Posted on

वो हारे नहीं थे !

rasbihari bose

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी !

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

उपन्यास अंश :-

“फिर जुगांतर के लोगों ने ही सूझ फेंकी थी ! अलीपुर बम काण्ड के बाद वहां का माहौल ठंडा पड़ गया था . अंग्रेज भी दिल्ली आ गए थे . तब हमला दिल्ली में ही हो – की बात तय हुई थी . और हमला  बायसराय पर ही हो – यह भी तय हो गया था . लेकिन काम कठिन था …..”

“बहुत कठिन !” मैंने भी स्वीकारा था . “पर हुआ कैसे , दादा जी …..?” 

“हुआ था , नरेन्द्र !” अब दादा जी प्रसन्न हो कर बता रहे थे . “जुगांतर के सदस्य अमरेन्द्र चटर्जी और जतिन मुखर्जी ने एक खज़ाना खोज लिया था ! उत्तरी भारत मैं उन्होंने एक ऐसा आदमी तलाश लिया था – जो बेजोड़ था !”

“कौन था , दादा जी ….?” 

“रासबिहारी बोस ….!!”

“ये कौन थे ….?”

ये एक बहुत बड़े ….स्वतंत्रता सेनानी ….और युग द्रष्टा थे , नरेन्द्र !” दादा जी तनिक उलम कर बैठ गए थे . “क्या आदमी था ……क्या दिमाग था ……इस का ….और …क्या सोच था …? इतनी छोटी उम्र में ….उस तरह के कारनामे कर दिखाना ….कोई मज़ाक बात नहीं है , बेटे …?” दादा जी एक गर्व मैं गर्क थे ! “रासबिहारी बोस को जिम्मा मिला था कि …  वो उत्तरी भारत में आज़ादी की मशाल जलाएं ….और लार्ड हार्दिंग्स जैसे आताताइयों को ….बम मार कर धराशाई कर दें !” दादा जी की आवाज़ अब ऊंची थी . 

“ये ….संभव कैसे हुआ , दादा जी ….?”

“लार्ड हार्दिंग्स की सवारी निकलती थी – हाथी पर बैठ कर ! वो और उस की पत्नी …दिल्ली मैं चांदनी चौक से गुजर कर ….एक पूरी परिक्रमा पर जाते थे ! सवारी के निकालने का मतलब ….मातहत हिन्दुस्तानियों को …मानसिक रूप से परास्त करना था ! उन्हें ये बताना था कि ….अब उन के ‘आका’ अंग्रेज शाशक थे ! देश के मालिक वो थे ….और कोई नहीं !! उन्हीं के दबदबे के बयान और फरमान जारी होते रहते थे ! और चांदनी चौक से बायसराय की सवारी निकलने के कई अर्थ थे ….”

“जैसे कि …..?” मैंने पूछा था . 

“पब्लिक को ये बताना कि …भारत में हुकूमत अंग्रेजों की है …..भारत का भविष्य अब उन के हाथ मैं है ….! उन की खिलाफत करने से कोई फायदा नहीं ! उन का साथ देने में ही लाभ है !! ताकि देश हमेशा-हमेशा के लिए उन की गुलामी स्वीकार लेता ….और ….”

“हूँ ….! अब समझा …..!!” में भी अब उचक कर बैठ गया था . “फिर ….बम …..?” में फिर से अधीर हो उठा था . 

“रासबिहारी बोस देहरादून स्थित फौरेस्ट इंस्टिट्यूट मैं हैड क्लर्क थे ! बचपन से ही उग्र स्वभाव के थे ! अंग्रेजों के बढ़ते आतंक से बेखबर न थे ! और जब जतिन ने उन्हें बम मारने की बात बताई तो …..उछल पड़े ! बोले , ‘में मारूंगा , बम ! दादा !! बोलो कब ….? बोलो कैसे ….? ये बायसराय तो मरना ही चाहिए ….!! अंग्रेजों का अंत तो आना ही चाहिए …..! में तो कब से सोच रहा था कि ….”

फिर दादा जी ने बताया था कि वह बायसराय पर बम मारने की योजना ….बड़े ही जतन के साथ तैयार हुई थी . तब ग़दर पार्टी के सदस्य भी उत्तरी भारत मैं …अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने मैं लगे थे ! पर उन के पास कोई अच्छा लीडर न था ! रासबिहारी बोस ने इन्हें भी साथ लेने की सोच ली थी ! 

२३ दिसंबर १९१२ को बायसराय की सवारी निकल रही थी . चांदनी चौक ही एक उपयुक्त स्थान था ….जहाँ उस हाथी पर सवार …दम्पति पर बम फैका जा सकता था ! रासबिहारी बोस ने इस काम के लिए दो व्यक्ति चुने थे – अवधबिहारी बोस और दूसरे थे – बसंत विश्वास ! इन दोनों को खूब महनत के साथ बम फैकने की कला मैं दक्ष बनाया गया था ! सब सदस्य चाहते थे कि ….बायसराय बचे नहीं ! उस की मौत तो सभी को चाहिए थी !!  

उस दिन चाँदनी चौक मैं जमकर भीड़ थी . पूरा भारत ही जैसे अपने आका के दर्शन करने के लिए उमड़ पड़ा था ! अंग्रेज तब जनता के लिए एक अजूबा ही था ! उन का रंग-रूप ….कद-काठी …..सब कुछ अलग जो था ! उन का खान-पान और रहन-सहन भी …हिन्दुस्तानियों से अलग था ! अंग्रेज अब ‘शक्ति के प्रतीक-से’ बन चुके थे ! 

उसी भ्रम को तोड़ने के लिए ….बायसराय पर बम मारना  ….ज़रूरी हो गया था !! 

जनता में सन्देश जाना ज़रूरी था ….कि ये अंग्रेज लुटेरे थे ….महान न थे !!

“मारा बम …..?” 

“मारा ….!!” अब दादा जी भी चुहल मैं शामिल थे . “दुर्भाग्य से ….बसंत विस्वास की तय शुदा योजना में ….चूक हो गई !” दादा जी ने आँखें तरेरीं थीं . “बम कैसे मारते ….?” 

“क्यों …..?”

“हाथी पर सवार था – बायसराय ..और उस की पत्नी …..”

“तो ….क्या …..?”

“मूरख ….! हाथी कोई छोटी वस्तु है, क्या …..?” दादा जी हँसे थे . यही तो चूक हुई थी ! ऊपर तक …उछाल कर बम फैंकना ….कोई आसान काम न था ….?”

“फिर क्या हुआ ……?”

“अवधबिहारी बोस अपने बम के साथ …ऊपर तैनात थे ! ये योजना को दूसरा चरण था ! बस ! उन्होंने हमला कर दिया ! बम को निशाने पर दे मारा !!”

“और ….बायसराय ..मर गया ….?”

“नहीं ! मरा नहीं था ….. बुरी तरह से घायल हुआ था ! पर जो होना था ….वह तो हो ही गया था …..!!” 

”  मतलब …..?”

“मतलब कि …राष्ट्र को सन्देश पहुँच गया था ! जमा भीड़ का भ्रम टूट गया था !! देश का उत्तरी कौना भी जाग उठा था !!! और ये कि अंग्रेज लुटेरे थे – यह सन्देश भी लोगों के कानों तक जा पहुंचा था …..”

“जम कर घमासान हुआ होगा …..?” मैंने पूछ लिया था . 

“होना ही था ! जमकर घमासान ही तो होना था ….? और इसी के लिए १५ फरवरी १९१५ को एक तारीख मान लिया गया था ….जब अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फैंकना था ………”

“कैसे …..?”

“रासबिहारी बोस बड़े ही दूरदर्शी थे ! दूसरे ही दिन उन्होंने देहरादून जा कर बम-घटना की भत्सर्ना की थी …सभा बुलाई थी ….और अंग्रेजों को खूब सराहा था !”

“क्यों ….?”

“क्यों कि अवधबिहारी बोस पकडे गए थे ! उन्हें फांसी की सजा मिलनी ही थी – यह तो तय था ! वसंत विस्वास ने आत्महत्या करली थी . वो डर गए थे ! सब जानते थे कि इस बम-काण्ड के बाद तो ….बायसराय ने कहर ही ढाना था !”

“कहर ही ढाया होगा ….?”

“हाँ ! कहर ही ढाया था ! रासबिहारी बोस की योजना थी कि …जो सैनिक छावनियों मैं थे …उन्हें साथ ले कर १५ फरवरी को देश को आज़ाद करा लिया जाए ….और दिल्ली पर कब्जा कर लिया जाए !! तैयारियां थीं ! मुकम्मल तैयारियां थीं ….!! ग़दर पार्टी के सदस्यों के पास धन….जन …असला और हमले की काबलियत – सब था ! मौका भी माकूल ही था ! अंग्रेज युद्ध में तल्लीन थे . बाहर लड़ रहे थे ….और देश खाली पड़ा था . लेकिन ……”

“लेकिन …..?” 

“गद्दार ……? इन गद्दारों ने …बात को बहा दिया …..! मुहीम अंग्रेजों के कानों तक जा पहुंची ! और संग्राम होने से पहले ही हमारी हार हो चुकी थी…… !” कराह रहे थे , दादा जी . “वही गद्दारी की बीमारी ……? वही ….रोग ….जिस ने हमें बार-बार हराया , नरेन्द्र ! में …..में ….. चाहता हूँ कि …. कुछ ऐसा हो ….जो हमें इस बीमारी से मुक्त कर दे …..?”

“रासबिहारी बोस ने कुछ नहीं किया …..?”

“क्या करते …..? अंग्रेजों ने सब को पकड़-पकड़ कर जेलों मैं डाल दिया था . वो भागे थे . वाराणसी पहुँच कर उन्होंने स्थिति का जायजा लिया था ! बात तो कब की बह गई थी . इस घटना को ‘लाहौर कान्स्परेसी ‘ केस का नाम दे कर अंग्रेजों ने फिर अलीपुर की ही तरह ….मुकद्दमे चलाए थे ! और ….”

“और …..?”

“और …अठाईस आतंकवादियों को ….सजाए-मौत सुनाई गई थी ! फिर से हमारे देश-भक्त फांसी झूले थे ! हम फिर से ….एक बार और अपनी आज़ादी की उम्मीद को   …गवां बैठे थे !!”

“और रासबिहारी …..?” 

“१२ मई १९१५ को …जापान चले गए थे !!” 

“क्यों …..?”

“अपना सपना पूरा करने ! वो हारे नहीं थे ! अंत तक ….ये आदमी हारा नहीं था , नरेन्द्र !”

“देखा था ….आज़ादी का सूरज …….रासबिहारी बोस ….ने ….?”

“दुर्भाग्य ही रहा , इन का ! जापान मैं आई एन ए की स्थापना कर ….सुभाष चन्द्र बोस को सब कुछ सौप कर ….बस …..१९४५ मैं स्वर्ग सिंधार गए …..” दादा जी ग़मगीन थे . “पर ….पर ….नरेन्द्र ! जापानी राष्ट्र ने जो सम्मान ….जो स्वागत रासबिहारी बोस को दिया ….और हम पर जो उपकार किया ….उस का तो भारत आज तक ऋणी है ! रासबिहारी बोस उन के लिए …उस राष्ट्र के लिए …एक धरोहर थे , नरेन्द्र !” दादा जी की आँखें नम थीं !

……………..

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!