राम चरन भाग बयालीस

राम चरन भाग बयालीस

कच्ची जमीन पर खड़ा राम चरन पक्के मनसूबे बांध रहा था। मंदिर के गर्भ गृह का ये एकांत उसे असीम आजादी बांटता था – चाहे जो सोचने की और चाहे जो मंसूबे बनाने बिगाड़ने की। यहां तक पहुंचने का एक ही बड़ा कारण था – उसकी अपनी महत्वाकांक्षा। वह मोर्चे मारना चाहता था...
राम चरन भाग बयालीस

राम चरन भाग इकतालीस

ढोलू सराय का किला आज गजब की गहमागहमी से सजग हो उठा था। चुनाव आते थे तभी किले में इस तरह की भीड़ बढ़ती थी और देश प्रेम तथा देश भक्ति के नारे गूंज उठते थे। कुंवर साहब बढ़ चढ़ कर चुनाव में हिस्सा लेते थे और आज तक कभी भी चुनाव न हारे थे। ढोलू सराय की सीट उनके पिता राजा...
राम चरन भाग बयालीस

राम चरन भाग चालीस

आज सात दिन हो गए थे। राजेश्वरी ने पंडित कमल किशोर से सीधे मुंह बात न की थी। “कसूर तो बताओ महारानी!” पंडित कमल किशोर आज अड़ गए थे। “मेरी जान ही ले कर रहोगी!” उन्होंने राजेश्वरी को याचक निगाहों से देखा था। अपने सामने हार मानते पंडित कमल किशोर...
राम चरन भाग बयालीस

राम चरन भाग उनतालीस

ग्राहकों की भीड़ लगी है। राम चरन पर आंख उठाने तक की फुरसत नहीं है। भोंदू दनादन थालियां साफ करता जा रहा है और राम चरन को पकड़ा रहा है। खूब धन बरस रहा है। कालू नोटों से भरी दोनों जेबों को देख कर भी खुश नहीं हुआ है। रीती-रीती निगाहों से कालू ने खाली-खाली आसमान को देखा...
राम चरन भाग बयालीस

राम चरन भाग अड़तीस

“गाड़ी लग गई है, साहब!” ड्योढ़ी से आ कर दरबान ने सूचना दी थी। ढोलू सराय पर शाम ढल रही थी। बड़ा ही खूबसूरत मौसम था। सूरज किले के पीछे जा छुपा था। सुखद पुरवइया छूट गया था। आसमान ललोंही विभा से भरा तना खड़ा था। इंद्राणी और सुंदरी मंदिर जा रही थीं। इंद्राणी का...