराज।” हंसते-हंसते विभूति कह रही थी। “तुम्हें एक पर्सनल काम सोंपती हूँ।” विभूति ने सामने खड़े गोल-मटोल मल्लू महाराज को पढ़ा था। मल्लू काम का आदमी था – वो जानती थी। “स्वामी जी की पर्ण कुटीर सबसे पहले तैयार कराओ।” विभूति ने आदेश दिए थे। “पैसा नो बार, टाइम नो बार, नो छुट्टी, नो डिले।” विभूति की आवाज में एक अलग ही खनक थी। “और पर्ण कुटीर भी ऐसा कि स्वामी जी की तरह अलौकिक रचना ही हो।”
“आपका हुक्म कभी टाला है बहन जी?” मल्लू महाराज अपनी आदत के अनुसार हंस रहा था। “हम तो आपके गुलाम हो गए हैं।” उसका कहना था।
“और मैं स्वामी जी की गुलाम हो गई हूँ।” विभूति कहना चाहती थी। “और अब मीरा मर्फी का क्या होगा – राम जाने।” वह जोरों से हंस पड़ी थी।
जोड़े कहीं बनते तो हैं – शायद अनंत में कहीं।
विभूति हिसाब लगाती रही थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड