नब्बो बकरी चराने नहीं आई थी। धीरज बेचैन था। वह बार-बार गांव की ओर देख रहा था। खेत में काम करने का उसका मन ही न कर रहा था।
धीरज चिंता मग्न था। क्या हुआ जो नब्बो नहीं आई – वह जानने की जिज्ञासा से लड़ रहा था। उसे बुरे-बुरे खयाल सता रहे थे। क्या उनके प्यार की खबर गांव वालों को लग गई थी? क्या नब्बो को और कुछ हो गया था?
“इस तरह नहीं सर!” राधू ने मानस को टोका था। “धीरज की प्रेमिका गायब है। ये मिलन विछोह का मामला है। एंड इट इज सीरियस। तनिक मुसकुराया था राधू रंगीला। “हवाइयां उड़नी चाहिए आपके चेहरे पर। ये क्लोजअप सीन है। दर्शकों को दिखाना है कि आप …”
“कोशिश करता हूँ।” मानस मान गया था।
इसके बाद कैमरा रिफ्लैक्स के लिए दलदल पर पहुंचा था और फिर झरने पर आ कर रुक गया था। धीरज नब्बो को देख रहा था। कैसे दलदल से निकाल रहा था नब्बो को? कैसे वह झरने के नीचे खड़ी हो कर नहा रही थी ओर कैसे वो दोनों आलिंगन बद्ध …
अब धीरज खड़ा-खड़ा गांव की ओर देख रहा था। उसकी निगाहों में इंतजार था। शायद नब्बो अभी चली आए …
इसके बाद चाय का लंबा ब्रेक हुआ था। मानस के लिए बहुत थकाने वाला दृश्य था। अगला दृश्य सूरज डूबने पर आरंभ होना था। अंत में धीरज अंधेरा होने पर घर लौट रहा था। अंधेरा उससे लिपट-लिपट कर प्रेम विछोह की बात संकेतों में बता रहा था।
रात भर धीरज न सोया था इसे एक बार में एक साथ राधू रंगीला ने कैद किया था।
सूर्योदय का दृश्य था। धीरज खेत पर जा रहा था। चेहरे पर तनाव था।
भेड़ बकरियां खेतों में चरने आ रही थीं। धीरज का मन उछल-उछल गया था। नब्बो आ रही थी – उसे जंच गया था। लेकिन जब बकरियां चराने एक लड़का पहुंचा था तो धीरज का मन बैठ गया था। हे राम – कह कर धीरज जमीन पर लेट गया था।
राधू रंगीला ने इस दृश्य को बड़ी सावधानी से फिल्माया था। प्रेमी की परम व्यथा का संपूर्ण इजहार इसी एक संवाद में था।
शाम ढल रही थी। लड़का भेड़ बकरियों को गांव लिए जा रहा था। धीरज उसका पीछा कर रहा था – चुपचाप। भेड़ बकरियां गांव में घुसी थीं। फिर बाड़े में चली गई थीं। लड़के ने बाड़े को बंद किया था। मुड़ा था तो धीरज उसके सामने खड़ा था।
लड़का सहमा था। डरा था। लेकिन धीरज ने उसकी हथेली पर दस रुपये का नोट रख दिया था।
“नब्बो कहां है?” धरज ने आहिस्ता से लड़के को पूछा था।
लड़का घबराया हुआ था। धीरज ने उसे मना लिया था।
“उधर।” लड़के ने सामने बने एक कच्चे कमरे की ओर इशारा किया था। कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था।
लड़का चला गया था। धीरज ने अंधेरा होने का इंतजार बाड़े की ओट में बैठ कर किया था। वह चाहता था कि चुपचाप मिले नब्बो से।
अंधेरा आ कर न दे रहा था – धीरज महसूस कर रहा था।
राधू रंगीला ने इन इंतजार के पलों को बड़ी ईमानदारी से कैमरे में कैद किया था।
एक लड़की चली आई थी। उसके हाथों में खाने की थाली लगी थी। धीरज समझ गया था कि वो नब्बो के लिए खाना लाई थी। उसने आहिस्ता से कमरे की कुंडी खोली थी और खाना लेकर भीतर चली गई थी। धीरज तनिक संभला था। सोचा – तनिक ठहर कर चलेगा ताकि नब्बो खाना खा ले।
खाना देकर आई लड़की बाहर से कुंडी लगा कर लौट गई थी।
अंधेरा सरकने लगा था। धीरज का उत्साह चरम पर था। वह चुपके से उठा था और कमरे के पास जा लगा था। चारों ओर निगरानी कर उसने आहिस्ता से कमरे की कुंडी खोली थी। सावधानी से वह बिना कोई खटका किए कमरे में धंसा था। उसने कमरे के अंदर जा कर भीतर से कुंडी लगा ली थी।
जैसे ही वह मुड़ा था नब्बो ने उस पर धावा बोल दिया था।
अंधेरे में नब्बो धीरज को पहचान न पाई थी। उसने सोचा कोई था जो मौके का फायदा उठाने अंदर आ गया था। और अब उसकी लाज लूटेगा। हुए हमले को रोकता टोकता धीरज घबरा गया था। उसने अपना बचाव किया था फिर भी नब्बो ने उसे कई स्थानों पी दांतों से काट लिया था और वह लहू लोहान हो गया था।
“मैं .. मैं धीरज हूँ पगली।” आहिस्ता से धीरज ने नब्बो के कान में कहा था।
नब्बो ने मुड़ कर देखा था। धीरज को पहचाना था। फिर वो धीरज से लिपट गई थी। खूब रोई थी। धीरज उसका माथा सहलाता रहा था।
“मेरा ब्याह कर रहे हैं।” नब्बो बताने लगी थी। “मैं … मैं मर जाऊंगी धीरज लेकिन …”
“मैं आ गया हूँ न!” धीरज ने फुस्स-फुस्स आवाज में कहा था।
कमरे में शांति लौटी थी। वो दोनों संयत थे, चुप थे और किसी धुन बुन में थे।
“क्या करोगे?” नब्बो ने बड़ी देर के बाद प्रश्न किया था।
“तुम्हें भगा कर ले जाऊंगा।” धीरज ने हौले से कहा था।
“कहां? तुम्हारे घर वाले तो मुझे भीतर भी न घुसने देंगे।” नब्बो ने सच्चाई कह डाली थी।
धीरज भी यह जानता था। वह जानता था कि उसका परिवार कभी भी नब्बो – गरीबा की बेटी नब्बो को अपनी बहू नहीं बनाएगा।
“हम कहीं भी भाग चलते हैं नब्बो। कहीं भी, कहीं बहुत दूर। वरना तो ये लोग हमें जीने नहीं देंगे – मैं यह जानता हूँ।”
कई पल चुप्पी में बीते थे। दोनों भाग कर जाने की मुहिम पर मोहर लगा बैठे थे।
“भाग चलें?” नबबो का प्रश्न आया था। वह प्रसन्न थी।
“भाग चलते हैं।” धीरज भी मान गया था।
“खाना खा कर चलते हैं।” नब्बो हंसी थी। “न जाने क्यों धीरज मुझे तुम्हारे आने का इंतजार था। तभी मैंने खाना नहीं खाया था। मैं खिलाती हूँ तुझे।”
“चल, मैं भी खिलाता हूँ तुझे।” धीरज भी हंस पड़ा था।
दोनों ने बड़े लाढ़ से एक दूसरे को खाना खिलाया था और लगा था जैसे इन दोनों प्रेमियों ने समाज में फैले विष व्यापार का अंत ला दिया था।
राधू रंगीला ने दृश्य को टुकड़ों-टुकड़ों में फिल्माया था। संदेशा दिया था युवा पीढ़ी के लिए कि वो विद्रोह करें और युवतियों के प्रति जवाबदेही ओटें।
धीरज ने कमरे की कुंडी खोली थी। दोनों चुपचाप कमरे से बाहर आए थे। अंधेरा था। रात का सन्नाटा था। धीरज ने कमरे की कुंडी बाहर से बंद कर दी थी ताकि किसी को शक न हो।
आजाद हुए दोनों पंछी पंख फैला कर उड़े थे।
कहां जाना था – उन्हें पता थ था।
राधू रंगीला का कैमरा लंबे पलों तक उन्हें अंधेरे में खोजता रहा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड