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तुम्हारे लिए चुनौती पूर्ण भविष्य आँख लगाए बैठा है !

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश:-

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अचानक ही कांग्रेस और उस के सहयोगियों को ..एक बार फिर से सताने लगा था …? न जाने कितनी बार इसे तोड़ने के प्रयत्न हुए थे …? इसे बैन किया गया था …इस की बदनामी भी की थी …लेकिन ये दूब की घास की तरह …जमीन पकडती ही गई …जड़ें जमाती ही गई ……जमती ही गई …और आज ……?

“ले लेगा …देश को ….?” एक गुप्त रहस्य की तरह …बात उछली थी और …सारी जमात के चेहरों पर जा छपी थी !

“चोर की दाढ़ी में तिनका ….?” नारे की तरह एक एहसास उठा था . क्या है – कांग्रेस के पास जो – भारतीय स्वयं सेवक संघ का मुकाबला करे …? ‘एक प्रश्न था जिस का उत्तर था -युवा कांग्रेस ‘ या कि ‘राहुल -ब्रिगेड’ ….? ये एक कल्पना थी -जिस ने जन्म तो ले लिया था …पर शरीर अब तक न धार पाई थी ?

था तो ये एक जौमदार सपना जिसे गांधी परिवार ने खुली आँखों देखा था ….लेकिन …ये आज तक एक बच्चे से बड़ा न हो पाया था ….? राहुल – एक युवा -शक्ति के प्रतीक …गाँधी परिवार के वंशज …अपने साथ ….अपने जैसे ही युवक – जो राजनीति से कहीं न कहीं जुड़े और सर्व-सम्म्पन्न थे , को ले कर देश के सामने आए थे ! उम्मीदें थीं – कि राहुल इस संगठन को ले कर …देश की राजनीति पर हर तरह से काबिज हो जाएंगे …? और फिर ये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी ..टटपूंजिया विचार-धाराएं …स्वत ही विलुप्त हो जाएंगी ….?

लेकिन हो गया था – बिलकुल विपरीत ….एक दम उलटा …..और ….जो सामने आया था वह तो न घोडा था …न घोड़े की पूंछ थी ….? राहुल गाँधी तो कांग्रेस को संभालने के लिए आगे आ गए थे ….लेकिन उन का ब्रिगेड ….कहीं पीछे छूट गया था ….बहुत पीछे ….????

“मैं आप की विचार-धारा से प्रभावित हूँ, भाई जी !” मेरे सामने खड़ा एक आकर्षक युवक कह रहा था . मुझे भी पहली ही नज़र में ये प्रतिभाशाली युवक भा गया था ….भला लगा था ! जो सहज मुसकान उस के मुखारविंद पर खेल रही थी , मोहक थी ! “मेरा नाम – अमित शाह है !” उस ने बताया था . “बी एस सी कर रहा हूँ . …’शाह’ कालेज से !” कह कर वह चुप हो गया था .

आज पहली बार मुझे लगा था कि जिस ‘खोज’ के लिए मैं पागल हुआ घूम रहा था ….वह आज मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई थी ….? जैसे मुझे मेरा माँगा मिला हो …..मेरी मुराद मिली हो ….और प्रभु ने मुझ पर कृपा की हो ….मुझे ऐसा ही एहसास हुआ था ….!!

“मुझ से क्या चाहते हो ….?” मैंने प्रेम पूर्वक पूछा था .

“साथ …..! सहयोग ….!! शिक्षा …!!” एक ही सांस में सब कह गया था – अमित .

तनिक हैरान-सा मैं …एक बार फिर अमित को देख रहा था ….परख रहा था ….!!

अब तक मैं अपने दायित्व को तो समझ चुका था ! मैं मान गया था कि …देश की युवा-शक्ति …को ही संगठित कर …देश को शक्तिशाली और महान बनाया जा सकता था …!! देश को एक नई दिशा चाहिए थी ….देश को नव-निर्माण की …आवश्यकता थी ….और …देश को …..

“देंगे …..?” अमित ने चुपके से …मेरा मौन तोडा था .

“क्यों नहीं …..?” मैंने भी हंस कर उसे एक मांगी मुराद की तरह अपनी बांहों में समेट लिया था . “आज से …जो मेरा है – वह तुम्हारा भी है !!” मैंने बड़े ही स्नेह पूर्ण अंदाज़ में कहा था .

“आभारी हूँ,आप का ….!” अमित कह रहा था . “मैंने सुना था – आप के बारे ! पर आज तो पा भी लिया …?” वह बहुत प्रसन्न था . “मेरा मन …..”

“मैं जान गया हूँ, तुम्हारा मन ….?” मैं भी तो प्रसन्न था . “सब तुम्हारे मन के मुताबिक़ होगा ….!” मैंने उसे विश्वास दिलाया था . “हाँ ! मैदान छोड़ कर भागना – इज …नांट …माई …कप …आँफ टी ….?” मैंने उसे पहली हिदायत दी थी .

“मर जाऊंगा …पर भागूंगा नहीं …..!!” अमित ने भी वायदा किया था .

“अब हम एक जांन हुए,अमित !!” मैंने उसे सम्पूर्ण रूप से स्वीकार लिया था .

और आज अचानक ही मेरी निगाह के नीचे …मेरे बीते बारह साल आ खड़े हुए थे …..

मैं १९६९…में ही तो अहमदाबाद आया था …? तब से ले कर आज तक मैंने …बिना निगाह उठाए …अपने हर दायित्व का निर्वाह किया था ! संघ मेरी आत्मा में बस गया था ….मेरे मन को भा गया था ….और मेरी द्रष्टि में समां गया था ! मुझे नागेश जी से जो मिला था ….वह बे-जोड़ था ! ‘संघाऊ …शक्ति …कलौ-युगे ‘ के आधार पर ‘संगठन’ का नाम दिया है – उन्होंने ही मुझे बताया था ! ‘शाखा एक स्वयं-सेवक के लिए उस का तीर्थ है !’ उन का खुलासा था . ‘दिन-प्रति-दिन राष्ट्र की मुक्ति और परमार्थ के लिए चिंतन ….तथा गुरु …और इश्वर की प्रार्थना करते हैं ‘ उन के ही सत्य वचन थे …! ‘शाखा के ही माध्यम से संघ अस्तित्व में आता है ,नरेन्द्र !’ इन चंद शब्दों में ही उन्होंने मुझे सब समझा दिया था !!

उस दिन लगा था कि …मेरी आँखों पर पड़ा अन्धकार का पर्दा …उठ गया था ! मैं एकबारगी उजाले में आ गया था …? अब मैं रोशनी के साथ जुड़ गया था . ये मुझे एक नया ही संसार लगा था ? वाद नगर से भिन्न …मेरे परिवार से एक दम अलग …और मुझ से भी आगे आ बैठा -ये मुकाम …मुझे बहुत बहुत अपना लगा था …और लगा था – मुझे तो इसी की तलाश थी …?

दो साल के भ्रमण के बाद मैं लौटा था तो …लोगों ने मुझे वाद नगर में ‘लफंगा’ ही कहा था …? मेरे बाबू जी भी निराश हुए थे …कि मैं कुछ कमा कर न लाया था …? लेकिन जो कमाई मैंने की थी – वो तो बे-जोड़ थी ….गुप्त थी …मेरी थी …और उसे न कोई मुझ से छीन सकता था …और न कोई बाँट सकता था …? और जो मैंने अहमदाबाद आ कर कमाया था – उस का तो न कोई जोड़ था …न कोई तोड़ ….!!

मैंने संघ की शक्ति को समझ लिया था ! मैंने संगठन चलाना सीख लिया था . मैंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को चलाना …गठित करना …और उसे एक प्रभावी रूप देना …भी सीख लिया था ! और मैं अब जांन गया था कि …मैं अब राष्ट्र की मुख्य वैचारिक धारा का प्रवाह बन चुका था ! अब मैं गति-मान था …और अब हर कोई भी मेरे साथ आ कर गति प्राप्त कर लेता था …?

तभी तो अमित शाह मुझ से आ कर जुड़ गया था …..?

और मैं जुड़ गया था एक विराट से ….! मेरा न कोई आदि था …न कोई अंत …! मैं तो अब अनंत था ! मैं तो अब सब का था ….सेवक था ….समाज का ,देश का और धर्म का ! मुझे अब खाने,नहाने, सोने,बैठने ….या कमाने ..न कमाने का गम नहीं सताता था …? मैं अचेतन से ही दादा जी से जा जुड़ा था ….अब मैं अरविंदो के अखाड़े का सेवक था ….और मैं अब हर-हर माईने में विवेकानंद-मय था !!

मैंने उन्हें माना था लेकिन – उन के वेदांत को छोड कर मैं भाग आया था ! मैं उन के वेदान्त को मान कर …उन की उस राह पर चलना न चाहता था ! मैं चलना चाहता था …इस राह पर ….संघ की राह पर ….और उन के अधूरे स्वप्न को …मैं पूरा करना चाहता था …? मुझे जब निवेदिता जी ने बताया था कि …स्वामी जी अपने जैसे …१०० विवेकानंद बना कर …अपना मिशन आरंभ करना चाहते थे – तो मैं उन का आशय समझ गया था …और समझ गया था कि ‘संघाऊ शक्ति कल्युगे ‘ का विचार ही था – ये …?

और गुरु जी ने तो मुझे स्पष्ट रूप से ‘अवधूत’ बनने से वर्ज दिया था ! उन का अनुमान मेरे लिए यही ‘विराट’ था जिस से मैं आज आ जुड़ा था …? और यही मेरी डगर थी ….और मेरे जैसे अनेकानेक देश-भक्तों की यही डगर थी ….जो राष्ट्र भक्त थे …समाज सेवी थे ….?

“गृहस्थ ….और ब्रह्मचर्य …में से तुम किसे चुनौगे ….?” मैंने अमित से पूछा था . मैं जानता था कि अमित अभी बहुत छोटा था …पर उसे ये निर्णय तो लेना ही था …?

“ब्रह्मचर्य ….!!” हुमक कर कहा था,अमित ने .

“नहीं …!” मैंने भी तुरंत ही कहा था . “तुम गृहस्थ …रहोगे ….?” मैंने आदेश दिया था .

“क्यों ,भाई जी ….?” तडक कर पूछा था – अमित ने .

“इसलिए कि …मैं ब्रह्मचर्य में हूँ ! पूर्णकालिक सेवक हूँ ! तुम्हारा काम गृहस्थ रह कर पूरा हो जाएगा !” मैंने उसे आश्वस्त किया था .

“आप …..आप ….आप हमेशा ही मुझे बचा जाते हैं ….?” उल्हाना था -अमित का .

“छोटे हो ,न ….?” मैंने बड़े ही दुलार के साथ कहा था .

“लेकिन मैं …..?”

“बहुत ….बहुत काम दूंगा …तुम्हें …!” मैंने प्रसन्न हो कर कहा था . “बहुत मुकाम आएँगे ,अमित जब ….तुम्हीं मोर्चा संभालोगे ….? मैं देख रहा हूँ कि …तुम्हारे लिए ….चुनौती पूर्ण भविष्य …आँख लगाए बैठा है …,मित्र …?”

“जब …आप कहेंगे ….मैं लडूंगा ….!!” अमित ने तभी एलान कर दिया था .

और हम दोनों …हर रोज …हर पल …हर क्षण …अपने इस अनगढ़ भविष्य की मांटी को रौदते …और घरौंदे बनाने के सपने देखते ….!!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!